योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
२१४ * योगवाशिष्ठ *
ज्ञेय है। जो जानने योग्य है, वह जान लेने पर फिर वासना नहीं रहती। केवल स्वच्छ आप ही होता है। हे राजन्! तुम्हें अपने स्वरूप को ही जानना था। फिर तुम और जंजाल में किस निमित्त पड़े हो? आत्मज्ञान बिना और अनेक यत्न करोगे तो भी शान्ति नहीं प्राप्त होगी। जैसे पवन से रहित वृक्ष शान्तरूप होता है, और जब पवन होता है तब क्षोभ को प्राप्त होकर हिलता है, वैसे ही जब वासना निवृत्त होगी तब शान्तपद प्राप्त होगा और कोई क्षोभ न रहेगा। देवपुत्र ने जब ऐसे कहा, तब राजा ने कहा, हे भगवन्! तुम मेरे पिता हो, तुम्हीं गुरु हो और तुम्हीं कृतार्थ करनेवाले हो। मैंने वासना में बड़ा दुःख पाया है। जैसे किसी वृक्ष के पत्ते, डाल, फूल, फल सूख जावें और अकेला ठूँठ रह जाय, वैसे ही ज्ञान बिना मैं भी ठूँठ सा हो रहा हूँ। इसलिए कृपा करके मुझे शान्ति का मार्ग बताओ। देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! तुम्हें त्याग करके सन्तों का संग करना चाहिए था और यह प्रश्न करना चाहिए था कि बन्धन क्या है और मोक्ष क्या है? मैं क्या हूँ और यह संसार क्या है? संसार की उत्पत्ति किससे होती है और वह लीन कैसे होता है? तुमने यह क्या किया कि सन्तों का नहीं, ठूँठ वन का आकर सेवन किया। अब तुम सन्तजनों का संग करके निर्वासनिक बनो। ब्रह्मादिक ने भी कहा है कि जीव जब निर्वासनिक होता है, तब सुखी होता है। फिर राजा ने कहा, हे भगवन्! तुम्हीं सन्त हो और तुम्हीं मेरे गुरु और पिता हो। जिस प्रकार मुझे शान्ति हो सो कहो।
तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! मैं तुम्हें उपदेश करता हूँ, तुम उसे हृदय में धारण करोगे। जो तुम उसे हृदय में न धारण करोगे तो मेरे कहने से क्या होता है? जैसे डाल पर कौआ हो और शब्द भी सुने तो भी वह अपने कौए के स्वभाव को नहीं छोड़ता, वैसे ही जो तुम भी कौए की तरह हो तो मेरा कहना व्यर्थ है? जैसे तोते को जो सिखाते हैं, उसे वह सीखता है वैसे ही तुम भी हो जाओ।
शिखिध्वज ने कहा, हे भगवन्! जो तुम आज्ञा करोगे सो मैं
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
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करूँगा। जैसे शास्त्र और वेद के कहे कर्म करता हूँ, वैसे ही तुम्हारा कहना करूँगा। यह मेरा नियम है, जो तुम आज्ञा करोगे सो करूँगा। तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! प्रथम तो तुम ऐसा निश्चय करो कि इन वचनों से मेरा कल्याण होगा। फिर ऐसे जानो कि पिता जो पुत्र को सिखाता है, सो शुभ ही होता है। मैं जो तुमसे कहूँगा, सो शुभ ही कहूँगा—उससे तुम्हारा कल्याण होगा। इसलिए निश्चय जानो कि इन वचनों से तुम्हारा कल्याण ही होगा। एक आख्यान जो पहले कभी हुआ है, कहता हूँ, उसे सुनो। एक पण्डित धन और गुणों से संपन्न था। वह सर्वदा चिन्तामणि के पाने की इच्छा करता था। इसके लिए शास्त्र में जैसे उपाय कहे हैं, वैसे ही करता था। जब कुछ काल व्यतीत हुआ, तब जैसे चन्द्रमा का प्रकाश होता है, वैसे ही प्रकाशवान चिन्तामणि उसे प्राप्त हुई। उसने उसे ऐसे निकट जाना कि हाथ से उठा लेगा। जैसे उदयाचल पर्वत के निकट चन्द्रमा उदय होता है, वैसे ही चिन्तामणि जब निकट आकर प्राप्त हुई, तब पण्डित के मन में विचार आया कि यह चिन्तामणि है अथवा कुछ और है? जो चिन्तामणि हो तो उठा लूँ और जो चिन्तामणि न हो तो किस निमित्त उठाऊँ? फिर कहा, उठा लेता हूँ, मणि ही होगी; फिर सोचा कि यह मणि नहीं है, क्योंकि मणि तो बड़े यत्न से प्राप्त होती है। मुझे सहज में क्यों प्राप्त होगी? इससे विदित होता है कि यह चिन्तामणि नहीं है। जो इस तरह आसानी से प्राप्त होती तो सब लोग धनी हो जाते।
जब ऐसे संकल्प-विकल्प कर पण्डित विचारने लगा और इससे उसके चित्त पर आवरण पड़ गया, तब मणि छिप गई; क्योंकि जो सिद्धियाँ हैं, उनका मान और आदर न करिये तो शाप देती हैं। जिस दिव्य वस्तु का कोई आवाहन करता है और उसका पूजन नहीं करता तो वह उसे त्याग जाती है। तब उसे बड़ा दुःख हुआ कि चिन्तामणि मेरे पास से चली गई। निदान वह फिर यत्न करने लगा। तब काँच की मणि उसका उपहास करने को उसके आगे आ पड़ी। उसको देखकर वह कहने लगा कि यह चिन्तामणि है। अबोध के कारण वह उसको
२१६ ✴ योगवाशिष्ठ ✴
उठाकर अपने घर ले आया और उसे ही चिन्तामणि मान लिया । जैसे मोह में जीव असत् को सत् और रज्जू को सर्प जानता है, जैसे दृष्टिदोष में दो चन्द्रमा देख पड़ते हैं और मनुष्य शत्रु को मित्र और विष को अमृतरूप जानता है, वैसे ही उसने काँच को चिन्तामणि जान कर जो कुछ अपने पास धन था, वह भी लुटा दिया और कुटुम्ब का त्यागकर कहने लगा कि मुझे चिन्तामणि प्राप्त हुई है, अब कुटुम्ब में क्या प्रयोजन है ? निदान घर से निकलकर वन में गया और वहाँ उसने बड़े दुःख पाये क्योंकि काँच की मणि में कुछ प्रयोजन नहीं सिद्ध हुआ । ऐसे ही हे राजन् ! मूर्ख लोग विद्यमान वस्तु को त्यागते हैं, उसका माहात्म्य नहीं जानते और उसको नहीं पाते ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे चिन्तामणि वृत्तान्तवर्णनं नाम नवषष्टितमस्सर्गः ॥ ६९ ॥
