सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

१८४ * योगवाशिष्ठ *

यज्ञ कहते हैं। तीन दिन में धन का त्यागकर हाथी, घोड़े, रथ, भूषण, वस्त्र इत्यादिक जो ऐश्वर्य था सो लोगों को दे दिया। ब्राह्मण, अर्थी, पुत्र, स्त्री और शत्रुओं को सब पृथ्वी का राज्य दे दिया तब शत्रुओं ने जाना कि अब राजा भगीरथ में कुछ पराक्रम नहीं रहा। तब उन्होंने आकर उनका देश घेर लिया, हवेली पर चढ़ आये और राजा के सब स्थान रोक लिये। राजा के पास केवल धोती-अँगौछा रह गया। तब राजा वहाँ से निकलकर वनों में विचरने लगा और शान्तपद आत्मा में स्थित हुआ।

जब कुछ काल बीता तो भगीरथ फिर अपने देश में आया और अपने शत्रुओं के घर में भिक्षा माँगने लगा। तब शत्रुओं और दूसरे लोगों ने उसकी बहुत पूजा की और कहा, हे भगवन् ! तुम अपना राज्य लो। पर उसने राज्य न लिया। जैसे पृथ्वी पर पड़े तृण को तुच्छ समझकर कोई नहीं ग्रहण करता वैसे ही उसने राज्य नहीं ग्रहण किया। कुछ काल वहाँ रहकर त्रितल ऋषि के पास, जो उसका गुरु था, इच्छारहित होकर गया। गुरु ने आत्मदृष्टि से उसे ग्रहण किया। शिष्य ने भी गुरु को आत्मदृष्टि से ग्रहण किया। गुरु और शिष्य की भावना से रहित हो वे दोनों कुछ काल तक एक स्थान में रहे और फिर वन में इकट्ठे विचरने लगे। वे शान्त और आत्मपद में स्थित रहकर रागद्वेष से रहित केवल एकरस स्थित रहे। उनको न देह त्यागने की इच्छा थी, न देह रखने की। केवल स्वयं प्राप्त अनिच्छित प्रारब्ध में स्थित रहते थे। इतने में स्वर्गलोक के सिद्धों ने आकर उनकी पूजा की और बड़े ऐश्वर्य के पदार्थ चढ़ाये। बहुत सी अप्सराएँ आईं और जितने ऐश्वर्य के भोग पदार्थ थे, वे आये। पर उनको उन्होंने तुच्छ जाना; क्योंकि वे आत्मसुख में तृप्त और केवल आकाश-सदृश निर्मल शुद्ध थे अर्थात् प्रकाशरूप, समचित्त, कलङ्कतारूपी मल से रहित थे। हे राम ! जैसे राजा भगीरथ स्थित हुए हैं, वैसे ही तुम भी स्थित हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे निर्वाणवर्णनन्नाम चतुःषष्टितमस्सर्गः ॥ ६४ ॥

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १८५

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब कुछ काल बीता तो भगीरथ वहाँ से चला और एक देश में पहुँचा, जहाँ का राजा मर गया था और उसकी राजलक्ष्मी राजा को चाहती थी। राजा भगीरथ भिक्षा माँगता फिरता वहाँ पहुँचा। उस राजा के मन्त्री ने भगीरथ को देखा कि जो कुछ गुण और लक्षण राजा में होने चाहिए, वे इसमें हैं। इसलिए वह राजा भगीरथ से बोला, हे भगवन् ! आप इस राज्य को अङ्गीकार कीजिये; क्योंकि आपको यह बिना चाहे प्राप्त हुआ है। निदान राजा ने उस राज्य को ग्रहण किया और उसे न भला जाना, न बुरा। फिर राजा हाथी पर सवार हो सेना सहित सुशोभित हुआ। देश और सब स्थान सेना से पूर्ण हुए। जैसे मेघ से सरोवर पूर्ण होते हैं, वैसे ही वह देश और स्थान सेना से पूर्ण हो गये। नगाड़े और साज बजने लगे। तब राजा राजभवन में गया और महल की सब स्त्रियाँ आईं। इतने में जहाँ का राज्य भगीरथ ने पहले किया था, उस देश से मन्त्री और प्रजा जन आये। उन्होंने भगीरथ से कहा, हे भगवन् ! जिन शत्रुओं को तुमने राज्य दिया था, उनको मृत्यु ने भोजन कर लिया है। जैसे मछली मल मांस को खा लेती है, वैसे ही उनको मृत्यु ने भोजन कर लिया है। इससे अब चलकर तुम राज्य करो। यद्यपि इच्छा तुमको नहीं है, पर तो भी राज्य करो, क्योंकि जो वस्तु अनिच्छित प्राप्त हो उसका त्याग करना श्रेष्ठ नहीं।

इतना सुन राजा ने उस राज्य को भी अङ्गीकार किया और राज्य करने लगा। फिर राजा ने पिछला वृत्तान्त स्मरण कर कि मेरे पितर कपिल मुनि के शाप से भस्म हो कूप में पड़े हैं, यह विचार किया कि मैं उनका उद्धार करूँ; इसलिए अपने मन्त्री को राज्य देकर वह अकेला वन को चला और इच्छा की कि तप करूँ। निदान एक स्थान में स्थित होकर तप करने लगा। गङ्गा को पृथ्वी पर लाने के निमित्त उसने ब्रह्मा, रुद्र और जगत् ऋषि का सहस्र वर्ष पर्यन्त आरा-धन किया। तब गङ्गा, जो विष्णु भगवान् के चरणों से प्रकट हुई हैं, मध्य मण्डल में आईं। जब राजा पितरों के उद्धार के निमित्त गङ्गा के

१८६ योगवाशिष्ठ

प्रवाह को से आया, तब फिर समुचित और शान्तपद में स्थित होकर विचरने लगा। उसमें क्षोभ, भय और इच्छा न थी। वह केवल शान्त आत्मपद में स्थित हुआ। जैसे पवन से रहित समुद्र स्थिर होता है, वैसे ही संकल्प-विकल्प से रहित होकर वह राजा स्थिर हुआ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे भगीरथोपाख्यानसमाप्तिर्नाम पञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो भगीरथ की दृष्टि तुमसे कही है उसका आश्रय करके विचरो। यह दृष्टि सब दुःखों का नाश करती है। एक और ऐसा ही प्राचीन आख्यान है। ऐसे ही एक शिखिध्वज राजा हुआ था। इतना सुन राम ने पूछा, हे भगवन्! वह शिखिध्वज कौन था और उसका आचरण कैसा था, सो कृपा करके कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! सात मन्वन्तरों के बीतने के उपरान्त द्वापर-युग की चौथी चौकड़ी में राजा शिखिध्वज हुआ है और आगे फिर भी होगा। वह राजा सम्पूर्ण पृथ्वी का तिलक, महाशूरवीर और सम्पूर्ण ऐश्वर्य से सम्पन्न था, परन्तु उसमें बँधा हुआ या लिप्त न था। वह बड़े भोग भोगता था; बड़े ओज से सम्पन्न, उदार और धैर्यवान था। किसी के साथ अन्याय न करता था। समचित्त, शान्तपद में स्थित और सम्पूर्ण दुःखों से रहित था। याचक की सब प्रार्थना पूर्ण करता था। राम ने पूछा, हे भगवन्! ऐसा ज्ञानवान् राजा फिर क्यों जन्म पावेगा? ज्ञानी तो फिर जन्म नहीं पाता? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे एक समुद्र में कई समान तरङ्ग उठते हैं, कई अर्द्धसम और कई विलक्षण भाव से उठते हैं, वैसे ही आत्मसमुद्र में कई आकार एक से, कई अर्द्ध और कई विलक्षण भाव से उठते हैं, जो समान होते हैं, उनकी चेष्टा और आकार एक से दृष्टि आते हैं। इसी प्रकार शिखिध्वज की ऐसी ही उत्पत्ति होगी।

