भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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१०८ योगवाशिष्ठ ।

जैसे हाथ में दीपक हो और अन्धा होकर कूप में गिरे सो मूर्खता है वैसे ही संसार भ्रम के निवारणवाले गुरु और शास्त्र विद्यमान् है जो उनकी शरण न आवै वह मूर्ख है। हे रामजी ! जिस पुरुष ने सन्त की संगति और सत्शास्त्र के विचार द्वारा आत्मपद को पाया है सो पुरुष केवल कैवल्यभाव को प्राप्त हुआ है अर्थात शुद्ध चैतन्य को प्राप्त हुआ है और संसार भ्रम उसका निवृत्त हो गया है। हे रामजी ! यह संसार मन के संसरने से उपजा है। जीव का कल्याण बान्धव, धन, प्रजा, तीर्थ देव द्वारा और ऐश्वर्य्य से नहीं होता, केवल एक मन के जीतने से कल्याण होता है। हे रामजी ! जिसको ज्ञान परमपद रसायन कहते हैं, जिसके पाने में जीव का नाश न हो और जिसमें सर्वसुख की पूर्णता हो इसका साधन समता और सन्तोष है। इनसे ज्ञान उत्पन्न होता है। आत्मज्ञान-रूपी एक वृक्ष है सो उसका फूल शान्ति है और स्थिति फल है, जिस पुरुष को यह ज्ञान प्राप्त हुआ है शान्तिमान् होकर निर्लेप रहता है। उसको संसार का भावाभावरूप स्पर्श नहीं होता जैसे आकाश में सूर्य उदय होने से जगत् की क्रिया होती है और जब वह अदृश्य होता है तब जगत् की क्रिया भी लीन हो जाती है; और जैसे उस क्रिया के होने और न होने में आकाश ज्यों का त्यों है वैसे ही ज्ञानवान् सदा निर्लेप है उस आत्मज्ञान की उत्पत्ति का उपाय यह मेरा श्रेष्ठ शास्त्र है। हे रामजी ! जो पुरुष इस मोक्षोपाय शास्त्र को श्रद्धासंयुक्त पढ़े अथवा सुने तो उसी दिन से वह मोक्ष का मार्गी हो। मोक्ष के चार द्वारपाल हैं सो में तुमसे कहता हूँ। जब इनमें से एक भी अपने वश हो तब मोक्षद्वार में शीघ्र ही प्रवेश होगा। उन चारों के नाम सुनिये। हे रामजी ! शम जीव के परम विश्राम का कारण है। यह संसार जो दीखता है सो मरुस्थल की नदीवत है इसको देखकर मूर्ख अज्ञानी सुखरूप जल जानकर मृग के समान दौड़ता है। शान्ति को नहीं प्राप्त होता। जब शमरूपी मेघ की वर्षा हो तब सुखी हो। हे रामजी ! शम ही परमानन्द परमपद और शिवपद है। जिस पुरुष ने शम पाया है सो संसारसमुद्र से पार हुआ है। उसके शत्रु भी मित्र हो जाते हैं। हे रामजी ! जैसे चन्द्र उदय होता