देवपुत्र बोले, हे राजन् ! इसी प्रकार एक और आख्यान कहता हूँ, वह भी सुनो । मन्दराचल पर्वत के वन में सब पहाड़ियों का राजा एक हाथी रहता था । वह मानो स्वयं विन्ध्याचल था, जिसको अगस्त्य मुनि ने बढ़ने से रोका था । उसके बड़े-बड़े दाँत इन्द्र के वज्र की तरह तीक्ष्ण थे और प्रलयकाल के वड़वानल के समान वह प्रकाशमान था । वह ऐसा बलवान था कि सुमेरु पर्वत को दाँतों से उठा ले । निदान उस हस्ती को एक महावत ने जैसे राजा बलि को विष्णु भगवान् ने छल करके बाँधा था, लोहे की जञ्जीर में बाँधा, और वह आम पास के एक वृक्ष पर चढ़ बैठा कि कूदकर हाथी के ऊपर चढ़ बैठूँ । वह हाथी जञ्जीर में महाकष्ट को प्राप्त हुआ । उसने इतना दुःख पाया जिसका वर्णन नहीं हो सकता । तब हाथी के मन में विचार आया कि जो अब मैं बल में जञ्जीर न तोड़ूँगा तो कैसे छूटूँगा ? यह सोचकर उसने उस जञ्जीर को बल करके तोड़ दिया । तब वृक्ष पर जो महावत बैठा था, वह गिरकर हाथी के पैरों के आगे आ पड़ा और भय को प्राप्त हुआ । जैसे वृक्ष का फल पवन से गिर पड़ता है, वैसे ही महावत भय में गिर पड़ा । जब इस प्रकार महावत गिरा, तब हाथी ने विचार किया
✻ निर्वाण प्रकरण ✻ २१७
कि यह मृतक समान है, इस मरे को क्या मारना है? यद्यपि यह मेरा शत्रु है तो भी मैं इसे नहीं मारूँगा, इसके मारने से मेरा क्या पुरुषार्थ सिद्ध होगा? इसलिये जैसे स्वर्ग के द्वार को तोड़कर दैत्य वहाँ प्रवेश करते हैं, वैसे ही जञ्जीर तोड़कर वह हाथी वन में गया और महावत हाथी को, गया देख उठ बैठा और अपने स्वभाव में स्थित हुआ।
वह फिर हाथी के पीछे चला और हाथी को ढूँढ़ लिया। जैसे चन्द्रमा को राहु खोज लेता है, वैसे ही वन में हाथी को उसने खोज लिया। तब क्या देखता है कि वह वृक्ष के नीचे सोया पड़ा है। जैसे संग्राम को जीतकर सूरमा निश्चिन्त सोता है, वैसे ही हाथी को निश्चिन्त सोया पड़ा देख महावत ने विचार किया कि इसको वश में करना चाहिए। यह विचार उसने यह उपाय किया कि वन के चारों ओर खाई बनाई और खाई के ऊपर कुछ तृण और घाम डाली। जैसे शरत्काल के आकाश में बादल देखने भर को होता है, वैसे ही तृण और घाम खाई के ऊपर देखने भर को देख पड़ती थी। निदान जब किसी समय हाथी उठकर चला और खाई के बीच गिर पड़ा, तब महावत ने हाथी के निकट आ उसे जञ्जीरों में बाँधा। तब वह हाथी बड़े दुःख को प्राप्त हुआ। जो तप करके वन में दुःख पाता है, उसने भविष्य का विचार नहीं किया। अज्ञानी को भविष्य का विचार नहीं होता, इसी से वह दुःख पाता है। हे राजन्! यह जो मणि और हाथी के आख्यान तुमको मैंने सुनाये हैं, उनको जब तुम समझ लोगे तब आगे मैं उपदेश करूँगा।
इति श्रीयो० नि० हस्तिआख्यानवर्णनं नाम सप्ततितमसर्गः॥ ७० ॥
इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब देवपुत्र ने ऐसे कहा, तब राजा बोला, हे देवपुत्र! यह दो आख्यान जो तुमने कहे हैं, सो तुम्हीं जानते हो, मैं तो कुछ नहीं समझा। इससे तुम्हीं इन्हें समझाकर कहो। देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! तुम शास्त्र के अर्थ में तो बहुत चतुर हो और सब अर्थों के ज्ञाता हो, परन्तु स्वरूप में तुम्हारी स्थिति नहीं है। इससे जो वचन में कहता हूँ, उसे बुद्धि से ग्रहण करो। हस्ती क्या है और
२१ = ❊ योगवाशिष्ठ ❊
चिन्तामणि क्या है ? प्रथम जो तुमने सब त्याग किया था सो चिन्ता- मणि थी और उसके निकट प्राप्त होकर तुम सुखी हुए थे । यदि उसको तुम अपने पास रखते तो सब दुःख निवृत्त हो जाते । पर मणि का तो तुमने निरादर किया, जो उसको त्यागा और काँच की मणि तप- क्रिया को ग्रहण किया, इसलिए दरिद्री ही रहे । हे राजन् ! सर्वत्याग- रूपी चिन्तामणि थी और इस क्रिया का आरम्भ काँच की मणि है । उसको तुमने ग्रहण किया है । इससे दरिद्री की निवृत्ति नहीं होती— मनुष्य दुःखी ही रहता है । हे राजन् ! सर्वत्याग तुमने नहीं किया, और जो किया भी था, पर कुछ शेष रह गया और वह रहकर फिर फैल गया । जैसे बड़ा बादल वायु से क्षीण हो जाता है और सूक्ष्म रह जाता है, और पवन के लगने से फिर फैल जाता है और सूर्य को छिपा लेता है । वह बादल क्या है, सूर्य क्या है और थोड़ा रहना क्या है, यह भी सुनो । स्त्रियों और कुटुम्ब आदि को त्याग कर इसमें अहंकार करना ही बड़ा बादल है । वैराग्यरूपी पवन से तुमने राज्य और कुटुम्ब का अहंकार त्याग किया; पर देहादिक में अहंकार सूक्ष्म बादल मा-रह गया था सो वह फिर बढ़ गया । तुमने जो अनात्म में अभिमान करके क्रिया का आरम्भ किया, इससे आत्मारूपी सूर्य जो अपना आप है, वह अहंकाररूपी बादल से ढक गया और ज्ञानरूपी चिन्तामणि अज्ञानरूपी काँच की मणि से छिप गई ? जब ज्ञान से आत्मा को जानोगे, तब आत्मा प्रकाशित होगा, अन्यथा न भासित होगा । जैसे कोई पुरुष घोड़े पर चढ़कर दौड़ता है तो उसकी वृत्ति घोड़े में होती है, वैसे ही जिस पुरुष का आत्मा में दृढ़ निश्चय होता है, उसको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । हे राजन् ! आत्मा को पाना सुगम है, जो सुख से ही मिलता है और उससे बड़े आनन्द की प्राप्ति होती है । तप आदिक क्रियाएँ कष्ट से सिद्ध होती हैं, उनसे स्वरूप- सुख की प्राप्ति नहीं होती ।