हे राम! जब इस सर्ग में सात मन्वन्तर और चार चौकड़ी द्वापर युग की बीत जायेंगी, तब जम्बूद्वीप के मालव देश में एक श्रीमान् शिखिध्वज राजा होगा। परन्तु वह आगे होनेवाला उस सा शिखर

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १८७

ध्वज दूसरा होगा, वह न होगा। प्रथम शिखिध्वज जब षोडश वर्ष का राजकुमार था, तब एक समय शिकार को निकला। वसन्त ऋतु का समय था, राजा अपने बाग में जा ठहरा, जहाँ फूलों के विचित्र कुंजभवन बने हुए थे। कमलिनियाँ मानों स्त्रियाँ और धूलि के कण उनके भूषण थे। उनके समीप पुष्पवृक्ष लगे थे। इसी प्रकार मँवरी और भँवरों की सुन्दर लीला देख राजा को विचार उपजा कि मुझे स्त्री प्राप्त हो तो मैं भी केलि करूँ। निदान उसे अधिक चिन्तना हुई कि कब मुझे स्त्री मिलेगी और कब उसके साथ फूल की शय्या पर शयन करूँगा। जब राजा इस प्रकार भोग का चिन्तन करने लगा, तब मन्त्रियों ने, जो त्रिकाल ज्ञान रखते थे और राजा के शरीर की अवस्था जानते थे, जाना कि हमारे राजा का मन स्त्री पर है, इससे अब राजा का विवाह करना चाहिए निदान एक राजा की कन्या जो बहुत सुन्दरी थी और वर चाहती थी, उससे राजा शिखिध्वज का विवाह शास्त्र की विधि से किया गया और राजा बहुत प्रसन्न होकर अपने घर आया।

उस स्त्री का नाम चूडाला था। वह बहुत सुन्दरी थी। उससे राजा की बहुत प्रीति हुई और उस स्त्री का भी राजा में बहुत स्नेह हुआ। जो कुछ राजा मन में चाहता, वह रानी पहिले ही पूरा कर देती थी। उनकी परस्पर प्रीति ऐसी बढ़ी, जैसे भँवरे और भँवरी में होती है। एक समय राजा मन्त्रियों को राज्य का भार सौंपकर वन को गया और वहाँ नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ करते हुए दोनों ऐसे विचरते रहे, जैसे सदाशिव और पार्वती या विष्णु और लक्ष्मी विचरें। इसके पश्चात् राजा योगकला सीखने लगे। इधर रानी राजा को भोगकला सिखाती थी। इसी प्रकार वे दोनों सम्पूर्ण कलाओं में पारंगत हुए। चूडाला की बुद्धि राजा की बुद्धि से तीक्ष्ण थी। वह शीघ्र ही सब बातें जान लेती और राजा को सिखाती थी।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वज चूडालोपाख्यानं नाम षट्षष्टितमसर्गः ॥ ६६ ॥

१८८ * योगवाशिष्ठ *

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी प्रकार जब राजा और रानी ने अनंत भोग भोगे तो जैसे कुम्भ में छिद्र होने से शनैः शनैः जल निकलता है, वैसे ही शनैः शनैः उनके यौवन के दिन निकल गये । जब वृद्धा-वस्था आई, तब राजा और रानी को वैराग्य उत्पन्न हुआ । वैराग्य में वे यह विचारने लगे कि यह संसार मिथ्या और बिनाशी है, एक सा नहीं रहता और ये भोग भी मिथ्या हैं। इतने काल तक हम इन्हें भोगते रहे, पर तृष्णा पूर्ण न हुई—बढ़ती ही गई । हे राम ! इस प्रकार राजा और रानी वैराग्य से विचारते रहे कि ये भोग मिथ्या हैं और हमारी यौवन अवस्था भी व्यतीत हो गई है । जैसे बिजली का चमत्कार क्षणमात्र होकर लीन जाता है, वैसे ही उनकी यौवन अवस्था व्यतीत हो गई और मृत्यु निकट आई है । जैसे नदी का वेग नीचे चला जाता है, वैसे ही आयु व्यतीत हो जाती है और जैसे हाथ पर जल डालने से बह जाता है, वैसे ही यौवन अवस्था निवृत्त हो जाती है । जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उपजकर लीन हो जाते हैं, वैसे ही यह शरीर क्षणभंगुर है । जहाँ चित्त जाता है, वहाँ दुःख भी इसके साथ जाते हैं—निवृत्त नहीं होते । जैसे मांस के टुकड़े के पीछे चील दौड़ती है, वैसे ही जहाँ अज्ञान है, वहाँ दुःख भी पीछे जाते हैं । यह शरीर भी नष्ट हो जायगा । जैसे पका हुआ आम का फल वृक्ष के साथ नहीं रहता, गिर पड़ता है, तैसे ही शरीर भी नष्ट हो जाता है । जो शरीर अवश्य गिरता है उसका क्या आदर करना है । जैसे सूखा पत्ता वृक्ष से गिर पड़ता है, वैसे ही यह शरीर गिर पड़ता है । इसमें हम ऐसा कुछ करें कि संसाररूपी रोग निवृत्त हो । यह संसाररूपीरोग ब्रह्मविद्या की औषध से निवृत्त होता है; ब्रह्मविद्या से ज्ञान उपजता है और आत्मज्ञान से सब दुःख निवृत्त हो जाते हैं । इसके सिवा और कोई उपाय नहीं । इसलिए आत्मज्ञान के निमित्त हम सन्तों के पास जायँ ।

ऐसे विचार करके राजा और चूड़ाला आत्मज्ञानियों के पास चले । वे आत्मज्ञान की बातें करते थे और आत्मज्ञान में ही चित्तभावना कर

