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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1220, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1220

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ २१३

है कि सृष्टि मुझे प्रत्यक्ष उड़ती दिखती है—तुम भी देखो; यह तो मैंने कुछ नहीं समझा कि आप क्या कहते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अनेक सृष्टियाँ उड़ती हैं, सो सुनो । पञ्चभौतिक शरीर में प्राण स्थित हैं । प्राण में चित्त स्थित है । और उस चित्त में अपनी-अपनी सृष्टि है । जब यह पुरुष शरीर का त्याग करता है, तब लिङ्गशरीर ( जो वासना और प्राण है ) उड़ता है । उस लिङ्गशरीर में जो विश्व है, वह सूक्ष्मदृष्टि से मुझको भासित होता है । हे राम ! आकाश में जो वायु है, उसका रूपरङ्ग कुछ नहीं । वही वायु प्राणों से मिलकर मुझे प्रत्यक्ष दिखाई देती है । इसी का नाम जीव है । यथार्थ में न कोई आता है, न जाता है, परन्तु लिङ्गशरीर के संयोग से आता-जाता और जन्मता-मरता दीखता है । मनुष्य अपनी वासना के अनुसार आत्मा में विश्व देखता है । यह वासनामात्र सृष्टि है । जैसी वासना होती है, वैसा ही विश्व भासित होता है ।

हे राम ! यह पुरुष आत्मस्वरूप है, परन्तु लिङ्गशरीर के मिलने से इसका नाम जीव हुआ है । यह अपने को प्रच्छन्न जानता है; पर वास्तव में ब्रह्मस्वरूप है । देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित ब्रह्म है, पर प्रमाद से अपने को कुछ का कुछ मानता है । इसी का नाम लिङ्गशरीर है । जैसे घटाकाश भी महाकाश है, परन्तु घट के खप्पर से परिच्छिन्न हुआ है, वैसे ही यह पुरुष भी आत्मस्वरूप है, और अहंकार के संयोग से प्रच्छन्न हुआ है । जैसे घट को एकदेश से उठाकर देशान्तर में ले जाकर रखो तो आकाश तो न कहीं गया और न आया, परन्तु आता-जाता लगता है, वैसे ही आत्मा अखण्डरूप है, परन्तु प्राण चित्त से चलता भासित होता है । जब अहंकाररूप चित्त नष्ट हो तब अखण्डरूप हो । जब तक अहंकार नहीं जाता, तब तक जगत् भ्रम दीखता है और वासना करके भटकना फिरता है । वासनामय सृष्टि अपने-अपने चित्त में स्थित है । जीव जब शरीर का त्याग करता है, तब आकाश में उड़ता है, और प्राणवायु उड़कर जो आकाश में शून्यरूप वायु है उससे जा मिलता है । वहाँ सबको अपनी-अपनी