हे राजन् ! मैं जानता हूँ कि तुम मूर्ख नहीं, बल्कि शास्त्रों के ज्ञाता और बहुत चतुर हो । तथापि तुम्हें स्वरूप में स्थिति नहीं प्राप्त हुई
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ <span style="float:right;">२१५</span>
जैसे आकाश में पत्थर नहीं ठहरता। इससे में जो उपदेश करता हूँ, उसको ग्रहण करो तो तुम्हारे दुःख निवृत्त हो जावेंगे। हे राजन्! यह सबसे श्रेष्ठ ज्ञान कहा है। अब और कहता हूँ। तुमने जो तप का आरम्भ किया है और उसका जो फल जाना है, उस ज्ञान से यह श्रेष्ठ ज्ञान कहता हूँ। इससे तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जायगा। हे राजन्! मैंने यह चिन्तामणि का सम्पूर्ण तात्पर्य तुमसे कहा। अब हाथी का वृत्तान्त, जो आश्चर्यरूप है, वह भी सुनो, जिसके समझने से अज्ञान निवृत्त हो जायगा। मन्दराचल का हाथी तो तुम हो और महावत तुम्हारा अज्ञान है। इस अज्ञानरूपी महावत ने तुमको बाँधा था और तुम आशारूपी जञ्जीरों से बँधे। और जञ्जीरें घिस जाती हैं, पर आशारूपी फाँसी नहीं कटती। यह दिन दिन बढ़ती ही जाती है। हे राजन्! आशारूपी फाँसी से तुम महादुःखी थे। हस्ती के जो बड़े दाँत थे, जिनसे उसने साँकलों को तोड़ा था, वे विवेक और वैराग्य थे। तुमने विचार किया कि में बल करके छूटूँ। राज्य, कुटुम्ब और पृथ्वी का त्याग कर जब तुमने उस फाँसी को काटा तब आशारूपी रस्से कटे तो अज्ञानरूपी महावत भय को प्राप्त हुआ और तुम्हारे चरणों के तले आ पड़ा। जैसे वृक्ष के ऊपर वैताल रहता है और कोई वृक्ष को काटने आता है तब वैताल भय को प्राप्त होता है, वैसे ही तुमने वैराग्य और विवेकरूपी दाँतों से आशा के फाँस काटे, तब अज्ञानरूपी महावत गिरा और तुमने एक घाव लगाया, परन्तु मार न डाला, इससे महावत वैसे ही तुमसे भाग गया, जैसे वृक्ष पर वैताल रहता है और वृक्ष को कोई काटने लगता है, तब वैताल भाग जाता है। हे राजन्! वैसे ही वृक्ष को तुमने वैराग्यरूपी शस्त्र से काटा, तब अज्ञानरूपी वैताल भागा था; मूर्खता से उसको तुमने नहीं मारा, बल्कि उसको छोड़कर वन को गये। जब तुम वन में आये, तब अज्ञानरूपी महावत तुम्हारे पीछे चला आया और उसने तुम्हारे चारों ओर खाई खोदी। तब आदिक क्रिया आरम्भ कर तुम उस खाई में गिर पड़े और महादुःख को प्राप्त हुए। तब उसने तुम्हें जञ्जीरों से फिर बाँधा और बँधे हुए तुम अब तक दुःख पाते हो।
२२० :: योगवासिष्ठ ::
अनात्म अभिमान में तुमने यहाँ तपादिक क्रियाओं का आरम्भ किया है। ऐसी खाई में तुम पड़े हो।
हे राजन् ! तुम जानकर खाई में नहीं पड़े। खाई के ऊपर घास और तृण पड़ा था, उस छल से तुम गिर पड़े हो। वह छल और तृण क्या है, यह भी तुम सुनो। प्रथम तो अज्ञानरूपी शत्रु को तुमने न मारा और जञ्जीर के भय से भागे कि वन मेरा कल्याण करेगा; पर सन्तों और शास्त्रों के वचनों को न जाना कि वे तुम्हारे दुःख निवृत्त करेंगे। उन वचनरूपी खाई पर तृणादिक था, इसी मूर्खता के कारण तुम गिरे। जैसे राजा बलि पाताल में छल से बाँधा हुआ है, वैसे ही तुमने भविष्य का विचार न किया कि अज्ञानरूपी शत्रु जो रह गया है, वह मेरा नाश करेगा। इस विचार के बिना तुम फिर दुःखी हुए। सब त्याग तो किया, परन्तु यह न जाना कि मैं अक्रिय हूँ, इस क्रिया का आरम्भ काहे को करता हूँ? इसी से तुम फिर फाँसी में बँधे हो। हे राजन् ! जो पुरुष इस फाँसी से मुक्त हुआ है, वही मुक्त है और जिसका चित्त अनात्म-अभिमान से बँधा है कि यह मुझे प्राप्त हो, वह उससे दुःख पाता है। जिस पुरुष ने वैराग्य और विवेकरूपा दाँतों से आशारूपी जञ्जीर को नहीं काटा, वह कदापि सुख नहीं पाता। विवेक से वैराग्य उत्पन्न होता है और वैराग्य से विवेक होता है। विवेक सत्य के जानने और असत् देहादिक को असत्य जानने को कहते हैं। जब ऐसे जाना तब असत् की ओर भावना नहीं जाती, यह वैराग्य हुआ। वैराग्य से विवेक और विवेक से वैराग्य उपजता है। इन विवेक और वैराग्यरूपी दाँतों से आशारूपी जञ्जीर को तोड़ो। हे राजन् ! यह हस्ती का वृतान्त जो तुमसे कहा है, उस पर विचार करने से तुम्हारा मोह निवृत्त हो जावेगा। हे राजन् ! वह हाथी बड़ा बली था और महावत कम बली। उस अज्ञानरूपी महावत को मूर्खता करके तुमने न मारा, इसी से दुःख पाते हो। अब तुम वैराग्य और विवेकरूपी दाँतों से आशारूपी फाँसी को तोड़ो, तब दुःख सब मिट जावेंगे।
इति श्रीयो० नि० हस्तीवृत्तान्तवर्णनं नामैकसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७१ ॥
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २२१
