योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७४ ॐ योगवाशिष्ठ ॐ
ज्ञानी को सुख की इच्छा भी नहीं और दुःख का त्रास भी नहीं। वह हेय और उपादेय से रहित है। हे राम! तुम रघुवंश में चन्द्रमा हो, अपने स्वभाव में स्थित हो। संसारभ्रम मन के फुरने से होता है, सो मिथ्या है, वास्तव नहीं। और न शरीर सत्य है, न माया सत्य है। हे राम! तुम्हारा स्वरूप ओंकार (चैतन्य ब्रह्म) है। इस ओंकार को अङ्गीकार करके स्थित होना परम उत्तम मौन है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो पीछे आपने सब रुद्र कहे, वे रुद्र थे, अथवा रुद्र के गण थे? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जिसको रुद्र कहते हैं, उसी को गण कहते हैं। ये सभी रुद्र हैं। फिर राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो आपने कहा कि सब रुद्र हुए सो ये एक चित्त थे, सब क्योंकर हुए? जैसे दीपक में दीपक होता है, क्या इसी भाँति हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! एक मावरण है, दुसरा निगावरण। जिसका शुद्ध अन्तःकरण है, वह निगावरण है और जिसका मलिन अन्तःकरण है, वह मावरण है। शुद्ध अन्तःकरण में जैसा निश्चय होता है, वैसा ही तत्काल आगे सिद्ध होता है और मलिन अन्तःकरण का निश्चय सिद्ध नहीं होता। इसमें जो शुद्ध, निगावरण रुद्र है, वही आत्मा और सर्वव्यापी है। जो उसका निश्चय होता है, वह सत्य है। राम ने पूछा, हे भगवन्! सदाशिव की चेष्टा तो मलिन है। रूण्डों की माला गले में धारण करते हैं और विभूति लगाकर शमशान में विहार करते हैं। स्त्री बायें अङ्ग में रहती है। आप क्योंकर कहते हैं कि उनका अन्तःकरण शुद्ध है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शुद्ध, अशुद्ध अज्ञानी को कहते हैं। जो शुद्ध रहे, अशुद्ध में न लिप्त हो, वह ज्ञानी है। वह अपने में क्रिया नहीं देखता और उसको शुद्ध-अशुद्ध में राग-द्वेष नहीं होता। ऐसे सदाशिवजी को ग्रहण या त्याग नहीं है। उनकी दृष्टि में जो स्वाभाविक चेष्टा होती है सो हो। वह ऐसे होती है, जैसे आदि परमात्मा विष्णु भगवान् चार भुजा धारण किये जगत् की रक्षा करने के लिए शुद्ध चेष्टा में अवतार लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और पापियों को मारते हैं। यह आदि स्फुरण हुआ है।