भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 107, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 107

मुमुक्षु प्रकरण । १०६

है तब अमृत की कला फूटती है और शीतलता होती है वैसे ही जिसके हृदय में शमरूपी चन्द्रमा उदय होता है उसके सब ताप मिट जाते हैं और परम शान्तिमान होता है । हे रामजी ! शम देवता के अमृत समान कोई अमृत नहीं, शम से परम शोभा की प्राप्ति होती है । जैसे पूर्णमासी के चन्द्रमा की कान्ति परम उज्ज्वल होती है वैसे ही शम को पाके जीव की उज्ज्वल कान्ति होती है । जैसे विष्णु के दो हृदय हैं-एक तो अपने शरीर में और दूसरा सन्तों में है वैसे ही जीव के भी दो हृदय होते हैं एक अपने शरीर में और दूसरा शम में । जैसा आनन्द शमवान् को होता है वैसा अमृत पीने से भी नहीं होता । हे रामजी ! कोई कोई प्राण मे प्रिय अन्तर्धान होकर फिर प्राप्त हो तो जैसा आनन्द होता है उस आनन्द से भी अधिक आनन्द शमवान् को होता है । उसके दर्शन से जैसा आनन्द होता है ऐसा आनन्द राजा, मन्त्री और सुन्दर स्त्री को भी नहीं । हे रामजी ! जिस पुरुष को शम की प्राप्ति हुई है वह वन्दना करने और पूजने योग्य है । जिसको शम की प्राप्ति हुई है उसको उद्वेग नहीं होता और अन्य लोगों से उद्वेग नहीं पाता । उसकी क्रिया और वचन अमृत की नाईं मीठे और चन्द्रमा की किरण के समान शीतल और सबको हृदयाराम है । हे रामजी ! जैसे बालक माता को पाके आनन्दित होता है वैसे ही जिसको शम की प्राप्ति हुई है उसके संग से जीव अधिक आनन्दवान् होता है । जैसे किसी का बान्धव मुवा हुआ फिर आवे और उसको आनन्द प्राप्त हो उससे भी अधिक आनन्द शमसम्पन्न पुरुष को होता है । हे रामजी ! ऐसा आनन्द चक्रवर्ती और त्रिलोकी का राज्य पाने से भी नहीं होता । जिसको शम की प्राप्ति हुई है उसके शत्रु भी मित्र हो जाते हैं; उसको सर्प और सिंह का भय नहीं रहता बल्कि किसी का भी भय नहीं रहता, वह सदा निर्भय शान्तरूप रहता है । हे रामजी ! जो कोई कष्ट प्राप्त हो और काल की अग्नि भी आ लगे तो भी वह चलायमान नहीं होता-सदा शान्तरूप रहता है । जैसे शीतल चाँदनी चन्द्रमा में स्थिर है वैसे ही जो कुछ शुभ गुण और संपदा है सब शमवान् के हृदय में आ स्थित

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