देवपुत्र बोले, हे राजन् ! ब्रह्मवेत्ता और सब ज्ञानियों में श्रेष्ठ, साक्षात् ब्रह्मस्वरूप और सत्यवादिनी तुम्हारी स्त्री जो चूडाला थी, उसने तुम्हें उपदेश किया था; पर तुमने उसके वचनों का किस निमित्त निगदर किया ? में तो सब जानता हूँ, क्योंकि त्रिकालज्ञ हूँ; तो भी तुम अपने मुख से कहो । एक तो यह मूर्खता की कि उपदेश न अङ्गीकार किया और दूसरी यह मूर्खता की कि सर्वत्याग न करके फिर वन अङ्गीकार किया । जो सर्वत्याग करते तो सब दुःख मिट जाते । जब ऐसे देवपुत्र ने कहा, तब राजा ने कहा, हे देवपुत्र ! मैंने तो स्त्री, पृथ्वी, मन्दिर, हाथी इत्यादिक ऐश्वर्य और कुटुम्ब को त्याग किया है; आप कैसे कहते हैं कि त्याग नहीं किया ? देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! तुमने क्या त्यागा है ? राज्य में तुम्हारा क्या था । जैसे ऐश्वर्य आगे था, वैसे ही अब भी है और स्त्रियाँ भी जैसे और मनुष्य थे वैसे ही थीं; पृथ्वी, मन्दिर और हस्ती जैसे आगे थे, वैसे ही अब भी हैं । उनमें तुम्हारा क्या था जो त्याग किया ? हे राजन् ! सर्वत्याग तुमने अब भी नहीं किया । जो तुम्हारा हो उसको तुम त्याग करो, जिससे निर्दुःख पद को प्राप्त होओ । इतना कह वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब शूरवीर जो इन्द्रियजित् राजा था, वह मन में विचारने लगा कि यह वन मेरा है और वृक्ष, फूल, फल मेरे हैं, इनका त्याग करूँ । ऐसा विचारकर बोला, हे देवपुत्र ! वन, वृक्ष, फूल और फल जो मेरे थे, उनका भी मैंने त्याग किया । अब तो सर्वत्याग हुआ ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ; क्योंकि वन, वृक्ष, फूल और फल तुमसे पहले भी थे । इनमें तुम्हारा क्या है ? जो तुम्हारा हो, उसको त्यागो, तब सुखी होगे ।
हे राम ! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब राजा ने मन में विचार किया कि मेरी जलपान की बावली और बगीचे हैं, इनका त्याग करूँ, तब सर्वत्याग सिद्ध हो । फिर कहा, हे भगवन् ! मेरी यह बावली और बगीचे हैं, उनका भी मैंने त्याग किया । अब तो मेरा सर्वत्याग सिद्ध हुआ ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन् ! सर्वत्याग अब
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<p align="center">❇ योगवाशिष्ठ ❇</p>भी नहीं हुआ। जो तुम्हारा है, उसको जब त्यागोगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। हे राम! जब इस प्रकार देवपुत्र ने कहा, तब राजा विचारने लगा कि अब मेरी मृगछाला और कुटी है, उसका भी त्याग करूँ। ऐसे विचारकर बोला कि हे देवपुत्र! मेरे पास एक मृगछाला और एक कुटी है। उसका भी मैंने त्याग किया। अब तो सर्वत्यागी हुआ? तब देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! मृगछाला में तुम्हारा क्या है, यह तो मृग की त्वचा है। और कुटी में तुम्हारा क्या है, यह तो मिट्टी और शिला की बनी है। इससे तो सर्वत्याग सिद्ध नहीं होता? जो कुछ तुम्हारा है, उसको त्यागोगे, तब सर्वत्याग होगा और तभी तुम सब दुःखों से छूट जाओगे। हे राम! जब ऐसे कुम्भज ने कहा, तब राजा ने मन में विचार किया कि अब मेरा एक कमण्डलु, एक माला और एक लाठी है, इसका भी त्याग करूँ। ऐसे विचारकर राजा शान्ति के लिए बोला, हे देवपुत्र! मेरी लाठी, कमण्डलु और एक माला है, उसका भी मैंने त्याग किया। अब तो में सर्वत्यागी हुआ?
देवपुत्र ने कहा, हे राजन्! कमण्डलु में तुम्हारा क्या है? कमण्डलु तो वन का तुम्बा है, उसमें तुम्हारा कुछ नहीं। लाठी भी वन के बाँस की है और माला भी काष्ठ की है, उनमें तुम्हारा क्या है? जो कुछ तुम्हारा है उसका त्याग करो। जब तुम उसका त्याग करोगे, तब दुःख से रहित हो जाओगे। हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा, तब राजा शिखरध्वज ने मन में विचारा कि अब मेरा क्या रह गया। तब देखा कि एक आसन और वासन हैं, जिसमें फूल और फल रखते हैं; अब इनका भी त्याग करूँ। तब राजा ने कहा, हे भगवन्! आसन और वासन मेरे पास रह गये हैं, इनका भी में त्याग करता हूँ। अब तो सर्वत्यागी हुआ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ। आसन तो भेड़े की ऊन का है और वासन मृत्तिका के हैं; इनमें तुम्हारा कुछ नहीं। जो कुछ तुम्हारा है, उसका त्याग करो, तब सर्वत्याग हो और तुम दुःख से निवृत्त होगे। हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा, तब राजा उठ खड़ा हुआ और वन की लकड़ी इकट्ठी करके उनमें
☀️ निर्वाण प्रकरण ☀️ २२३
आग लगाई । जब बड़ी अग्नि लगी तब लाठी को हाथ में लेकर कहने लगा, हे लाठी ! मैं तेरे साथ बहुत देशों में फिरा हूँ, परन्तु तूने मेरे साथ कुछ उपकार न किया । अब मैं कुम्भज मुनि की कृपा से तरूँगा, तुझे नमस्कार है । ऐसे कहकर लाठी को अग्नि में डाल दिया । फिर मृगछाला को हाथ में लेकर कहा, हे मृग की त्वचा ! बहुत दिन मैं तेरे ऊपर बैठा हूँ, परन्तु तूने कुछ उपकार न किया । अब कुम्भज मुनि की कृपा से मैं तरूँगा, तुझे नमस्कार है । ऐसे कहकर मृगछाला को अग्नि में डाल दिया ।
फिर कमण्डलु को लेकर कहने लगा, हे कमण्डलु ! तू धन्य है कि मैंने तुझे धारण किया और तूने मेरे जल को धरा । तूने मुझमे गुणगोपन नहीं किया, तो भी कमण्डलु की जैसी प्रवृत्ति त्यागनी है, वैसी ही निवृत्ति की कल्पना भी त्यागनी है । इससे तुझे नमस्कार है, तू जा । ऐसे कहकर कमण्डलु भी अग्नि में जला दिया । फिर माला को हाथ में लेकर कहने लगा, हे माले ! तेरे दाने जो मैंने घुमाये हैं सो मानों अपने जन्म गिने हैं । तेरे सम्बन्ध से जप किया है और दिशा-विदिशा गया हूँ । अब तुझको नमस्कार है । ऐसे कहकर माला को भी अग्नि में डाल दिया । इसी प्रकार फल, फूल कुटी और आसन सब जला दिये । तब बड़ी अग्नि जगी और बड़ा प्रकाश हुआ । जैसे सुमेरु पर्वत के ऊपर सूर्य चढ़े और मणि का भी चमत्कार हो तो बड़ा प्रकाश होता है, वैसे ही बड़ी अग्नि लगी और राजा ने सम्पूर्ण सामग्री का त्याग किया । जैसे पके फल को वृक्ष त्यागता है और जैसे पवन चलने से ठहरता है तब धूल से रहित होता है, वैसे ही राजा सम्पूर्ण सामग्री को त्याग निर्विघ्न निर्द्वन्द्व हुआ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शिखिध्वजसर्वत्याग-वर्णनं नाम द्विसप्ततितमस्सर्गः ॥ ७२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! निदान सम्पूर्ण सामग्री जलकर भस्म हो गई । जैसे सदाशिव के गणों ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ को स्वाहा कर दिया था, वैसे ही जितनी कुछ सामग्री थी, सो सब स्वाहा हो गई
