योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 121, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुमुक्षु प्रकरण । १२३
है; रूप अवलोकन और मनस्कार उसका आकाशरूप हो जाता है । वह उस पद को प्राप्त होता है जिस पद की उपमा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी नहीं कह सकते ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे षट्प्रकरणविवरणन्नाम सप्तदशसर्गः॥१७॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ये परम उत्तम वाक्य हैं । इनको विचारनेवाला उत्तम पद को प्राप्त होता है । जैसे उत्तम खेत में उत्तम बीज बोने से उत्तम फल की उत्पत्ति होती है वैसे ही इनका विचारने-वाला उत्तम पद को प्राप्त होता है । ये वाक्य युक्तिपूर्वक हैं; कदाचित् युक्ति से रहित वाक्यार्थ भी हों तो उनका त्याग करना चाहिये और युक्ति-पूर्वक वाक्य अङ्गीकार करना चाहिये । हे रामजी ! ब्रह्मा के भी वचन युक्ति से रहित हों तो उनको भी सूखे तृण के समान त्याग देना चाहिये और यदि बालक के वचन युक्तिपूर्वक हों तो उनको अङ्गीकार करना चाहिए । जैसे पिता के कूप का स्वादु जल हो तो उसे त्यागकर निकट के मिष्टकूप के जल को पान करते हैं वैसे ही बड़े और छोटे का विचार न करके युक्तिपूर्वक वचन अङ्गीकार करना चाहिये । हे रामजी ! मेरे वचन सब युक्तिपूर्वक और बोध के परम कारण हैं । जो पुरुष एकाग्र होके इस शास्त्र को आदि से अन्त पर्यन्त पढ़ेगा अथवा पण्डित से श्रवण करके विचारेगा तब उसकी बुद्धि संस्कारित होगी । जब पहिले वैराग्य प्रकरण को विचारोगे तब वैराग्य उपजेगा जितने जगत् के रमणीय भोग पदार्थ हैं उनको विरस जानकर किसी पदार्थ की वाञ्छा न करोगे । जब भोग में वैराग्य होता है तब शान्तिरूप आत्मतत्त्व में प्रतीति होती है और जब विचार से बुद्धि संस्कारित होगी तब शास्त्र का सिद्धान्त बुद्धि में स्थित होगा । जैसे शरदकाल में बादल के अभाव से आकाश सब ओर से स्वच्छ हो जाता है वैसे ही संसार के विकार छूटकर बुद्धि निर्मल होगी और फिर आधिव्याधि की पीड़ा न होगी । हे रामजी ! ज्यों २ विचार दृढ़ होगा त्यों-त्यों शान्तात्मा होगे । इससे जितने संसार के यत्न हैं उनको त्याग इस शास्त्र के वारंवार विचार से चैतन्य सत्ता उदय होगी और मोहादिक विकार की सत्ता नष्ट होगी ।