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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 989, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 989

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १७६

जो तूने मेरे प्रश्नों का उत्तर न दिया तो तुझे खा जाऊँगा ।

इति श्रीयो० निर्वाणप्रकरणे वेतालप्रश्नोक्तिनामैकषष्टितमसर्गः॥६१॥

राजा बोला, हे वेताल ! इन प्रश्नों का उत्तर सुन । ब्रह्माण्डरूपी एक मिर्च का बीज है और उसमें सतपद आत्मा चैतन्यरूपी तीक्ष्णता है । एक डाल में ऐसी मिर्च कई सहस्र लगी हुई हैं और एक वृक्ष में कई सहस्र ऐसी डालें लगी हैं । ऐसे वृक्ष एक वन में कई सहस्र हैं और ऐसे कई सहस्र वन एक शिखर पर स्थित हैं । ऐसे कई सहस्र शिखर एक पर्वत पर हैं और ऐसे कई सहस्र पर्वत एक नगर में हैं । ऐसे कई सहस्र नगर एक द्वीप में हैं और ऐसे कई सहस्र द्वीप एक भव पृथ्वी में हैं । ऐसे कई सहस्र पृथ्वीभव एक अगड में हैं और ऐसे कई सहस्र अगड एक समुद्र में लहरें लेते हैं । ऐसे कई सहस्र समुद्र एक समुद्र की लहरें हैं और ऐसे कई सहस्र समुद्र एक पुरुष के उदर में हैं । ऐसे कई पुरुषों की एक पुरुष के गले में माला पिरोई हुई है । ऐसे कई लाख-कोटि सूर्य के अणु हैं, जिस सूर्य मे सब प्रकाशमान है । वह सूर्य आत्मा है, जिसमें अनन्त सृष्टि स्थित है । हे वेताल ! जैसे यह सृष्टि भासती है वैसे ही सब सृष्टियाँ जान । जो यह सृष्टि मत्य है तो सब सृष्टि मत हैं और जो यह सृष्टि स्वप्न है तो सब सृष्टियों को स्वप्न सदृश्य जानो । आत्मा ऐसा सूर्य है, जिसमें भिन्न और कोई अणु नहीं और वह सदा अपने आपमें स्थित है । अब बता और क्या पूछता है ? ऐसे आत्मा में स्थित हो जो आत्मसत्तामात्रपद है; जिस सत्तामात्रपद में कालसत्ता हुई है और ऊर्मी में आकाशसत्ता हुई है । ऊर्मी सतपद मे सब सत्ताएँ संकल्प द्वारा उदय हुई हैं और संकल्प के लय होने पर सब लय हो जाती हैं ।

तूने जो प्रश्न किया था कि वह कौन सूर्य है, जिसमें ब्रह्माण्डरूपी त्रसरेणु होते हैं ? वह ब्रह्मसूर्य है, जिससे भिन्न और कुछ नहीं । और केले का वृक्ष जो तूने पूछा था सो केले की तरह विश्व के भीतर-बाहर आत्मा स्थित है । जैसे केले के भीतर देखने में शून्य आकाश ही निक-लता है, वैसे ही विश्व के भीतर-बाहर आत्मा में भिन्न और कुछ मा-