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १८६

आपस में उसी का विचार और चर्चा करते थे। निदान वे ऐसे सन्तों के पास पहुँचे, जो संसारसमुद्र से तारनेवाले और आत्मज्ञानी थे उनकी पूजा करके उन्होंने उनसे प्रश्न किया। राजा और रानी उनसे ब्रह्म-विद्या सुनने लगे कि आत्मा शुद्ध, आनन्दरूप, चैतन्य और एक है, जिसके पाने से दुःख निवृत्त हो जाते हैं। हे राम! तब रानी चूड़ाला तत्त्व विचार में लग गई। वह राजा की कोई सेवा टहल करती तब भी उसके चित्त की वृत्ति विचार ही में रहती थी। वह यह विचारती कि मैं क्या हूँ? यह संसार क्या है और संसार की उत्पत्ति किससे है? ऐसे विचार कर वह जानने लगी कि यह शरीर पञ्चतत्त्व का है अतएव मैं शरीर नहीं हूँ, शरीर जड़ है और कर्म इन्द्रियाँ भी जड़ हैं। जैसे शरीर है, वैसे ही शरीर के अङ्ग भी हैं। ये चेष्टा ज्ञान-इन्द्रियों से करते हैं। ज्ञान-इन्द्रियाँ भी मैं नहीं, क्योंकि ये भी जड़ हैं, स्वयं कुछ नहीं कर सकतीं। मन से इन्द्रियों की चेष्टा होती है, सो मन भी जड़ है; इसमें संकल्प-विकल्प बुद्धि से होता है। बुद्धि भी जड़ है; क्योंकि उसमें निश्चय की चेतना अहंकार से होती है। और अहंकार भी जड़ है, क्योंकि उसमें अहं चेतना से होती है। वह चेतनता जीव से होती है। वह जीव भी मैं नहीं हूँ, क्योंकि जीवत्व स्फुरणरूप है और मेरा स्वरूप वासनाहीन, सदा उदय रूप और सन्मात्र है। मेरा बड़ा सौभाग्य है और कल्याण होनेवाला है, इसी से चिरकाल के उपरान्त मैंने अपना स्वरूप पाया है, जो अविनाशी, अनन्त और आत्मा है। जैसे शरत् काल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही मैं निर्मल विगताम्बर, राग-द्वेषरूपी ताप रहित, चिन्मात्र और अहं-त्व से रहित हूँ। मुझमें कोई वासना नहीं; इसी में शान्तरूप हूँ। जैसे क्षीरसमुद्र मन्दराचल के हटने से शान्तरूप है, वैसे ही मैं चित्त से रहित, निश्चल और अद्वैत हूँ। कभी मेरा स्वरूप परिणाम या विकार को नहीं प्राप्त होता। ऐसा जो चिन्मात्रपद है, उसको ब्रह्म-ज्ञानियों ने ब्रह्म, परमात्मा और चैतन्य संज्ञा दी है। यह आत्मा ही मन, बुद्धि आदिक दृश्य और संसाररूप होकर फैला है। यह स्वरूप से अच्युत है। चित्त के चेतने से इसमें नाना

२६० | योगवाशिष्ठ

आकार भासित होते हैं, पर वे सब रूप आत्मा से भिन्न नहीं हैं। जैसे बड़े पर्वत के जो पत्थर और बट्टे होते हैं, वे पर्वत से भिन्न नहीं होते, वैसे ही यह दृश्य आत्मा से भिन्न नहीं है। ये आकार ऐसे हैं जैसे गन्धर्वनगर नाना आकार का ही भासित होता है, पर ज्ञानवान् को एकरस है और अज्ञानी को भेद-भावना है। जैसे बालक मृत्तिका के खिलौने हाथी, घोड़ा, राजा, प्रजा आदि बनाता है, और जिसको मृत्तिका का ज्ञान है उसको मृत्तिका ही वे सब भासित होते हैं, भिन्न-कुछ नहीं प्रतीत होता, वैसे ही अज्ञान से नानारूप भासित होते हैं। अब मैंने जाना है कि मैं एकरस हूँ।

हे राम ! इस प्रकार चूड़ाला अपने को जानने लगी कि मैं सन्मात्र, अच्छेद्य, अदाह्य, स्वच्छ, अक्षर और निर्मल हूँ। मुझमें 'अहं' 'त्वं' 'एक' और 'द्वैत' शब्द कोई नहीं, और जन्म, मरण भी नहीं, यह संसार चित्त में भासित होता है, वास्तव में आत्मस्वरूप है। देवता, यक्ष, राक्षस, स्थावर, जङ्गम आदि सब आत्मरूप हैं। जैसे तरङ्ग और बुलबुले समुद्र से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से कोई वस्तु भिन्न नहीं। दृश्य, द्रष्टा, दर्शन ये भी आत्मा की सत्ता से चेतन हैं; इनकी अपने आपमें सत्ता नहीं है। मुझमें अहं का उत्थान कदापि नहीं होगा, क्योंकि मैं अपने आपमें स्थित हूँ। अब इसी पद का आश्रय करके चिरकाल इस संसार में विचरूँगी।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चूड़ालाप्रबोधो नाम सप्तषष्टितमस्सर्गः ॥ ६७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! फिर चूड़ाला, जिसकी तृष्णा निवृत्त हो गई थी और जो दुःख, भय और भोगवासना से निवृत्त होकर केवल शान्तपद को पाकर शोभित हुई थी, पाने योग्य पद पाकर जानने लगी कि इतने काल तक में अपने स्वरूप से गिरी थी; अब मुझे शान्ति मिली है और सब दुःख मिट गये हैं। अब मुझे कुछ ग्रहण और त्याग नहीं करना है अब मैं अपने आत्मस्वभाव में स्थित हुई हूँ निदान एकान्त में बैठ उसने समाधि लगाई जैसे वृद्ध गरु पर्वत की कन्दर पाकर तृण

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १८१

और घाम से बहुत प्रसन्न होती है वैसे ही अपने आनन्दरूप को पाकर चूड़ाला उर्मी में अवस्थित हुई। हे राम ! वह ऐसे आनन्द को प्राप्त हुई, जिसको वाणी में नहीं कह सकते। तब रानी को देखकर राजा शिखिध्वज को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोला—हे अङ्गने ! अब तुम फिर यौवन अवस्था को प्राप्त हुई हो और तुमको कोई बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ है। शायद तुमने अमृत का सार पान किया है, इससे अमर हुई हो। या किसी योगेश्वर से तुमने इस कला को प्राप्त किया है; अथवा त्रिलोकी का ऐश्वर्य तुम्हें प्राप्त हुआ है। क्या बात है ? हे अङ्गने ! तुम्हें कौन वस्तु मिली है ? तुम्हारे चित्त की वृत्ति से ऐसा जान पड़ता है कि तुमने अमृत का सार पान किया है व त्रिलोकी के राज्य से भी कोई अधिक पदार्थ पाया है। तुम तो किसी ऐसे बड़े आनन्द को प्राप्त हुई हो, जिसका आदि-अन्त नहीं है। अब तुममें भोगवासना भी नहीं दीखती, शान्तरूप हो गई हो। जैसे शरदकाल का आकाश निर्मल होता है, वैसे ही तुममें निर्मलता दीखती है। और तुम्हारे श्वेत केश भी बड़े सुन्दर लगते हैं। इसलिए बताओ, तुम्हें कौन सी वस्तु हुई है।

