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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 986, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 986

१७६ * योगवाशिष्ठ *

देखोगे तो विश्व का भान होगा। इससे हे राम! बोध में स्थित रहो।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकत्वप्रतिपादनं नाम षष्टितमःसर्गः॥ ६० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! सदाशिव का आदि में स्फुरण हुआ है। वह त्रिनेत्र है, विश्व का संहार करते हैं और सिरों की माला धारण किये हैं। ब्रह्मा के चार मुख हैं और चारों वेद हाथ में हैं। वह संसार की उत्पत्ति करते हैं। उनकी ऐसे ही उत्पत्ति हुई है। हे राम! ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, ये तीनों एकरूप हैं। इनकी यही चेष्टा स्वाभाविक है। उन्होंने यह अपना कर्म न राग से अङ्गीकार किया है और न द्वेष करके उसका त्याग करते हैं। उनकी यह संज्ञा भी लोगों के देखने के लिए है। वे अपनी जान में कुछ नहीं करते; क्योंकि बोध में ही उनका जाग्रत है। बोध में जाग्रत क्या और कैसे होता है सो भी सुनो। बोध सांख्यमार्ग से होता है और जाग्रति योगमार्ग से होती है। सांख्यमार्ग है तत्त्व और मिथ्या को विचारना। तत्त्व इस ज्ञान को कहते हैं कि मैं आत्मा, सत् और चैतन्य हूँ, और सब दृश्य मिथ्या, जड़ और असत् हैं। अज्ञान मुझमें कल्पित है। असल में मैं अद्वैत आत्मा हूँ और मुझमें अज्ञान और दृश्य, दोनों नहीं हैं। ऐसे निश्चय में स्थित होना सांख्यविचार है। योग प्राणों के स्थिर करने को कहते हैं। जब प्राण स्थिर होते हैं, तब मन भी स्थिर हो जाता है और जब मन स्थिर होता है तब प्राण भी स्थिर होते हैं—इनका परस्पर सम्बन्ध है।

राम ने पूछा, हे भगवन्! जो प्राण ही स्थिर होने से जीव मुक्त होता है, तो मृतक पुरुषों के तो प्राण नहीं रहते—वे सब मुक्त होने चाहिए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! प्रथम तो श्रवण करो कि प्राण क्या पदार्थ है। यह जीव पुर्यष्टका में स्थित होकर जैसी वासना करता है, शरीर को त्यागकर उसी के अनुसार आकाश में स्थित होता है। उसी का नाम प्राण है। उस वासनारूप प्राण से फिर उसको संसार का भान होता है और जब प्राण की वासना क्षय होती है तब वह मुक्त होता है। ज्ञानी की वासना क्षीण हो जाती है, इससे वह जन्म-मरण