योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1304, कुल 1734 में से
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हे राम ! वाञ्छित देश को पथिक तब पहुँचता है, जब एक देश का त्याग करता है । वैसे ही शुद्धस्वरूप परमानन्द अपना रूप आत्मा तब प्राप्त होता है, जब धन, लोक, पुत्र, एषणा आदि का त्याग करे । जब आत्मा की प्राप्ति होती है, तब निर्विकल्प समाधि से शुद्ध चैतन्य का साक्षात्कार होता है, और जब समाधि से उसका साक्षात्कार होता है, तब चेष्टा होने पर भी उसी में स्थित रहता है; परम निर्वाणपद को प्राप्त होता है । चित्तरूपी वेल दूर हो जाती है । जैसे रस्मी में जो बल होता है, उसको खींचकर फिर छोड़ते हैं, तब वह सीधी हो जाती है, वैसे ही जिसको समाधि में चैतन्य का साक्षात्कार होता है, उसको उत्थानकाल में भी वही भासित होता है । पर जिसको उसका प्रमाद है, उसको जगत् भासित होता है । हे राम ! वस्तु एक है, परन्तु उसमें दो दृष्टियाँ हैं । जैसे रस्सी एक है, पर सम्यक्दर्शी को रस्सी दिखती है और असम्यक्दर्शी को सर्प, वैसे ही ज्ञानवान् को आत्मा प्रतीत होता है और अज्ञानी को जगत् दीखता है । जिस पुरुष ने ज्ञान से जगत् को असत्य नहीं जाना, वह मानो चित्र की अग्नि है । उससे कोई कार्य सिद्ध नहीं होता । और जिसको स्वरूप की इच्छा है, जो तृष्णा के नाश का प्रयत्न करता है, जगत् को मिथ्या विचारता है, वह आत्मपद को प्राप्त होगा । उसकी तृष्णा भी निवृत्त हो जायगी । हे राम ! ज्ञानवान् की तृष्णा स्वाभाविक मिट जाती है । जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार मिट जाता है, वैसे ही वस्तु की सत्ता पाकर उसकी तृष्णा नष्ट हो जाती है । वह परमपद में स्थित होता है । हे राम ! जिसको दृश्य में नीरसता है, वह उत्तम पुरुष है । वह मनुष्यशरीर में ही ब्रह्म हो जाता है । उसको मेरा नमस्कार है । वह मेरा गुरु है । हे राम ! जब जीव की बुद्धि विषय से विरक्त होती है, तब कल्याण होता है । वैराग्य से बोध होता है और बोध से वैराग्य होता है, क्योंकि दोनों सम्बन्धित परस्पर सापेक्ष हैं । जब एक आता है, तब दूसरा भी आता है । जब ये आते हैं, तब तीनों एषणाएँ निवृत्त हो जाती हैं । जब तीनों एषणाएँ नष्ट होती हैं, तब अमृत की प्राप्ति होती है ।