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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1219, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1219

४१२ ❇ योगवासिष्ठ ❇

होता है। जब अहंता से रहित होगे तब जगत् का भ्रम मिट जावेगा। अहंता आत्मबोध में नष्ट होती है। आत्मबोधरूपी अँधारी में उड़ाया अहंतारूपी पाषाण न जानोगे कि कहाँ गया। सुवर्ण मिट्टी के ढेले सा तुमको हो जावेगा। शरीररूपी पत्ते पर अहंतारूपी अणु स्थित है; जब बोधरूपी वायु चलेगी तब न जान पाओगे कि कहाँ गया। शरीररूपी पत्ते पर अहंतारूपी वरफ का कणका स्थित है; बोधरूपी सूर्य के उदय होने पर न जानोगे कि वह कहाँ गया। बोध बिना अहंता नष्ट नहीं होती। चाहे कीचड़ में रहे और चाहे पहाड़ में जावे, चाहे घर में रहे और चाहे स्थल में रहे, चाहे स्थूल हो और चाहे सूक्ष्म हो, चाहे निराकार हो और चाहे रूपान्तर को प्राप्त हो, चाहे भस्म हो और चाहे मृतक हो, चाहे दूर हो अथवा निकट हो, जहाँ रहेगा, वहीं अहंता इसके साथ है। हे राम! संसाररूपी वट का बीज अहंता है। उसी से सब शाखा फैली हैं। सब अर्थों का कारण अहंता है। जब तक अहंता है, तब तक दुःख नहीं मिटता। और जब अहंभाव नष्ट होता है तब परमसिद्धि की प्राप्ति होती है। हे राम! जो कुछ मैंने उपदेश किया है, उसका भली प्रकार विचारकर उसका अभ्यास करो, तब संसाररूपी वृक्ष का बीज जल जायगा और आत्मपद की प्राप्ति होगी।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अहंकाअस्तयोगोपदेशो नाम शताधिकचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ १४० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! संसार संकल्पमात्र से सिद्ध है और भ्रम में उदय हुआ है। आत्मस्वरूप में अनेक सृष्टियाँ बनती हैं। कोई लीन होती हैं, कोई उत्पन्न होती हैं और कोई उड़ती हैं, कहीं इकट्ठी उड़ती हैं और कहीं भिन्न-भिन्न उड़ती हैं, सो सब मुझको प्रत्यक्ष भासित होती हैं, देखो, वे उड़ती जाती हैं। ये सब आकाशरूप हैं और आकाश ही में मिलती हैं। जैसे केले का वृक्ष देखने भर को सुन्दर होता है, पर उसमें कुछ सार नहीं होता, वैसे ही विश्व देखने भर को सुन्दर है, पर आकाश रूप है। जैसे जल में पहाड़ का प्रतिबिम्ब पड़ता है और हिलना जान पड़ता है, वैसे ही यह जगत् है। राम ने पूछा, हे भगवन्! आप कहते