चूड़ाला बोली, हे राजन् ! यह जो कुछ दीखता है सो किंचन है। इससे रहित जो निष्किंचनपद है, उसको पाकर मैं श्रीमान् हुई हूँ। जिसका आकार निष्किंचन है और जिसमें दूसरे का अभाव है उर्मी को पाकर मैं श्रीमान् हुई हूँ। और जो कुछ भोग हैं, उनसे रहित होकर अभोग भोग भोगकर उस भोग में नष्ट हुई हूँ। अर्थात् मैंने आत्मज्ञान और आत्मा में विश्राम पाया है, जिससे सदा शान्तरूप और श्रीमान् हूँ। हे राजन् ! जितने ये राजभोग्य सुख हैं, उनको त्यागकर में परम-सुख को भोगती हूँ और राग द्वेष से रहित होकर में ऐसी बनी हूँ कि 'अस्त' भी हूँ और 'नास्ति' भी हूँ। जो कुछ नेत्रों से दिखता है, इन्द्रियों से जाना जाता है और मन से चिन्तन होता है, वह सब स्वप्न सा मिथ्या है। मैं वहाँ स्थित हुई हूँ, जहाँ इन्द्रिय और मन की गति नहीं और अहंकार का उत्थान नहीं, उस पद को मैंने पाया है, जो सबका

१८२ 🌟 योगवाशिष्ठ 🌟

आधार, सबका आत्मा और सर्व अमृत है, उसका सार अमृत मैंने पान किया है। इससे मेरा कदापि नाश नहीं और कदापि मुझे कोई भय भी नहीं है। हे राम! जब इस प्रकार रानी ने कहा तो राजा शिखिध्वज उसके वचन न समझा और हँसकर बोला, हे मूर्ख स्त्री! यह तू क्या कहती है? प्रत्यक्ष वस्तु को झूठ बताती है और कहती है कि मैं नहीं देखती। और असत्य वस्तु, जो नहीं दीखती, उसको सत्य कहती है और कहती है कि में दीखती हूँ। ये वचन तेरे कौन मानेगा? इन वचनोंवाला शोभा नहीं पाता। तू जो कहती है कि मैं ऐश्वर्य को त्यागकर श्रीमान् हुई हूँ, सो निष्किञ्चन को पाकर इन वचनोंवाला शोभा नहीं पाता। तू कभी कहती है कि इन भोगों को मैंने त्याग दिया है और इनमें रहित जो अभाग हैं, उनको भोगती हूँ; कभी कहती है कि मैं कुछ नहीं; फिर कहती है, मैं ईश्वर हूँ; इससे महामूर्खता देख पड़ती है। जो इसी में तेरा चित्त प्रसन्न है, तो ऐसे ही विचर; परन्तु यह बात सुनकर इसे कोई सत्य न मानेगा और तुझे यह शोभा भी नहीं देता।

हे राम! ऐसे कहकर राजा उठ खड़ा हुआ और मध्याह्न का समय हो जाने से स्नान के निमित्त गया। रानी के मन में बहुत शोक हुआ। उसने विचार किया कि यह बड़े कष्ट की बात है, जो राजा ने आत्मपद में स्थित न पाई और मेरे वचनों को न जाना। यही मन में सोचकर वह अपने आचार में लगी और फिर अपना निश्चय राजा को न बताया। जैसे अज्ञान-काल में चेष्टा करती थी, वैसे ही अब ज्ञान पाकर भी करने लगी। एक समय रानी के मन में आया कि प्राणों को ऊपर चढ़ाऊँ और ऊर्ध्व को लाकर उदान और अपान को वश करूँ, जिससे आकाश और पाताल दोनों स्थानों में जाऊँ। ऐसे सोच-कर रानी योग में स्थित हुई और प्राणायाम करने लगी। इतना सुनकर राम ने पूछा, हे भगवन्! यह संसार संकल्प से उत्पन्न हुआ है। स्थावर-जङ्गमरूप संसार वृक्ष है और संकल्प इसका बीज। वह कौन प्राणायाम पवन है, जिससे आकाश को उड़ते हैं और फिर नीचे आते हैं? अज्ञानी पुरुष भी उसे यत्न करके कैसे सिद्ध करते हैं और ज्ञानवान्

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ १६३

कैसे लीला करके विचरते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! तीन प्रकार की सिद्धि होती हैं—एक तो उपादेय सिद्धि है कि यह वस्तु मुझे मिले। इसके निमित्त अज्ञानी यत्न करते हैं। दूसरी सिद्धि यह है कि यह दुःख मेरा निवृत्त हो और में सुखी हो जाऊँ। यह चिन्ता महा अज्ञानी की रहती है और तीसरी सिद्धि यह है कि जो मैं कर्म करता हूँ, उसका फल मुझे मिले। यह विचार करनेवाला भी अज्ञानी है; क्योंकि वह अपने को कर्त्ता मानता है। ज्ञानवान् इनको नाँघकर वरतता है। वह अगर कभी इनमें वरतता भी है, तो उसको यह निश्चय रहता है कि न मैं कर्त्ता हूँ, न भोक्ता हूँ। योग करके लोग इस प्रकार सिद्ध होते हैं कि देश, काल, वस्तु और क्रिया उनके अधीन हो जाती हैं। मुख में गुटका रखके जहाँ चाहे उसी स्थान में पहुँच जाना, नेत्रों में अञ्जन डाल के जिसको देखना चाहे उसको देख लेना और खड्ग हाथ में धारण करके सम्पूर्ण पृथ्वी का वश कर लेना—यह क्रिया पदार्थ है। और देश यह है कि जो सब पर्वत हैं, उनमें कितने ही पीठ हैं, जो बड़े उत्तम हैं।

जिस प्रकार ये सिद्ध होते हैं सो भी सुनो। नाभि के तले आधार-चक्र में एक कुण्डलनी शक्ति है। सर्पिणी की नाईं उसमें कुण्डल है और वह कुण्डल मार बैठी है। वासना ही उसका विष है। जितनी नाड़ी हैं, उन सबकी यह समष्टि है। उस कुण्डलिनी में जब मनन होता है, तब मन प्रकट होता है। जब निश्चय होता है तब बुद्धि प्रकट होती है। जब अहंभाव होता है, तब अहंकार प्रकट होता है। जब स्मरण होता है, तब चित्त प्रकट होता है और जब उसमें स्पर्श की इच्छा होती है तब पवन प्रकट होता है। इसी प्रकार पञ्चतन्मात्राएँ और चारों अन्तःकरण प्रकट होते हैं। जितनी नाड़ी हैं, वे सब कुण्डलिनी में प्रकट होती हैं और आत्मा का प्रकट होना भी उससे जाना जाता है।

राम ने पूछा, हे भगवन्! उसमें आत्मा का प्रकट होना कैसे जाना जाता है? आत्मा तो देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है और सब देश, सब काल और सब वस्तुओं में पूर्ण है। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जल में और धूप में सब जगह दीखता

