भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

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१२४ योगवाशिष्ठ ।

जैसे ज्यों २ सूर्य उदय होता है त्यों २ अन्धकार नष्ट होता है वैसे ही विकार नष्ट होंगे । तब उस पद की प्राप्ति होगी जिसके पाने से संसार के क्षोभ मिट जायँगे । जैसे शरदकाल में मेघ नष्ट हो जाता है वैसे ही संसार के क्षोभ मिट जाते हैं । हे रामजी ! जिस पुरुष ने कवच पहना हो उसको बाण नहीं बेध सकते वैसे ही ज्ञानवान् पुरुष को संसार के राग द्वेष नहीं बेध सकते । उसको भोग की भी इच्छा नहीं रहती और जब विषय भोग आते हैं तब उनको विषय जानके बुद्धि ग्रहण नहीं करती जैसे पतिव्रता स्त्री अपने अन्तःपुर से बाहर नहीं निकलती वैसे ही उसकी बुद्धि भीतर से बाहर नहीं निकलती । हे रामजी ! बाहर से तो वह भी प्राकृतिक मनुष्यों के समान दृष्टि आते हैं और जो कुछ अनिश्चित प्राप्त होते हैं उनको भुगतता हुआ दृष्टि में आता है पर अन्तर में उसको राग द्वेष नहीं फुरता । हे रामजी ! जो कुछ जगत् की उत्पत्ति और प्रलय का क्षोभ है वह ज्ञानवान् को नष्ट नहीं कर सकता । जैसे चित्र की बेलि को आंधी नहीं चला सकती वैसे ही उसको जगत् का दुःख नहीं चला सकता । वह संसार की ओर से जड़ हो जाता है और वृद्ध के समान गम्भीर, पर्वत की नाईं स्थिर और चन्द्रमा के सदृश शीतल हो जाता है । हे रामजी ! वह आत्मज्ञान से ऐसे पद को प्राप्त होता है जिसके पाने से और कुछ पाने योग्य नहीं रहता । आत्मज्ञान का कारण यह मोक्षोपाय शास्त्र है इसमें नाना प्रकार के दृष्टान्त कहे हैं । जो वस्तु अपरिच्छिन्न हो और देखने में न आवे और उसका न्याय देखने में हो तो उसको उपमा से विधिपूर्वक समझाने का नाम दृष्टान्त है । हे रामजी ! जगत् कार्य और कारण से रहित है तो आत्मा और जगत् की एकता कैसे हो इससे मैं जो दृष्टान्त कहूँगा उसका एक अंश अंगीकार करना, सब देश अङ्गीकार न करना । हे रामजी ! कार्य कारण की कल्पना मूर्खों ने की है । उसके मिटाने के लिये मैं स्वप्न दृष्टान्त कहता हूँ, उसके समझने से तेरे मन का संशय नष्ट हो जावेगा । दृग और दृश्य का भेद मूर्ख को भासता है । उसके दूर करने के अर्थ में स्वप्न दृष्टान्त कहूँगा जिसके विचारने से मिथ्याविभाग कल्पना का अभाव होता है । हे रामजी ! ऐसी कल्पना का