२२४ 卐 योगवाशिष्ठ 卐
और वह बन बड़ा प्रज्वलित हुआ । जितने वृक्ष के रहनेवाले पक्षी थे, वे भाग गये और मृग, पशु जो आहार व जुगाली करते थे, वे भी सब भाग गये । जैसे पुर में आग लगने से पुरवासी भाग जावें, वैसे ही सब भाग गये । तब राजा ने मन में विचार कि अब कुम्भज की कृपा से में बड़े आनन्द को प्राप्त हुआ और अब सब मेरे दुःख मिट गये । जो कुछ वस्तु मन के संकल्प से रची थी सो सब जला दी, अब उनका न मुझ हर्ष है, न शोक । ये सब दुःख ममत्व से होते हैं, सो मेरा ममत्व अब किसी में नहीं रहा, इससे कोई दुःख भी नहीं । अब में ज्ञानवान हुआ हूँ, अब मेरी जय है; क्योंकि अब निर्मल होकर सबका मैंने त्याग किया है । ऐसा विचार करके राजा उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर बोला, हे देवपुत्र ! अब तो मैंने सबका त्याग किया; क्योंकि आकाश मेरा वस्त्र है और पृथ्वी मेरी शय्या है ।
जब राजा ने ऐसे कहा, तब कुम्भज मुनि ने कहा, हे राजन् ! अब भी सर्वत्याग नहीं हुआ । जो तुम्हारा है उसका त्याग करो, जिससे तुम्हारे सब दुःख निवृत्त हो जावें । फिर राजा ने कहा, हे भगवन् ! अब तो मेरे पास और कुछ नहीं रहा, नङ्गा होकर तुम्हारे आगे खड़ा हूँ । अब एक रक्त-मांस की देह इन्द्रियों को धारण करनेवाली है । जो कहो तो इसका भी त्याग करूँ । पर्वत पर जाकर डाल दूँ । ऐसे कहकर राजा पर्वत को दौड़ा, पर कुम्भज मुनि ने रोका और कहा, हे राजन् ! ऐसे पुण्यवान् देह को क्यों त्यागते हो ? इसके त्याग से सर्वत्याग नहीं होता । जिसके त्याग से सर्वत्याग हो, उसका त्याग करो । इस देह में क्या दूषण है । जैसे वृक्ष में फूल-फल होते हैं और जब वायु चलती है, तब गिरते हैं, सो फूल-फल गिरने का कारण वायु है, वृक्ष में कुछ दूषण नहीं, वैसे ही देह में कुछ दूषण नहीं । देह को पालनेवाला जो अभिमान है, उसका त्याग करो तो सर्वत्याग सिद्ध हो । देह तो जड़ है, जो कुछ मनुष्य इसको देता है, वही यह लेता है, आगे से बोलता नहीं । इस जड़ के त्यागे क्या सिद्ध होता है ? जैसे पवन से वृक्ष हिलता है और भूकम्प में पर्वत काँपते हैं, वैसे ही देह आप कुछ नहीं करती;
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २२५
और की प्रेरणा से चेष्टा करती है । जैसे पवन से समुद्र के तरङ्ग तृणों को जहाँ ले जाते हैं, वहाँ वे चले जाते हैं, वैसे ही देह आपसे कुछ नहीं करती । इसको जो प्रेरणा करनेवाला है, उसके बल से यह चेष्टा करती है । इससे देह के प्रेरक का त्याग करो तो सुखी होगे । हे राजन् ! जिससे सब है, जिसमें सब शब्द है और जो सब ओर से त्यागने योग्य है, उसका त्याग करो ।
राजा ने पूछा, हे भगवन् ! वह कौन है जो सब है, जिसमें सब शब्द है और जो सब ओर से त्यागने योग्य है ? हे तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ ! जिसके त्याग से जग व मृत्यु नष्ट हो जावे, सो कहिये । तब कुम्भज ने कहा, हे राजन् ! जिसका नाम चित्त (आकार) है उसका त्याग करो । बाहर नाना प्रकार के आकार चित्त ही मे देख पड़ते हैं, इससे चित्त का ही त्याग करो । हे राजन् ! सर्प बिल में बैठा हो तो बिल का कुछ दूषण नहीं, विष-सर्प में है, जिसमें वह डसता है । इस-लिए उसके नाश का उपाय करो । और सब शब्द भी इस चित्त में ही हैं । आत्मा तो चिन्मात्र है । उसमें न एक है और न द्वैत है । सब ओर से इसी चित्त का त्याग करना योग्य है । जब इस चित्त का त्याग करोगे, तब त्यागरूपी अमृत से अमर हो जाओगे और जग-मृत्यु से रहित होगे । जो चित्त का त्याग न करोगे तो फिर देह धारण कर दुःख भोगोगे । जैसे एक खेत में अनेक दाने उत्पन्न होते हैं, पर जब खेत ही जल जाता है, तब अन्न नहीं उपजता, वैसे ही यह जो देह और जरा-मृत्यु नामक संसार के दुःख हैं, इनका बीज चित्त ही है । जैसे अनेक दानों का कारण खेत है, वैसे ही संसार के असंख्य दुःखों का कारण चित्त है । इससे हे राजन् ! चित्त का त्याग करो । जब इसका त्याग करोगे तब सुखी होगे । हे राजन् ! जिसने सर्वत्याग किया, वह सुखी हुआ है । जैसे आकाश सब पदार्थों से रहित है, किसी का स्पर्श नहीं करता और सबसे बड़ा और सुखरूप है और सब पदार्थों के नष्ट होने पर भी ज्यों का त्यों रहता है, वैसे ही हे राजन् ! तुम भी सर्व-त्यागी हो रहो । राज्य, देह, कुटुम्ब और गृहस्थ आदिक जो आश्रम
२२६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
है, उन सबकी चित्त ने कल्पना की है। जो एक का त्याग नहीं होता तो कुछ नहीं त्यागा। जब चित्त का त्याग करोगे, तब सर्व-त्याग हो।