१८४ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता सर्वत्र समान है और प्रकट सात्त्विकगुण में दीखती है। जो कुछ नाड़ियाँ और इन्द्रियाँ हैं, वे कुण्डलिनी शक्ति से उदय होती हैं। जब यह जीव कुण्डलिनी शक्ति में स्थित होकर पवन को स्थिर करता है, तब जो कुछ भीतर प्राणवायु हैं, वे सब इसके वश होते हैं। जैसे सब सेना राजा के वश होती है, उसी प्रकार सब इन्द्रियाँ प्राण के वश होती हैं। जो प्राणवायु वश नहीं होता तो आधि-व्याधि अंग उपजते हैं।

राम ने पूछा, हे भगवन ! आधि-व्याधि कैसे होती है, सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मन की पीड़ा का नाम आधि है और देह के दुःख को व्याधि कहते हैं। आधि तब होती है, जब संकल्प होता है कि यह सुख मुझे मिले। पर यदि वह वस्तु नहीं प्राप्त होती, तब चिन्ता करके मनुष्य दुःख पाता है। और व्याधि तब होती है, जब वात, पित्त, कफ का विकार शरीर में होता है और उससे मनुष्य दुःख पाता है। जब मन और शरीर का दुःख इकट्ठा होता है, तब आधि-व्याधि, दुःख इकट्ठे होते हैं; और जब भिन्न-भिन्न होते हैं, तब दुःख भी भिन्न-भिन्न होते हैं। ज्ञानवान् को न आधि होती है, न व्याधि। यह योग की कला मैंने विस्तार से नहीं कही; क्योंकि पूर्व के ज्ञानक्रम का प्रसंग रह जायगा। जितनी कला है, उन सबको मैं जानता हूँ; परन्तु यह कला ज्ञान-मार्ग को रोकनेवाली है। वासना चार प्रकार की है, सो सुनो। एक वासना सुषुप्ति है, दूसरी स्वप्न, तीसरी जाग्रत और चौथी क्षीण। स्थावर योनि की सुषुप्ति वासना है, सो आगे चेतेगी। तिर्यक्-योनि की स्वप्न वासना है, उनको वासना का ज्ञान भी नहीं। जङ्गम अर्थात् मनुष्य, देवता आदि की जाग्रत वासना है। वे वासना ही में लगे हैं। ये तीन वासना तो अज्ञानी की हैं। और क्षीण वासना ज्ञानी की है अर्थात् उनको वासना की सत्यता नष्ट हो जाती है। जब इस प्रकार वासना निवृत्त होती है तब आगे संसार भी नहीं रहता। जब कुण्डलिनी शक्ति में वासना उठती है, तब पञ्चतन्मात्राओं के द्वारा संसार का भान होता है। संसाररूपी वृक्ष का बीज वासना ही है। दसों

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ १६५

दिशाएँ उस वृक्ष के पत्ते हैं, शुभ-अशुभ कर्म उसके फल हैं और स्थावर-जंगम फल हैं। जैसी-जैसी वासना पुर्यष्टक से मिलकर जीव करता है, वैसा ही आगे फल होता है।

हे राम ! इससे वासना का त्याग करो। वासना ही संसाररूपी वृक्ष का बीज है और निर्वासनिक होना ही पुरुषप्रयत्न है। तब विश्व कदापि न भासित होगा। जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकाररूपी रात्रि नहीं रहती, वैसे ही ज्ञानरूपी सूर्य के उदय होने पर संसाररूपी अन्धकार निवृत्त हो जाता है। हे राम ! आधि-व्याधि बड़े रोग हैं। वे मन में होते हैं। राम ने पूछा, हे भगवन् ! आधिरोग तो मन में होता है, पर व्याधि तो शरीर का रोग है; वह मन से कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! व्याधि दो प्रकार की है। एक लघु और दूसरी दीर्घ। जो शरीर को कोई दुःख प्राप्त हो, उसे लघु कहते हैं। वह स्नान और जप से निवृत्त हो जाती है। दीर्घव्याधि जन्म-मरण के रोग को कहते हैं। वे बड़े रोग हैं और मन के शान्त हुए बिना निवृत्त नहीं होते। इसी से आधिव्याधि दोनों मन से होते हैं। फिर राम ने पूछा, हे भगवन् ! व्याधि मन से कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब चित्त शान्त होता है, तब कोई रोग नहीं रहता। जब तक चित्त शान्त नहीं होता, तब तक आधिव्याधि होती है। जो कुछ अन्न बाहर अग्नि में परिपक्व होता है, उसको जब मनुष्य भोजन करते हैं तब भीतर जो कुण्डलिनी पुर्यष्टका से मिली हुई है, वह उदान पवन को ऊर्ध्वमुख हो उठाती है और अपान पवन उससे नीचे को उठता है। उदान और अपान का आपस में विरोध है—उनके क्षोभ में अग्नि उठती है और हृदयकमल में स्थित होती है। तब बाहर अग्नि का पका भोजन हृदय की अग्नि में फिर पकता है और सब नाड़ियाँ अपने-अपने भाग रस को ले जाती हैं। वीर्यवाली नाड़ी वीर्य को और रुधिरवाली नाड़ी रुधिर को रखती है। पर जब राग और द्वेष में चित्त कुण्डलिनी शक्ति में क्षोभ को प्राप्त होता है, तब नाड़ी अपने-अपने स्थानों को छोड़ देती हैं और अन्न भी भीतर पक्व नहीं होता। तब उस कच्चे रस से रोग

१६६ योगवाशिष्ठ

उठता है। जैसे राजा को क्षोभ होता है तो सेना को भी क्षोभ होता है और जब राजा को शान्ति होती है तब सेना को भी शान्ति होती है, वैसे ही जब मन में क्षोभ होता है, तब रोग होता है और जब मन में शान्ति होती है, तब नाड़ी अपने-अपने स्थानों में स्थित होती है—कोई रोग नहीं होता। इससे हे राम ! आधिव्याधि रोग तब होते हैं जब मनुष्य का चित्त निर्वासनिक नहीं होता, पर जब चित्त शान्त होता है, तब रोग कोई नहीं रहता। इससे निर्वासनिक पद में स्थित हो।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! पीछे आपने कहा है कि मन्त्रों से भी रोग निवृत्त होता है, सो कैसे निवृत्त होता है ? वशिष्ठजी ने कहा, हे राम ! प्रथम मनुष्य को श्रद्धा होती है कि इस मन्त्र से रोग निवृत्त होगा, तब पुण्यक्रिया, दान, सन्तजनों की संगति और य, र, ल, व आदिक जो अक्षर हैं इनका जप करके (क्योंकि जितने कुछ जप और मन्त्र हैं सो इन अक्षरों में सिद्ध होते हैं) व्याधिरोग निवृत्त हो जाता है। योगीश्वरों का क्रम अणु और स्थूल है सो भी सुनो। जब ये प्राण और अपान कुण्डलिनी शक्ति में स्थित होते हैं तो इनको वश करके योगी गम्भीर होता है। जैसे मशक में पवन होता है इसी प्रकार पवन को स्थित करके कुण्डलिनी सुषुम्णा में प्रवेश करती है और ब्रह्मरन्ध्र में जा स्थित होती है। एक मुहूर्त्त पर्यन्त वहाँ स्थित हो तो मनुष्य आकाश में सिद्धियाँ देखता है। जिस प्रकार इसका क्रम है, वह भी तुमसे कहता हूँ। हे राम ! सुषुम्णा के भीतर जो ब्रह्मरन्ध्र है, उसमें जब पूरक द्वारा कुण्डलिनी शक्ति स्थित होती है, अथवा रेचक प्राण वायु के प्रयोग से द्वादश अंगुल पर्यन्त मुख से बाहर अथवा भीतर या ऊपर एक मुहूर्त्त तक एक ही बार स्थित है, तब आकाश में सिद्धों का दर्शन होता है।

