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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1298, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1298

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४६१

करते हो ? अपने स्वभाव में स्थित होओ। यह जगत् परस्वभाव है, यह जानकर चाहे जैसी चेष्टा करो, तुमको बन्धन न होगा और पूर्वपद की प्राप्ति होगी। जैसे अग्नि से जले सूखे तृण को पवन उड़ा ले जाता है और नहीं जाना जाता कि कहाँ गया, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि से जलाया और निरहंकारतारूप पवन से उड़ाया हुआ संसाररूपी तृण न जाना जायगा कि कहाँ गया। जैसा चाहे लाख योजन तक चला जाय तो भी यही देख पड़ता है कि आकाश ही सर्व सृष्टि को धारण किये है, वैसे ही सब दृश्य जगत् को आत्मा धारण करता है। संसार का शब्द-अर्थ आत्मा में नहीं। इसको छोड़कर देखो कि सब शब्द-अर्थ का अधिष्ठान आत्मा ही है।

हे राम ! रूप, अवलोक और मनस्कार मिथ्या उदय हुए हैं। इनका त्याग करो। जैसे मरुस्थल में जलाभास मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् मिथ्या भ्रममात्र है। इसके सम्बन्ध से जीव दुखी होता है। जैसे रस्सी में सर्प और सीपी में रूपा मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में जगत् है। तुम आत्मब्रह्म हो, दुःख से रहित अपने स्वभाव में स्थित हो और आत्मदृष्टि से देखो कि सब आत्मा है; अथवा जगत् को मिथ्या जानो तो भी शेष आत्मपद ही रहेगा। जैसे जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति का अभाव होने पर शान्तपद शेष रहता है, वैसे ही जगत् का अभाव निश्चित होने पर आत्मपद शेष प्रतीत होगा। इस जगत् का अत्यन्ता-भाव है, और जो दीखता है, वह भ्रममात्र है। जो एक काल में होता है, वह दूसरे काल में नष्ट हो जाता है। स्वप्न में जाग्रत् का अभाव हो जाता है और जाग्रत् में स्वप्न का अभाव हो जाता है। पर सुषुप्ति में दोनों का अभाव हो जाता है। इससे वे भ्रममात्र हैं। विश्व आत्मा का चमत्कार है। जैसे समुद्र में तरङ्ग होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् है। अहंता से यह उदय होता है और अहं का अभाव होने पर इसका भी अभाव हो जाता है। जिनको अहंता के अभाव का निश्चय हुआ है, वे ही सन्त और उत्तम पुरुष हैं। उन महानुभाव पुरुषों का अभिमान और भोगों की आशा नष्ट