हे राजन! यह धर्म, वैराग्य और ऐश्वर्य तीनों चित्त की कल्पना हैं, जब चित्त पुण्यकर्म में लगता है, तब पुण्य ही प्राप्त होता है और जब पापक्रिया में लगता है, तब पाप ही प्राप्त होकर अधर्म और दरिद्र होता है। जब पुण्य का फल उदय होता है, तब सुख प्राप्त होता है और जब पाप का उदय होता है, तब दुःख प्राप्त होता है। इससे जन्ममरण के दुःख नहीं मिटते। जब चित्त का त्याग होता है, तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। हे राजन! जो पुरुष किसी वस्तु को नहीं चाहता, उसकी बहुत पूजा होती है। जो कहता है कि इस वस्तु को मुझको दे, उसको कोई नहीं देता। इससे सर्वत्याग कर सुखी हो। सर्वत्याग करने में सर्वव्यापी तुम ही होगे और सर्वात्मा होकर संपूर्ण ब्रह्माण्ड अपने में देखोगे। जैसे माला के दाने में तागा होता है, और दाने भी तागे के आधार में होते हैं, उनमें और कुछ नहीं होता, वैसे ही देखोगे कि तुम सर्वमय और एकरस हो; तुम ही में ब्रह्माण्ड स्थित है। सब तुमही हो, तुमसे कुछ भिन्न नहीं। हे राजन! जिसने सबका त्याग किया है, वह सुखी है और समुद्र की नाईं स्थित है, उसको कोई दुःख नहीं। इससे तुम चित्त का त्याग करो, जिसमें रागद्वेष मिट जावे। इस चित्त के इतने नाम हैं—चित्त, मन, अहंकार, जीव और माया। हे राजन! अपने ऐश्वर्य को त्यागने और औरों की भिक्षा लेने में तो चित्त वश नहीं होता, चित्त तभी वश होता है, जब पुरुष निर्वास्निक होता है। जब तक चित्त रहता है, तब तक सर्वत्याग नहीं होता। जब चित्त की चेतना निवृत्त होती है, तब चित्त का त्याग होता है। चित्त का त्याग करने पर भी जब त्याग के अभिमान से रहित होगे, तब सर्वात्मा होगे। जब चित्त को त्यागोगे, तब उस पद को प्राप्त होगे, जो जितने ऐश्वर्य और सुख है उनका आधार है; जितने दुःख हैं उनका नाश करनेवाला है; जिसके जान लेने पर किसी पदार्थ की इच्छा न
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ २२७
रहेगी; क्योंकि सब आनन्दों का आधार तेरा स्वरूप है, फिर इच्छा किसकी रहे। जैसे आकाश के आश्रय में देवलोक आदि सब विश्व रहता है और आकाश को कुछ इच्छा नहीं वैसे ही वह ब्रह्मपद है। आकाश कोई इच्छा नहीं करता, तो भी सब कुछ आकाश ही में है और वह सबका आधार है, वैसा ही ब्रह्म है। वही ब्रह्मरूप तुम हो।
हे राजन्! जब तुम भी किसी की इच्छा न करोगे, तब निर्वासनिक होकर अपने स्वरूप में स्थित होगे और जानोगे कि सबका आत्मा मैं ही हूँ, सबको धारण कर रहा हूँ और भूत भविष्यत्, वर्तमान तीनों काल भी मेरे आश्रय में हैं। जैसे समुद्र के आश्रित तरङ्ग हैं, वैसे ही मेरे आश्रित काल है। चित्त का सम्बन्ध तुम्हें प्रमाद से है और प्रमाद यही है कि चिन्मात्रपद में चित्त होकर फुरता है। चित्त ऐसा है कि वह जड़ भी है और चेतन भी। इसी का नाम चिज्जड़ग्रन्थि है। जब यह ग्रन्थि खुल जावेगी, तब तुम अपने को वासुदेव रूप जानोगे। जब निर्वासनिक होगे, तब संसाररूपी वृक्ष नष्ट हो जावेगा। जैसे बीज में वृक्ष होता है, वैसे ही चित्त में संसार है और जैसे बीज के जलने से वृक्ष भी जल जाता है, वैसे ही वासना के दग्ध होने से संसार भी दग्ध होता है। हे राजन्! जैसे किसी डिब्बे में रत्न होते हैं तो रत्नों के नाश होने पर डिब्बा नहीं नष्ट होता, पर डिब्बे के नष्ट होने पर रत्न नष्ट होते हैं। डिब्बा क्या है और रत्न क्या है सो भी सुनो। डिब्बा तो चित्त है और रत्न देह है। इससे चित्त के नष्ट होने का उपाय करो। जब चित्त नष्ट होगा, तब देह से रहित होगे। देह के नष्ट होने पर चित्त नहीं नष्ट होता; पर चित्त के नष्ट होने पर देह नष्ट हो जाती है। जब यह देह चित्तरूपी धूल से रहित होगा, तब तुम केवल शुद्ध आकाश रहोगे।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे चित्तत्यागवर्णनं नाम त्रिसप्ततितमसर्गः ॥ ७३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! जब इस प्रकार कुम्भज ने कहा कि चित्त का त्यागना ही सर्वत्याग है, तब शिखिध्वज ने पूछा, हे भगवन्! मैं चित्त को कैसे स्थित करूँ? चित्त संसाररूपी आकाश की धूल है।
२२८ * योगवाशिष्ठ *
संसाररूपी वृक्ष का निवासी चित्तरूपी वानर कभी स्थिर नहीं होता; ऐसे चित्त को मैं कैसे स्थिर करूँ? तब कुम्भज ने कहा, हे राजन! चित्त का रोकना तो सुगम है। नेत्रों के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न करना पड़ता है, परन्तु चित्त के रोकने में कुछ यत्न नहीं। हाँ, दीर्घदर्शी को यह सुगम है और अज्ञानी को कठिन। जैसे चाण्डाल के लिए पृथ्वी का राजा होना और तृण के लिए सुमेरु होना कठिन है, वैसे ही अज्ञानी के लिए चित्त का रोकना कठिन है। राजा ने पूछा, हे देवपुत्र! पर्वत तोड़ना कठिन है तो भी वह टूट जाता है; परन्तु मन का रोकना अति कठिन है। जैसे बड़े मच्छ को बालक नहीं रोक सकता, वैसे ही मैं चित्त को नहीं रोक सकता। हे देवपुत्र! तुम कहते हो कि मन का रोकना सुगम है, पर मुझको तो ऐसा कठिन लगता है, जैसे अन्धे पुरुष को लिखी हुई मूर्ति नेत्रों से नहीं देख पड़ती तो वह उसे हाथ में कैसे ले, वैसे ही मन को वश करना मुझे कठिन भामता है। प्रथम चित्त का रूप मुझसे कहिये।