राम ने पूछा, हे ब्रह्मन् ! जब ब्रह्मरन्ध्र में जीव-कला जाकर स्थित होती है, तो कैसे दर्शन होता है ? दर्शन तो नेत्रों से होता है, सो नेत्र आदि इन्द्रियां कोई नहीं होतीं; नेत्रों बिना दर्शन कैसे होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे महाबाहु राम ! पृथ्वी में विचरनेवालों को आकाश

१६८ योगवाशिष्ठ

भीतर दो कमल हैं, एक अधः और दूसरा ऊर्ध्व । अधः में चन्द्रमा की स्थिति है और ऊर्ध्व में सूर्य की स्थिति है । उनके मध्य में कुण्डलिनी लक्ष्मी स्थित है । जैसे पद्मराग मणि का सम्पुट हो या मोतियों का भण्डार हो, वैसे ही उसका महाउज्ज्वलरूप है । जैसे आवर्त में फेन के मिलने से शलशल शब्द प्रकट होता है, वैसे ही उसमे शब्द निकलता है, और जैसे डगडे के साथ हिलाने से सर्पिणी शब्द करती है, वैसे ही उस कुण्डलिनी में प्रणव शब्द का उदय होता है । हे राम ! आकाश और पृथ्वी जो ऊर्ध्व और अधःरूप दो कमल हैं, उनके मध्य में स्पन्दनरूपिणी कुण्डलिनी शक्ति स्थित है । वह जीवकला पुर्यष्टक का अनुभवरूप अति प्रकाशमान सूर्य की तरह हृदयरूप कमल की भ्रमरी है । वह सबका अधिष्ठान आदि-शक्ति हृदयकमल में विराजमान है । उस हृदयाकाश में कुण्डलिनी शक्ति है । उसमें से कोमल मृदुरूप स्वाभाविक वायु निकलती है । वही पवन निकलकर दो होता है, एक प्राण और दूसरा अपान । वही परस्पर मिलकर स्फुरणरूप होता है । जैसे वृक्ष के पत्तों के हिलने से उनसे शीघ्र ही अग्नि प्रकट होती है, या बाँसों की रगड़ में अग्नि प्रकट होती है, वैसे ही प्राण अपान से अग्नि प्रकट होकर जब आकाश में उदय होती है, तब सब ओर से भीतर प्रकाश होता है । जैसे सूर्य के उदय होने पर सब ओर से भुवन प्रकाशित होते हैं, वैसे ही सब ओर से हृदय प्रकाशित होता है । सूर्यरूप तारा अग्नि-सदृश तेज के आकार है । हृदयकमल का आकार स्वर्णरूप है और उसके चिन्तन से योगी तद्गत होते हैं । वह प्रकाश ज्ञानरूप है और उस तेज से योगी की वृत्ति तद्गत होती है अर्थात् एकत्वभाव को प्राप्त होती है । तब लक्ष योजन पर्यन्त जो पदार्थ हों, उनका उसे ज्ञान हो आता है और सब प्रत्यक्ष देख पड़ते हैं । हृदयरूपी सरोवर उस अग्नि का स्थान है । जैसे बड़वाग्नि समुद्र में रहती है और उसका जल ही इन्धन है अर्थात वह जल को दग्ध करती है, वैसे ही हृदयरूप सरोवर में उसका निवास है और वह रस-शीतलता रूप जल को पचाती है । उस हृदयकमल में जो अपानरूप शीतल वायु प्रकट होता है, उसका नाम

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ १६६

चन्द्रमा है, और प्राणरूप उष्ण पवन जो प्रकट होता है, वह सूर्यरूप है। वही उष्ण और शीतल पवन सूर्य और चन्द्रमा के नाम से देह में स्थित है। आदि-प्राण वायुरूप सूर्य और अपानरूप चन्द्रमा से सूर्यरूप होकर स्थित होता है। सूर्य उष्ण और चन्द्रमा शीतल है। इन दोनों से जगत् हुआ है। विद्या, अविद्या, सत्य, असत्यरूप जगत् इन दोनों से युक्त है। सत्, चित्, प्रकाश, विद्या, उत्तरायण, सूर्य, अग्नि आदिक नाम बुद्धिमान् निर्मलभाव के कहते हैं। और असत्, जड़, अविद्या, तम, दक्षिणायन आदिक नाम चन्द्रमारूप से मलिनभाव के कहते हैं।

रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अग्नि, सूर्यरूप जो प्राणवायु है उसमें शीतल जलमय अपानरूप चन्द्रमा कैसे उत्पन्न होता है और अपान जल चन्द्रमारूप से सूर्य कैसे उत्पन्न होता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! सूर्य चन्द्रमा जो अग्नीषोम कहलाते हैं, वे परस्पर कार्य-कारणरूप हैं। जैसे बीज से अंकुर और अंकुर से बीज होता है, जैसे दिन से रात्रि और रात्रि से दिन होता है और जैसे छाया से धूप और धूप से छाया होती है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रमा परस्पर कार्य-कारण होते हैं। कभी कभी इनकी एकत्र उपलब्धि भी होती है। जैसे सूर्य के उदय होने पर धूप और छाया दोनों एकत्र हो जाते हैं। कार्य-कारण भी दो प्रकार का है—एक कार्य सत्यरूप परिणाम से होता है, दूसरा विनाशरूप परिणाम से होता है। एक से जो दूसरा होता है वैसे ही हैं। जैसे बीज नष्ट हो गया हो तो उससे अंकुर होता है। यह विनाशरूप परिणाम हुआ। और जैसे मृत्तिका से घट उपजता है, वह सत्यरूप परिणाम कहाता है। जो कारण-कार्य के भाव में भी इन्द्रियों से देख प्रत्यक्ष पाइये, उनका नाम सत्यरूप परिणाम है। और जो कार्य में इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं पाया जाता, जैसे दिन में रात्रि और रात्रि में दिन, वह विनाशरूप परिणाम कहाता है। जैसे प्रत्यक्ष प्रमाण है, वैसे ही अभाव प्रमाण भी है। इसमें विनाशभाव भी एक कारणरूप है। युक्तिवादी कहते हैं कि अपने संवित् में कर्तव्य नहीं बनता इत्यादि, सो वे इस अर्थ की अवज्ञा करते हैं और अपने अनुभव को नहीं जानते।

