योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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हो जाती है। वे भ्रान्ति रहित और नित्य ही समाधिस्थ होते हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मैकताप्रतिपादनन्नाम शताधिकत्रिषष्टितमसर्गः ॥ १६३ ॥
राम बोले, हे भगवन् ! यह मनरूपी मृग संसाररूपी वन में भटकत है। वह समाधानरूप कौन वृक्ष है, जिसके नीचे आकर शान्त हो उसके फूल, फल और लता कैसे हैं और वह वृक्ष कहाँ होता है। यह कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस प्रकार समाधानरूप वृक्ष उत्पन्न होता है, सो सुनो। सब साधन इसके पत्ते, पुष्प और लता आदि हैं। हे राम ! यह वृक्ष सब जीवों को कल्याण के निमित्त साधन चाहिये। अब तुम इसका क्रम सुनो। आत्मिक बल से तो यह उगता है और सन्तजनों के हृदय में यह उपजता है। चित्तरूपी पृथ्वी में लगता है और वैराग्य इसका बीज है वैराग्य दो प्रकार से प्राप्त होता है—एक तो दुःख और कष्ट प्राप्त होने से वैराग्य उपज आता है। दूसरा शुद्ध निष्काम हृदय होने पर भी वैराग्य उपजता है। उस वैराग्यरूपी बीज को जब चित्तरूपी भूमि में डालते हैं और निर्वासनारूपी हल फेरते हैं। निर्मल, शीतल और हृदयगम्य सन्तों की संगति और सत्शास्त्ररूपी जल जब मनरूपी क्यारी में पड़ता है, तब उस वृक्ष के बढ़ने की आशा होती है। बहुत जल से भी उसकी रक्षा करते हैं। आत्मविचाररूपी सूर्य की किरणों से पुष्ट करते हैं और उसके चहुँफेर धैर्यरूपी बाड़ी करते हैं। तप, दान, तीर्थ, स्नानरूपी चौतरे पर उस बीज को रखकर रखवाली करते हैं कि सूख या जल न जाय। आशारूपी पक्षी से रक्षा करते हैं कि वैराग्यरूपी बीज को वह निकाल न ले जावे। अभिलाषारूपी बूढ़े बैल से रक्षा करते हैं कि खेत में प्रवेश करके वह उसको रौंद न डाले। उसके निमित्त सन्तोष और सन्तोष की स्त्री मुदिता दोनों को पहरे पर बिठा रखते हैं। इस बीज का नाशक कुहिरा, जो मेघ से उपजता है, उससे भी इसकी रक्षा करते हैं, संपदा, धन और सुन्दर स्त्रियों का प्राप्त होना ही वैराग्यरूपी बीज का नाशक ओला है।