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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1228, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1228

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४२१

ऐसा पुरुष ज्ञानबन्ध है । इसी कारण वह अर्थशिल्पी भी कहलाता है अर्थात् चितेरा करने को समर्थ है और धारण करने को समर्थ नहीं । हे राम ! एक प्रवृत्तिमार्ग है और दूसरा निवृत्तिमार्ग है । प्रवृत्ति संसारमार्ग है और निवृत्ति आत्मज्ञानमार्ग है । जिस पुरुष ने निवृत्तिमार्ग ग्रहण किया है, पर प्रवृत्तिमार्ग में अर्थात् बहिर्मुख विषयों की ओर प्रवृत्त होता है; इन्द्रियों के विषयों की चाह करता और विषयों से उपरत नहीं होता एवम् उनसे सन्तुष्ट होकर स्वरूप का अभ्यास नहीं करता, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है ।

हे राम ! जो पुरुष श्रुति के कहे शुभकर्म फल की कामना हृदय में रखता है, वह पुरुष ज्ञान के निकटवर्ती है, तो भी ज्ञानबन्ध है । जिसको आत्मा में प्रीति भी है, पर जो विषय का चिन्तन करता है और अपने को उत्तम मानता है, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है । और जो आत्मतत्त्व का यथार्थ निरूपण करता है और स्थित नहीं है, वह ज्ञान-आभास है और उसको ज्ञान का फल नहीं मिलता । जिस पुरुष ने सिद्धि और ऐश्वर्य पाया है और उससे अपने को बड़ा जानता है, पर आत्मज्ञान से रहित है, वह ज्ञानबन्ध कहलाता है । हे राम ! निदिध्यास से ज्ञान की प्राप्ति होती है और उससे शान्ति का प्रकाश होता है । जब तक शान्ति नहीं प्राप्ति होगी, तब तक अपने को बड़ा ज्ञानी न माने । हे राम ! मनुष्य ज्ञान से बड़ा होता है । जब तक ज्ञान न उपजे तब तक आत्मपरायण हो; अभ्यास और यत्न करे; शुभ व्यवहार में प्राणों की रक्षा के निमित्त उपजीविका उत्पन्न करे और ब्रह्मजिज्ञासा के लिए प्राणों की धारणा करे । ब्रह्मजिज्ञासा दुःखरूप संसार-सागर से मुक्त होने के लिए है । फिर संसारी न हो और आत्म-परायण हो । जब आत्मपरायण होगे, तब सब दुःख मिट जावेंगे । जैसे सूर्य के उदय होने पर अन्धकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही आत्मपद के प्राप्त होने पर सब दुःख नष्ट हो जाते हैं । उस पद के प्राप्त होने का उपाय यह है कि सत्शास्त्रों में जो विशेषण सुने हों उसको समझकर बारम्बार अभ्यास करे; दृश्य से उपरत हो और उनको