योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1227, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें४२० * योगवाशिष्ठ *
एकदेशी हुआ है। जब परिच्छिन्नता का वियोग हो, तब आत्मस्वरूप होता है। हे राम ! अपने वास्तव निर्गुणस्वरूप में गुणों का संयोग उपाधि में भानित होता है, वही अनर्थरूप है। जब निर्गुण और सगुण की गाँठ टूटेगी, तब अपना केवल अद्वैततत्त्व आप भानित होगा। वह अनामय और दुःख से रहित है, सत् असत् से परे ज्ञानरूप और आदि-अन्त से रहित है। उसके पाने से फिर कुछ पाना शेष नहीं रहता और उसको जानने से फिर कुछ जानना नहीं रह जाता। ऐसा जो उत्तम पद है, उसको आत्मतत्त्व से प्राप्त होगे। हे राम ! यह तो ज्ञान तुमसे कहा है, उसका आश्रय लेकर तुम ज्ञानवान् होना; ज्ञानबन्ध न होना। ज्ञानबन्ध से तो अज्ञानी भला है; क्योंकि अज्ञानी भी साधुओं के संग और मतशास्त्रों को सुनने से ज्ञानवान् होता है; पर ज्ञानबन्ध मुक्त नहीं होता। जैसे रोगी कहे कि मुझको कोई रोग नहीं है, मैं नीरोग हूँ, तो वह वैद्य की औषध भी नहीं खाता क्योंकि वह अपने को नीरोग जानता है, वैसे ही जो ज्ञानबन्ध है वह सन्तों का संग और सतशास्त्रों का श्रवण भी नहीं करता, इससे वह अन्धतम को प्राप्त होता है।
राम ने पूछा, हे भगवन् ! ज्ञान और ज्ञानबन्ध का लक्षण क्या है और ज्ञानबन्ध का फल क्या है, सो कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस पुरुष ने आत्मा के विशेषण शास्त्रों में श्रवण किये हैं कि आत्मा नित्य, शुद्ध, ज्ञानस्वरूप और तीनों शरीरों से भिन्न है, और ऐसे सुनकर अपने को वही मानता है, पर विषयों के भोगने की सदा तृष्णा रहती है कि किसी प्रकार इन्द्रियों के विषय मुझे प्राप्त हों, ऐसा पुरुष ज्ञानबन्ध है। वह बोधशिल्पी है, जो कर्मफल के विचार से रहित है अर्थात् भला-बुरा विचार नहीं करता और उन्हें करता है। और जो मुख से शुभ-अशुभ निरूपण करता है, वह शास्त्रशिल्पी है और फल के लिए कर्म करता है। कोई ऐसा है कि अपने को शास्त्रोक्त उत्तम मानता है; शास्त्रों के बहुत प्रकार से अर्थ भी कहता है, पढ़ता और पढ़ाता भी है, पर विषयों में बँधा हुआ है और सदा विषयों का चिन्तन करता है-