२८० योगवाशिष्ठ

अनुभव की युक्ति उनको नहीं आती। यह अभाव प्रमाण भी प्रत्यक्ष प्रकट है। शीतलता का परिणाम यह है कि जैसे अग्नि के भाव से शीतलता के अभाव में उष्णता होती। दिन के अभाव में रात्रि और छाया के अभाव में धूप इत्यादि का नाम अभाव परिणाम है। अग्नि-में धूम्र-भाग निकलता है, वह मेघ बनता है, इस कारण अन्नरूप परिणाम से चन्द्रमा का कारण अग्नि होता है और अग्नि नष्ट होकर शीतलभाव को प्राप्त होता है, तब उसका नाम विनाश परिणाम है, जिससे अग्नि चन्द्रमा का कारण होता है। सात समुद्रों का जल पान करके बड़वाग्नि धूम्र को उगलता है सो धूम्र मेघ को प्राप्त होकर अत्यर्थ जल का कारण होता है। सूर्य जो विनाश के अर्थ चन्द्रमा का पान करता है सो अमावस्या पर्यन्त बारम्बार भक्षण करता है, और फिर शुक्लपक्ष में उसे उगलता है। जैसे सारस पक्षी भीठ की जड़ को भक्षण करके उगल डालता है। हे राम! अमृत के समान शीतल जो चन्द्रमारूप अपान वायु है, वह मुख के अग्रभाग में रहता है। वह कणिका रूप जल जब शरीर में जाता है, तब वह जल का अणु अपान और सूर्यरूपी प्राण स्फुरण को प्राप्त होता है। इस प्रकार अन्नरूप परिणाम में जल अग्नि का कण होता है; जब जल का नाश हो जाता है तब वह उष्णभाव अग्नि को प्राप्त होता है—इसका नाम विनाश परिणाम है। इस प्रकार जल अग्नि का कारण कहलाता है। अग्नि का नाश होने पर चन्द्रमा उत्पन्न होता है। इसका नाम विनाश परिणाम है। और चन्द्रमा का अभाव होने पर अग्नि उत्पन्न होता है। इसका नाम भी विनाश परिणाम है। जैसे तम के अभाव में प्रकाश का उदय होता है और प्रकाश के अभाव में तम होता है; दिन के अभाव में रात्रि और रात्रि के अभाव में दिन होता है; इसके मध्य में जो विलक्षणरूप है, उसे बुद्धिमान भी नहीं जान पाते। वह तम और प्रकाश दोनों रूपों से मुक्त है। इनके मध्य में जो संधि है सो आत्मरूप है। उसमें स्थित होकर चेतन और जड़ दोनों रूपों में भूत स्फुरित होते हैं। जैसे दिन और रात्रि, तम और प्रकाश से पृथ्वी में चेष्टा करते हैं सो चेतन और

निर्वाण प्रकरण२०१

जडरूप सूर्य और चन्द्रमा दोनों रूपों से युक्त है। निर्मलरूप प्रकाश जो चिद्रूप है, उसका नाम सूर्य है। और जड़ात्मक तमरूप चन्द्रमा का शरीर है। जब निर्मल चैतन्यरूप सूर्य आत्मा का दर्शन होता है, तब संसार के दुःखरूप जो तम हैं वे नष्ट हो जाते हैं-जैसे आकाश में सूर्य के उदय में श्याम रात्रि का तम नष्ट हो जाता है। जड़ चन्द्रमा रूप देह को जब देखता है, तब चैतन्यरूप सूर्य नहीं भासित होता-असत्य की नाईं हो जाता है, और जब चैतन्य की ओर देखता है, तब देह नहीं भासित होता। केवल-लक्ष में दूसरे की उपलब्धि नहीं होती। केवल चैतन्यपद को प्राप्त होने पर द्वैत से रहित निर्वाणभाव होता है, और जड़भाव को प्राप्त होने पर चैतन्य नहीं भासित होता। इससे संसार के दर्शन का कारण दोनों हैं। चेतन सूर्य में जड़ चन्द्रमा की उपलब्धि होती है और जड़ चन्द्रमा में चेतन सूर्य की उपलब्धि होती है। जैसे अग्निरूप प्रकाश अंधकार के बिना सिद्ध नहीं होता, वैसे ही इन दोनों की संधिविना आत्मा की उपलब्धि नहीं होती। प्रकाश बिना केवल जड़ की उपलब्धि भी नहीं होती। जैसे सूर्य का प्रतिबिम्ब जिस दीवार पर पड़ता है, वह दीवार प्रकाश से चमकती है और प्रकाश दीवार से चमकता है, वैसे ही चित्त जब फुरता है, तब जीव को जगत् भासित होता है और फुरना जगत् से होता है। फुरने से रहित अचेत्य चिन्मात्र निर्वाण है। इससे हे राम! जगत् को अग्नि और सोम जानो। चेतन का देह से सम्बन्ध है, परन्तु जिसका आधिक्य होता है उसकी जय होती है। प्राण-अग्नि उष्णरूप है और अपान शीतल-चन्द्रमारूप है। ये दोनों प्रकाश और छायारूप हैं-इनको जानना सुख का मार्ग है। हे राम! जब बाहर से शीतलरूप अपान भीतर को आता है, तब उष्णरूप प्राण में जाकर स्थित होता है और जब हृदयस्थान से निकलकर उष्णरूप प्राण बाहर को द्वादश अंगुल पर्यन्त जाता है; तब अपान जो चन्द्रमा का मण्डल है, उसको प्राप्त होता है। अपान प्राण-रूप होकर और प्राण अपानरूप होकर उदय होता है। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब पड़ता है, वैसे ही इनका परस्पर आपस में प्रतिबिम्ब पड़ता

