योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १७७
से रहित होता है। जैसे भुना बीज फिर नहीं उगता, वैसे ही ज्ञानी को वासना के अभाव मे जन्म-मरण नहीं होता। हे राम ! जन्म-मरण दोनों मार्गों से निवृत्त होता है और उसे दोनों का फल कहा है। हे राम ! ज्ञान मे चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है और योग मे प्राणवायु स्थिर होती है। तब वासना का क्षय हो जाता है। जब स्वरूप की प्राप्ति होती है, तब संसार के पदार्थों का अभाव हो जाता है। जैसे रसायन मे ताँबा सोना हो जाता है, फिर ताँबे का भाव नहीं रहता, वैसे ही ज्ञान मे विश्वरूपी ताँवे की संज्ञा नहीं रहती। जैसे ताँबे का ताँवापन जाता रहता है, वैसे ही ज्ञान मे जब चित्त सत्यरूप हुआ तब फिर संसारी नहीं होता। आत्मा में न बन्धन है और न मोक्ष। परमात्मा एक अद्वैत है। तब उसमें बन्ध कहाँ और मोक्ष कहाँ ? बन्धन और मुक्ति चित्त की कल्पना है। और जो चित्त को शान्त करने का उपाय कहा है उससे वह शान्त होता है। इसी को मुक्ति कहते हैं। और बन्धन-मुक्ति कोई नहीं। चित्त के उदय होने का नाम बन्धन है और चित्त का शान्त होना ही मुक्ति है।
हे राम ! जब मन अपने वश होता है, तब आत्मपद प्राप्त होता है। अथवा जब प्राण स्थिर होते हैं, तब आत्मपद प्राप्त होता है। यह संसार मृगतृष्णा के जल सा मिथ्या है। जब वासना निवृत्त होती है, तब आत्मपद में स्थिति होती है। जैसे मेघ जब जल-संयुक्त होते हैं, तब गर्जते हैं और वर्षा करते हैं और जब वर्षा से रहित होते हैं तब शान्त हो जाते हैं, वैसे ही जब वासना का क्षय होता है, तब चित्त शान्त हो जाता है। जैसे शरत् काल में बादल और कुहरा निवृत्त होकर शुद्ध और निर्मल आकाश ही रहता है वैसे ही वासना के निवृत्त होने से शुद्ध और केवल चैतन्य आत्मा होकर भासित होता है। जो तुम एक मुहूर्त भी चित्त बिना स्थित हो तो तुमको आत्मपद की प्राप्ति हो। जब तक चित्त की वासना क्षय नहीं होती तब तक जीव बड़े भ्रम देखता है। हे राम ! यह संसार मृगतृष्णा के जल सा असत् है और आभासमात्र स्फुरता है। इस पर एक आख्यान जो पहले कभी हुआ है, सो कहता हूँ, मन