योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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नहीं निकलना। जो अद्वैत है, उसमें भिन्न द्वैत कुछ नहीं। वह पवन ब्रह्म है, जिस पवन में ब्रह्माण्ड के समूह उड़ते हैं, और वह पुरुष स्वप्न में स्वप्न और आगे और स्वप्न देखता है और एक अपने आपमें स्थित है। चित्त-कला फुरने से अनन्त ब्रह्माण्डों का भान होता है। इसी को स्वप्न कहते हैं। तो भी उससे कुछ भिन्न नहीं। एक ही रूप में वह नट की तरह रहता है और ये सब उसकी आज्ञा में अपना-अपना काम करते हैं। वह सूक्ष्म में सूक्ष्म और स्थूल में स्थूल है। उसमें मन्दराचल पर्वत भी अणु है, ऐसा स्थूल है। उसमें वाणी की गति नहीं। वह अपने आप ही में स्थित है और इन्द्रियों में अगोचर है, इससे सूक्ष्म में सूक्ष्म है और पूर्णता में स्थूल में स्थूल है। हे मूर्ख वेताल! तू किसको खाता है और क्षुधा से क्यों व्याकुल हुआ है? तू तो अद्वैतरूप आत्मा और आनन्दरूप है, अपने आपमें स्थित हो। जब प्रश्न का उत्तर देकर राजा ने ऐसे उपदेश किया, तब वेताल वहाँ से चला और एकान्त स्थान में स्थित हो विचार करने लगा कि ऐसे मृगतृष्णा के जलसदृश झूठे संसार में मुझे क्या प्रयोजन है? फिर एकान्त स्थान में जाकर ध्यान लगाकर आत्मा में धारा-प्रवाह सा स्थित हुआ। धारा प्रवाह प्रवाहक उसे कहते हैं कि आत्मा का अभ्यास दृढ हो, आत्मा से भिन्न कुछ न फुरे और एकरस स्थित हो। ऐसे ध्यान में स्थित होकर वेताल मन आत्मपद को प्राप्त हुआ। हे राम! यह राजा और वेताल का आख्यान तुमको सुनाया। उस आत्मा में ब्रह्माण्ड अणु की नाईं स्थित है, इससे निर्विकल्प आत्मा में स्थित हो और इन्द्रियों को बाहर से समेटकर स्थित करो।
इति श्रीयो० नि० राजावै० वेतालब्रह्मपदप्राप्तिर्नाम द्विपष्टितमसर्गः ६२
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! मैं एक और आख्यान कहता हूँ, उसे सुनो। उसमें भगीरथ राजा की मूढ़ता गई; वह स्वस्थचित्त होकर आत्मपद में स्थित हुआ; अपने आपत्तिप्रवाह (जो सुख-दुख आ) पड़ें, उसे निर्लिप्त होकर भोगना आपत्तिप्रवाह का अर्थ है।) में विचार और पुरुषार्थ से स्वर्गलोक से गङ्गा को पृथ्वी पर ले आया। तुम