कुम्भज बोले, हे राजन! इस चित्त का रूप वासना है। जब वासना नष्ट होगी, तब चित्त भी नष्ट हो जावेगा। इसमें वासनारूपी बीज को तुम नष्ट करोगे तो चित्तरूपी वृक्ष भी नष्ट हो और न कोई डाल रहे, न कोई फल-फूल हों। यदि डाल को काटोगे तो वृक्ष फिर फिर होगा; क्योंकि डाल के काटने से वृक्ष नष्ट नहीं होता, फिर कई डालें लग जाती हैं। जब बीज को नष्ट करोगे तब वृक्ष भी नष्ट हो जावेगा। राजा बोले, हे भगवन्! चित्तरूपी फूल की यह संसार सुगन्ध है; चित्तरूपी कमल का यह संसार सरोवर है; देहरूपी तृण को उठाने और उड़ानेवाला पवन चित्त है; चित्तरूपी तिल का तेल जरा-मृत्यु और आध्यात्मिक, आधि-भौतिक दुःख हैं; चित्तरूपी आकाश की अँधेरी यह संसार है और हृदय-रूपी कमल का भँवरा चित्त है। बीज क्या है, और डाल क्या है, डाल का काटना क्या है, वृक्ष क्या है और फल-फूल क्या है, सो कृपा कर कहो। कुम्भज बोले, हे राजन! चैतन्यरूपी खेत स्वच्छ और निर्मल है। उसमें अहंभाव बीज है। उर्मी को अहंकार, चित्त, मन, जड़ और मिथ्या
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २२६
कहते हैं। उस अहंकार में जो संवेदन है वही देह और इन्द्रियाँ होकर फैला है और उसमें जो निश्चय है वह बुद्धि है। उस बुद्धि में जो निश्चय है कि 'यह मैं हूँ' वही संसार है और वही जीव का अहंकार है। अहंकार इस वृक्ष का बीज है; चित्तरूपी वृक्ष की डालें और सुख-दुःख इस चित्तरूपी वृक्ष के फल हैं। हे राजन्! एकान्त में बैठकर और चिन्तना से रहित होकर एक आश्रय का त्याग करना और दूसरे को अङ्गीकार करना और इस प्रकार स्थित होना कि मैं ऐसा त्यागी हूँ, इसकी चिन्तना ही उस डाल का काटना है। हे राजन्! इस डाल के काटने से वृक्ष नहीं नष्ट होता; क्योंकि यह तो ऐसा होकर स्थित होता है कि मैं हूँ। होना यह चाहिए कि वासना त्याग करे और कुछ न फुरे। जब अहँरूपी बीज नष्ट हो जाता है, तब जगत्-रूपी वृक्ष भी नष्ट हो जाता है; क्योंकि इसका बीज अहँ ही है। जब अहंभाव बीज नष्ट हुआ, तब वृक्ष भी नष्ट हो जाता है। इससे चित्तरूप बीज को तुम नष्ट करो।
राजा बोले, हे देवपुत्र! तुम्हारा निश्चय मैंने यह जाना है कि जगत् के त्यागने से चित्त को नष्ट करना श्रेष्ठ है। हे भगवन्! इतने काल तक मैं डालें काटता रहा हूँ, इसी से मेरे दुःख नहीं नष्ट हुए। आपने कहा कि अहँ ही दुःखदायी है, इसलिए कृपा करके कहिए कि अहँ कैसे उत्पन्न होता है? कुम्भज बोले, हे राजन्! शुद्ध चैतन्य में जो चैतन्योन्मुखत्व अहँ का स्फुरण हुआ कि 'मैं हूँ,' वही दृश्यरूप हुआ है और मिथ्या संवेदन से हुआ है। जैसे शान्त समुद्र में पवन से लहरें उठती हैं, वैसे ही शुद्ध आत्मा में अहँ फुरता है और उससे संसार हुआ है। इससे अहंभाव नष्ट करो, जिससे शान्तपद में स्थित होओ। जो दुःखदायक वस्तु है, उसको नष्ट करे तो शान्त हो। राजा ने पूछा, हे भगवन्! वह कौन वस्तु है, जो जलाने योग्य है और वह कौन अग्नि है, जिसमें वह जलती है? कुम्भज बोले, हे त्यागियों में श्रेष्ठ राजा! तुम्हारा जो अपना स्वरूप है, उसका विचार करो कि 'मैं क्या हूँ' और 'यह संसार क्या है' इसका दृढ़ विचार करना ही अग्नि है।
२३० * योगवाशिष्ठ *
मिथ्या अनात्मा अर्थात देह-इन्द्रियादिक में अहंभाव को अनात्मस्वरूप विचार-अग्नि में जलाओ। जब विचार-अग्नि में अहंकार-बीज को जलाओगे, तब केवल चिन्मात्र रहेगा। हे राजन्! मेरे उपदेश से तुम अपने को क्या जानते हो, सो मुझसे कहो। राजा ने कहा—मैं राजा, पृथ्वी, पर्वत, आकाश, दशों दिशा, रुधिर, मांस, देह, कर्म-इन्द्रियां, ज्ञान-इन्द्रियां, मन, बुद्धि और अहंकार नहीं; मैं इससे रहित शुद्ध आत्मा हूँ। परन्तु हे भगवन्! अहंरूपी कलङ्क मुझे कहाँ से लगा है कि उस कलङ्क को मैं दूर नहीं कर सकता?
तब कुम्भज ने कहा, हे राजन्! इसी अहं का त्याग करो, जो मैंने त्याग किया है। बल्कि यह फुरना भी न फुरे, नितान्त शून्य हो रहे। जब इसका त्याग करोगे, तब चैतन्य आकाश ही रहेगा। हे राजन्! तुम अपने स्वरूप को जानो कि कौन हो। राजा ने कहा, हे भगवन्! मैं यह जानता हूँ कि मेरा स्वरूप वही आत्मा है, जो सबका आत्मा है; मैं आनन्दरूप हूँ और सब मेरा प्रकाश है। परन्तु मैं यह नहीं जानता कि अहंभाव की कल्पना कहाँ से लगी है? इसका मैं नाश नहीं कर सकता। पर यह मैंने जाना है कि संसार का बीज चित्त ही है और चित्त का बीज अहंकार है। तुम्हारी कृपा से मैंने जाना है कि मेरा स्वरूप आत्मा है और 'अहं,' 'त्वं' मुझमें कोई नहीं। तुम भी इस अहं-रूप कलङ्क को दूर कर रहे हो, पर मुझसे दूर नहीं होता। फिर फिर मन में आता है कि मैं शिखिध्वज हूँ। इस अहं से मैं संसारी हूँ। इसके नाश का उपाय आप कहिए। कुम्भज बोले, हे राजन्! कारण बिना कार्य नहीं होता। जो कारण बिना कार्य भासित हो तो जानिये कि वह भ्रममात्र और मिथ्या है, और जिसका कारण पाइये, उसे जानिये कि सत्य है। इसमें तुम कहो कि इस अहंकार का कारण क्या है, तब मैं उत्तर दूँगा? राजा बोले, हे भगवन्! अहंकार का कारण शुद्ध आत्मा है। शुद्ध आत्मा में जो यह ज्ञान हुआ है कि मैं हूँ, यही उत्थान है। और दृश्य की ओर जो मन लगा है, सो संवेदन ही अहं का कारण है। कुम्भज बोले, हे राजन्! इस जानने का कारण क्या है?
