योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 988, कुल 1734 में से
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* योगवाशिष्ठ *
लगाकर सुना । दक्षिण दिशा में एक मन्दराचल पर्वत है । उसकी कन्दरा में महाभयानक आकार का एक बेताल रहता था और मनुष्यों को खाता था । उसके मन में विचार उपजा कि किसी नगर के जीवों का भोजन करूँ । पर वह एक समय साधु का संग भी करता था, और एक साधु को खा भी जाता था । उस साधु-संग के प्रसाद से बेताल के मन में यह आया कि मेरी कौन गति होगी ? मेरा आहार मनुष्य है और मनुष्यों को भोजन करना बड़ी हत्या है । इससे में एक वृत्ति बाँध नूँ कि जो मूर्ख और अज्ञानी मनुष्य हों, उनको भोजन करूँ और जो उत्तम पुरुष हैं उनको न खाऊँ ।
हे राम ! निदान वह बेताल क्षुधातुर होने पर भी भले मनुष्यों को न खाता था । इसी प्रकार एक समय वह क्षुधा से बहुत व्याकुल हो रात्रि के समय घर से बाहर निकला तो संयोगवश उस नगर के राजा से, जो वीर यात्रा को निकला था, भेंट हो गई । बेताल ने कहा, हे राजन् ! तुम मुझे भोजन मिले हो । अब में तुमको खाता हूँ । तुम कहाँ जाओगे ? राजा ने कहा, हे रात्रि के विचरनेवाले बेताल ! जो तू मेरे निकट अन्याय से आवेगा तो तेरा माथा हजार टुकड़े हो जायगा और तू मरेगा । बेताल ने कहा, हे राजन् ! मैं तुझसे नहीं डरता । हे अपने हत्यारे ! मैं तुझे भोजन करूँगा; तू चाहे जैसा बली हो, मैं नहीं डरता । परन्तु मेरी एक प्रतिज्ञा है कि में अज्ञानी को भोजन करता हूँ और ज्ञानी को नहीं मारता । जो तू ज्ञानी है तो न मारूँगा और जो अज्ञानी है तो मारूँगा, जैसे बाजपक्षी पक्षियों को मारता है । जो तू ज्ञानी है तो मेरे प्रश्नों का उत्तर दे । एक प्रश्न यह है कि जिसमें यह ब्रह्माण्ड त्रसरेणु के समान है वह सूर्य कौन है ? दूसरा प्रश्न यह है कि जिस पवन में आकाशरूपी अणु उड़ते हैं, वह पवन कौन है ? तीसरा प्रश्न यह है जिसमें केले के वृक्ष की तरह और कुछ नहीं निकलता, वह कौन वृक्ष है ? और चौथा प्रश्न यह है कि वह पुरुष कौन है, जो स्वप्न में स्वप्न और फिर उसमें और स्वप्न देखता है और एक रहता है, परिणाम को नहीं प्राप्त होता ? इन प्रश्नों का उत्तर दे ।