योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 983, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १७३
हे राम ! तुम एकरूप आत्मा हो । उसमें फुरने मे विश्व कल्पित हुआ है । इसमें वासना मे रहित हुए बिना आत्मा का दर्शन नहीं होता । जैसे उदय हुआ सूर्य भी बादल के होते शुद्ध नहीं दिखता, वैसे ही स्फुरणरूपी बादल के दूर होने पर ही आत्मरूपी सूर्य शुद्ध भासित होता है और दृश्य, दर्शन, द्रष्टा फुरने मे ही कल्पित हुए हैं । हे राम ! इस संसार का सार जो आत्मा है, जिसमें सुषुप्त की तरह मौन हो रहो ।
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! मैं तीन मौन जानता हूँ—एक वाणी का मौन अर्थात् चुप रहना; दूसरा इन्द्रियों का मौन और तीसरा काष्ठ-मौन अर्थात् हठ करके मन और इन्द्रियों को वश करना । सुषुप्त मौन मैं नहीं जानता । आप बताइए ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये तीनों काष्ठ-मौन तपस्वियों के हैं और सुषुप्त मौन ज्ञानी और जीवन्मुक्त का है । वे तीनों मौन जो तुमने कहे, सो अज्ञानी तपस्वियों के हैं । उनको फिर सुनो । एक वाणी का मौन कि बोलना नहीं, दूसरा मौन समाधि कि नेत्रों का मूँद लेना और कुछ न देखना और तीसरा हठकर स्थित होना और मन और इन्द्रियों को स्थिर करना । एक मौन इन्द्रियों की चेष्टा मे रहित होना है । अब ज्ञानी का सुषुप्त मौन सुनो । वाणी और इन्द्रियों से चेष्टा करना, पर आत्मा मे भिन्न और कुछ न भासित होना, अथवा ऐसे होना कि न मैं हूँ, न जगत् है, अथवा ऐसे होना कि सब मैं ही हूँ । ऐसे निश्चय में स्थित होना बड़ा उत्तम मौन है ।
हे राम ! आत्मा की सिद्धि विधि से भी होती है और निषेध से भी । उस आत्मा में स्थित होना बड़ा मौन है । हे राम ! यह जो मैंने सुषुप्त मौन कहा है, सो क्या है, सुनो ! द्वैतरूप संसार के फुरने मे सुषुप्त होना; आत्मा मे जागना और ऐसे देखना कि न मुझमें जाग्रत है, न स्वप्न है और न सुषुप्ति है—इस निश्चय में स्थित होना तुरीयातीत अवस्था है । यह पञ्चम मौन है । ऐसा तुरीयातीत पद अनादि, अनन्त, जरा से रहित, शुद्ध निर्दोष है । हे राम ! ज्ञानी इन्द्रियों को रोकने की इच्छा भी नहीं करता और न विचरने की इच्छा करता है । जो स्वाभाविक आ पड़े, उसी मे स्थित होता है । यह परम मौन है ।