❋ निर्वाण प्रकरण ❋
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प्रथम तुम यह कहो. पीछे दूर करने का उपाय मैं कहूँगा। हे राजन्! जिसका कारण सत् होता है, वह कार्य भी सत् होता है और जो कारण झूठ होता है तो कार्य भी झूठा होता है। जैसे भ्रमदृष्टि में जो दूसरा चन्द्रमा आकाश में दीखता है, उसका कारण भ्रम है। इससे इस भ्रम को ही संवेदन का कारण कहा। सो जानना ही द्रष्टा और दृश्य-रूप होकर स्थित हुआ है।
राजा बोले, हे देवपुत्र! जानने का कारण देहादिक दृश्य है; क्योंकि जानना तब होता है। जब जानने योग्य वस्तु आगे होती है, और जो आगे वस्तु नहीं होती है तो वह जाना भी नहीं जाता। इससे जानने का कारण देहादिक हुए। कुम्भज बोले, हे राजन्! ये देहादिक मिथ्या भ्रम से हुए हैं; इनका कारण तो कोई नहीं। राजा बोले, हे देवपुत्र! देह का कारण तो प्रत्यक्ष है, क्योंकि पिता से इसकी उत्पत्ति हुई है और यह प्रत्यक्ष कार्य करता देख पड़ता है; आप कैसे कहते हैं कि कारण बिना है और मिथ्या है? कुम्भज बोले, हे राजन्! पिता का कारण कौन है? पिता भी मिथ्या है। जैसे स्वप्न में पिता और पुत्र देखिये, वे दोनों मिथ्या हैं। इससे कहो, पिता का कारण क्या है? राजा बोले, हे भगवन्! पुत्र का कारण पिता और पिता का कारण पितामह है। इसी प्रकार परम्परा से सबका कारण ब्रह्मा प्रत्यक्ष है; क्योंकि सबकी उत्पत्ति ब्रह्माजी से हुई है। कुम्भज बोले, हे राजन्! ब्रह्मा से काष्ठ पर्यन्त सब सृष्टि संकल्प की रची है और देह भी भ्रम करके भासित होता है। जैसे मृगतृष्णा का जल और सीपी में रूपा भासित होता है, वैसे ही आत्मा में देह भासित होती है। जैसे आकाश में दो चन्द्रमा भ्रम से दीखते हैं, वैसे ही आत्मा में यह संसार भ्रम से भासित होता है। जो तुम कहो कि क्रिया कैसे दीखती है तो सुनो। जैसे कोई कहे कि बन्ध्या के पुत्र को भूषण पहनाये हैं, तो जब बन्ध्या का पुत्र ही नहीं तो भूषण किसने पहने! अथवा जैसे स्वप्न में सब क्रिया भ्रममात्र होती है; वैसे ही यह संसार तुम्हारे भ्रम में है। जब भ्रम निवृत्त होगा, तब केवल आत्मा ही भासित होगा। हे राजन्! जैसे
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तुम अपना देह जानते हो, वैसे ही ब्रह्मा को भी जानो। ब्रह्मा का कारण कौन है ? इसमें इस भ्रम में जागो, जिसमें तुम्हारा भ्रम नष्ट हो जावे।
राजा बोले, हे भगवन् ! मैं अब जागा हूँ और मेरा भ्रम नष्ट हो गया है। मैंने अब जाना है कि यह संसार केवल संकल्पमात्र मिथ्या है। जो कुछ दृश्य है सो मिथ्या है और एक आत्मा ही मेरे निश्चय में मन है। हे भगवन् ! ब्रह्मा का कारण भी ब्रह्म है और वह अद्वैत अविनाशी और सर्वात्मा है। ब्रह्मा का कारण यह हुआ। कुम्भज बोले, हे राजन् ! कारण और कार्य द्वैत में होते हैं, अतः वे असत् हैं, क्योंकि इस कारण का देश, वस्तु और काल में अन्त हो जाता है, अतः यह परिणामी है। जो वस्तु परिणामी हो, वह मिथ्या है। हे राजन् ! आत्मा अद्वैत है; जिसमें न एक कहना है, न द्वैत कहना है। न वह भोगता है, न भोग है, न कर्म है, न अद्वैत है। जब वह स्वरूप से परिणाम को नहीं प्राप्त होता और सर्वात्मा है, जब सर्व देश और सर्वकाल भी है, जब वह सब वस्तुओं में पूर्ण और अद्वैत है तब यदि वह अद्वैत है तो कारण कार्य किसका हो ? कारण-कार्य का सम्बन्ध द्वैत में होता है और वह परिणामी होता है। जिसमें देशकाल का अन्त है वह अद्वैत आत्मा है। उसमें न कोई देश है, न काल है और न कोई वस्तु है; वह केवल चिन्मात्रपद है।
हे राजन् ! मैं जानता हूँ कि तुम जाग्रत होगे, क्योंकि तुम्हारा भ्रम नष्ट हो जाना है। जैसे बर्फ की पुतली सूर्य की किरणों में गल जाती है, वैसे ही तुम्हारा अज्ञान नष्ट होता जा रहा है। अज्ञान के नष्ट होने पर तुम आत्मा ही होगे। तुम अपने प्रत्यक् चैतन्यस्वरूप में स्थित हो और देखो कि ब्रह्मा आदिक सब परमात्मा का किंचन है। परमात्मा ही इन रूपों में स्थित हुआ है। और जो देख पड़ता है, उस सबका अपना आप आत्मा है। जब जागेगा तो जानेगा, जागे बिना नहीं जान सकता। राजा बोला, हे भगवन् ! तुम्हारी कृपा से अब मैं जागा हूँ और जानता हूँ कि मेरा स्वरूप आत्मा है और में निर्मल हूँ। अब
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २३३
मेरा मुझको नमस्कार है। एक मैं ही हूँ; मुझसे भिन्न कुछ नहीं। मैंने अपने को जाना है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे राजविश्रान्तिवर्णनं नाम चतुःसप्ततितमसर्गः ॥ ७४ ॥
राजा ने पूछा, हे भगवन्! आप कैसे कहते हैं कि ब्रह्मा का कारण कोई नहीं? आत्मा ऐसा अनन्त, अच्युत, अव्यक्त और अद्वैत ईश्वर है वह षट् परिमाणों का विषय नहीं। तब परब्रह्म तो ब्रह्मा का कारण है? कुम्भज बोले, हे राजन्! तुम्हीं कहते हो कि आत्मा अनन्त है। जो अनन्त है, उसको देश, काल और वस्तु का परिच्छेद नहीं होता। जो सब देश, सब काल, और सब वस्तुओं में पूर्ण है, वह कारण-कार्य किसका हो? कारण तब हो, जब पहले द्वैत हो। सो आत्मा अद्वैत है, अतः वह नहीं हो सकता। और कारण उसको कहते हैं, जो कार्य से पूर्व हो और पीछे भी वही हो—जैसे घट के आदि में मृत्तिका है और अन्त में भी मृत्तिका होती है। वह कारण कहलाता है। पर आत्मा में न आदि है, न अन्त है। वह तो अनन्त है। कारण तब होता है, जब परिणाम होता है। सो आत्मा अच्युत है, अपने स्वरूप से कदापि नहीं गिरा। और भोक्ता भी द्वैत से होता। आत्मा अद्वैत है। वह भोग और भोक्ता दोनों नहीं। और आत्मा में कर्म भी नहीं। आत्मा से आदि कौन है जिससे आत्मा सिद्ध हो? वह किसी का कार्य भी नहीं; क्योंकि कार्य इन्द्रियों का विषय होता है। सो आत्मा अव्यक्त है। और जो कार्य होता है तो उसका कारण भी होता है। सो आत्मा सबका आदि है, उसका कारण कौन हो? जो सर्वात्मा है और स्वच्छ आकाशवत् निर्मल है, वही तुम्हारा स्वरूप है। राजा ने पूछा, हे भगवन्! बड़ा आश्चर्य है! मैंने जाना है कि आत्मा अद्वैत है, वह न किसी का कारण है, न कार्य, और अनुभवरूप है। वही मैं हूँ। मैं निर्मल हूँ, विद्या-अविद्या के कार्य से रहित हूँ; निर्वाणपद हूँ और निर्विकल्प हूँ; मुझमें स्फुरण कोई नहीं। और मैं नहीं और मैं ही हूँ। मेरा मुझको नमस्कार है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पञ्चसप्ततितमसर्गः ॥ ७५ ॥