२०२ * योगवाशिष्ठ *

है। जहाँ षोडशकला चन्द्रमा को सूर्य ग्रस लेता है, उस मध्यभाव में तुम स्थित होओ। जब अपान प्राणों के स्थान में आकर स्थित होता है और प्राणरूप होकर उदय नहीं होता सो यह शान्तिरूप भाव है—उसमें स्थित होओ। प्राण निकलकर जब मुख से द्वादश अंगुल पर्यन्त बाहर स्थित होता है और जबतक अपान भाव को प्राप्त होकर उदय नहीं होता, वह जो मध्यभाव है, उसमें तुम स्थित होओ। मेष आदिक जो द्वादश राशियाँ हैं, उनमें एक को त्यागकर दूसरी राशि को जब तक संक्रान्ति नहीं प्राप्त होती, उसका नाम संक्रान्ति है और उनके मध्य में जो सन्धि है उसका नाम पुण्यकाल है। वह पुण्यकाल भीतर और बाहर प्राण-अपान की सन्धि के समय में तृणवत् है। उन संक्रान्तियों में जो वैशाख की विषुवत संक्रान्ति है, सो शिवरात्रि है। चैत्र की संक्रान्ति में त्रयोदश दिन होते हैं और अस्त की संक्रान्ति में त्रयोदश दिन हैं। इनका नाम विषुवत है। जहाँ दिन और रात्रि सम होते हैं और दक्षिणायण और उत्तरायण की जो सन्धि होती है, इनके भीतर और बाहर भेद को जाने, तब जन्म से रहित होकर परम बोध को प्राप्त हो। हे राम! उत्तरायण मार्ग योगीश्वरों का है उसमें वे क्रम से मुक्त होते हैं। दक्षिणायण मार्ग कर्म करनेवालों का है, इसमें वे फिर संसारमार्गी होते हैं। उनके मध्य में जो संधि है, उसमें स्थित होने से परमपद प्राप्त होता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अग्निसोमविचारयोगो नामाष्टषष्टितमसर्गः ॥ ६८ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह योग की सब कला मैंने विस्तार से कही। इसमें उत्तम प्रभाव वर्णन हुआ है। प्रयोजन यही है कि तुम निर्वाण पद में स्थित हो और आत्मब्रह्म की एकता करो, जिससे फिर जन्म मरण आदि का दुःख न हो। ब्रह्म सत्, चित्, आनन्द स्वभाव-मात्र है। एक आत्मा में एकत्वभाव होते हैं, वही भाव रहते हैं। धर्मी शक्ति का धर्मी होता है और अविद्या नष्ट हो जाती है। इस प्रकार जब वह चूड़ाला रानी योग और ज्ञान के अभ्यास में पूर्ण हुई, तब सब

❈ निर्वाण प्रकरण ❈

२०३

शक्तियों से संयुक्त होकर धनी बनी और अणिमा आदि सिद्धियों को प्राप्त हुई। एक रात्रि में राजा सोया था। तब वह अवकाश पाकर आकाश के बहुत स्थानों में विचरी। फिर देवलोक में अति चञ्चल काली का रूप रखकर फिरी। फिर मध्य दिशा, देवलोक, दैत्यों, यक्षों, विद्याधरों और सिद्धों के लोकों में होकर सूर्यलोक, चन्द्रलोक, मेघ-मण्डल और इन्द्रलोक में गई और वहाँ का कौतुक देखकर फिर नीचे के लोकों में आई। समुद्र में प्रवेश करके फिर अग्नि में प्रवेश कर गई। पवन में पवनरूप हुई और नागलोक की कन्याओं में क्रीड़ा की। फिर वनों, पर्वतों, भूतों, अप्सराओं और त्रिलोकी के मध्य विचरी। इसी प्रकार लीला करके फिर एक क्षण में उसी स्थान में, जहाँ राजा सोया था, आई और राजा के समीप सो रही, जैसे भँवरी भँवरा कमलिनी के मध्य में शयन करते हैं। पर राजा ने न जाना कि रानी कहीं गई थी या नहीं गई थी। जब रात्रि बीती और प्रातःकाल हुआ तब राजा ने स्नानशाला में जाकर स्नानकर वेदोक्त कर्म किये और रानी ने भी अपने स्वाभाविक कार्य किये। जैसे पिता पुत्र को मीठे वचनों से उपदेश करता है, वैसे ही रानी ने राजा को धीरे-धीरे तत्त्व का उपदेश किया और पण्डितों से भी कहा कि तुम भी राजा को उपदेश करो; बताओ कि यह जगत् स्वप्नवत् भ्रम है, दीर्घ रोग और दुःखों का कारण है। आत्मज्ञान की औषध से इसका नाश होता है; और कोई इसकी औषध नहीं। इसी प्रकार आप भी राजा को उपदेश करती और पण्डित लोग भी उपदेश करते थे, परन्तु राजा ने वह ज्ञान न पाया और चित्त विक्षेप में पड़ा रहा। राजा ने उस उत्तमपद में विश्राम न पाया, जो अपना आप केवल चिद्रूप, प्रत्यक् आत्मा है। राम ने पूछा, हे महामुनि ! रानी तो सर्वशक्तिसम्पन्न थी, योगकला में भी अति चतुर और ज्ञानकला में तद्रूप थी और राजा भी अति मूढ़ न था। फिर उसकी समझ में रानी का उपदेश क्यों न दृढ हुआ ? रानी भी उसको प्रीति से उपदेश करती थी, तब क्या कारण था जो वह अपने पद में स्थित न हुआ ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जैसे बिना छिदे मोती

२०४ ✻ योगवाशिष्ट ✻

में तागा प्रवेश नहीं करता, वैसे ही चूड़ाला के उपदेश ने राजा को न वेधा। जबतक आप विचार न करे और उसमें दृढ़ अभ्यास न हो, तबतक यदि ब्रह्मा भी उपदेश करें तो उसको वह न वेधेगा, क्योंकि आत्मा आपही में जाना जाता है और इन्द्रियों का विषय नहीं है। अधिष्ठानरूप और स्वभावमात्र आत्मा आपही अपने को देखता है। वह किसी मन और इन्द्रियों का विषय नहीं है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! यदि आत्मा अपने को आपही में देखता है तो गुरु और शास्त्र किस निमित्त उपदेश करते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! गुरु और शास्त्र जना देते हैं कि तेरा स्वरूप आत्मा है; परन्तु वे 'इदं' (यह है) करके नहीं दिखाते। विचारनेत्र से आत्मा अपने को आप ही देखता है; विचार से रहित होकर उसको नहीं देख सकता। जैसे किसी पुरुष को कोई आँखोंवाला आदमी चन्द्रमा दिखाता है, पर जो वह देखनेवाला आँखोंवाला होता है तो देख पाता है और मन्ददृष्टि होता है तो नहीं देख पाता, वैसे ही गुरु और शास्त्र आत्मा का रूप वर्णन करते हैं और दिखाते हैं, पर जब शिष्य विचारनेत्र से देखता है, तभी कहता है कि मैंने देखा और फिर अन्यों को दिखाने के योग्य होता है। हे राम! आत्मा किसी इन्द्रिय का विषय नहीं। वह अपना आप मूलरूप है। और इन्द्रियाँ कल्पित हैं। जो तुम कहों कि तुम भी तो इन्द्रिय से ही उपदेश करते हो तो जब इन्द्रियों का विस्मरण करो तो अपना मूल तुम्हें भासित होगा। हे राम! इस पर एक क्रान्त का इतिहास है, उसे सुनो। एक क्रान्त था, जिसके पास बहुत धन और अनाज था। परन्तु वह ऐसा कृपण था कि किसी को कुछ न देता था। धन की उसे ऐसी तृष्णा थी कि चाहता था कि किसी प्रकार मुझे चिन्तामणि मिले। इसी इच्छा से एक समय घर से बाहर निकल पृथ्वी की ओर देखता जाता था कि एक स्थान में पहुँचा जहाँ घास और भुस पड़ा था। उसे उसमें एक कौड़ी देखा पड़ी। वह उस कौड़ी को उठाकर देखने लगा कि कुछ और भी निकले। तो फिर दूसरी कौड़ी निकली। इसी प्रकार ढूँढ़ने-ढूँढ़ने उसे तीन दिन व्यतीत हुए, तब चार कौड़ी निकलीं और