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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 991, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 991

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ १८१

भी वैसे ही विचरें । भगीरथ के पास जो कोई याचक आता था, उसका प्रयोजन वह पूर्ण करता था । जिस पदार्थ को माँगने का संकल्प करके कोई आता तो राजा उसको पूर्ण करता था । जैसे चन्द्रमा को देखकर चन्द्रमणि अमृत पर्मीजती है वैसे ही स्वभाव का दयार्द्र वह राजा था । जो उस राजा से शत्रुभाव रखते थे, उनका वह ऐसे नाश करता था, जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार का नाश हो जाता है । जैसे अग्नि से अनेक चिनगारियाँ उठती हैं, वैसे ही वह शत्रुओं पर शस्त्रों की वर्षा करता था । आपतित प्रवाह में स्थिर रहता था—अर्थात् भले-बुरे और सुख दुःख में एक समान रहता था । राम ने पूछा, हे भगवन् ! राजा भगीरथ के मन में क्या आई, जो गंगा को ले आये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक समय उसने अपने नगर को देखा कि लोग भले मार्ग को त्यागकर बुरे मार्ग और पापकर्म में लगे हैं और मूर्ख हो रहे हैं । तब लोगों के उपकार के निमित्त उसने तप करके ब्रह्मा, रुद्र और यज्ञ ऋषि का आराधन किया और गंगा के लाने के निमित्त मन्त्र जपने लगा । गंगा का एक प्रवाह स्वर्ग में और एक पाताल में है; राजा भगीरथ ने एक प्रवाह मर्त्यलोक में भी चलाया है । उसने गंगा को लाकर समुद्र का भी उपकार किया । समुद्र को अगस्त्य मुनि ने सुखाया था, गंगा के आने से उस समुद्र का दरिद्र (जल की कमी) भी निवृत्त हुआ । उसके मन में एक विचार आया । संसार को देखकर वह कहने लगा कि एक ही काम बारम्बार करना बड़ी मूर्खता है । मनुष्य नित वही भोगते, वही खाते और फिर वही कार्य करते हैं । जिस कर्म के करने से पीछे सुख मिले, उसके करने में कुछ दोष नहीं; ऐसे वैराग्य से उसने विचार किया कि संसार क्या है ? उस समय में राजा युवा था । जैसे मरुस्थल में कमल उपजना आश्चर्य है, वैसे ही यौवन अवस्था में ऐसा विचार उपजना आश्चर्य है ।

हे राम ! जब राजा के मन में ऐसा विचार उपजा, तब वह घर से निकलकर अपने गुरु त्रितल ऋषीश्वर के निकट पहुँचा और उनसे प्रश्न किया कि हे भगवन् ! वह कौन सुख है, जिसके पाने से जरा और