योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें✽ निर्वाण प्रकरण ✽ १७५
जो क्रिया स्वाभाविक ही आकर प्राप्त हो, उस क्रिया का रागद्वेष करके उनको हेय या उपादेय कुछ नहीं है। उनको क्रिया का अभिमान भी नहीं होता, इसी से क्रिया का बंधन उनको नहीं होता। इससे यह सिद्ध है कि संसार स्फुरण मात्र है। जब तुम फुरने से रहित होगे, तब तुमको त्रिपुटी न भासेगी अर्थात् आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होगा। इससे अज्ञानरूप फुरने से रहित होकर जब तुमको आत्मपद का साक्षात्कार होगा, तब तुम जानोगे कि मुझमें स्फुरण, दृश्य, अदृश्य कुछ नहीं, केवल आत्मपद है, जिसमें एक कहना भी नहीं, तो द्वैत कहाँ से हो ?
हे राम ! दृश्य, अदृश्य, फुरना न फुरना और विद्या, अविद्या, ये सब उपदेश के निमित्त कहते हैं, आत्मा में कुछ नहीं कहा जाता। आत्मा एक है, जिसमें द्वैत का अभाव है। जब चित्त परिणाम बहिर्मुख होता है, तब विश्व का भान होता है और जब चित्त अन्तर्मुख परिणाम पाता है, तब अहंता और ममता का नाश होता है और चैतन्य शेष रहता है। जब अतिशय अन्तर्मुख परिणाम होता है, तब चैतन्य भी नहीं कहा जाता, और जब इससे भी अतिशय परिणाम पाता है, तब 'है' या 'नहीं' भी नहीं कहा जाता। हे राम ! ऐसा तुम्हारा आत्मा अपना आप स्वरूप और शान्तपद है। उसमें वाणी की गति नहीं कि वह ऐसा है या वैसा है, यह कहा जाय। ऐसा कहिये तो इन्द्रियों का विषय है और वैसा कहिये तो इन्द्रियों से परे है। जब तुम अपने में स्थित होगे, तब जानोगे कि मुझमें अहं का फुरना कुछ नहीं है। आत्मरूपी सूर्य का साक्षात्कार होने से दृश्यरूपी अन्धकार का अभाव हो जायगा क्योंकि आत्मा तुम्हारा अपना रूप है जो केवल शान्तरूप और निर्मल है। जैसे गम्भीर समुद्र वायु से रहित होता है, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र संकल्परूपी वायु से रहित गम्भीर और शुद्ध है। यह संसार चित्त का चमत्कार है। यह निरंश है, इसमें अंशांशी भाव नहीं-यह अद्वैत है। हे राम ! जब ऐसे बोध में स्थित होगे, तब इस विश्व को भी आत्मरूप देखोगे। यदि बोध बिना