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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1305, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1305

❋ निर्वाण प्रकरण ❋ ४६६

हे राम ! सन्तों का संग और सतशास्त्रों का श्रवण करके स्वरूप का अभ्यास करो—इससे आत्मपद की प्राप्ति होती है। ये तीनों परस्पर सहकारी हैं। जैसे आठ पाँववाला कीट प्रथम चरण को रखकर और चरणों को रखता है, तब सुख से चला जाता है, वैसे ही सन्तों के संग और सतशास्त्रों के सुनने से जो आत्मपद का अभ्यास करता है, वह शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होता है। उसे जगत् का अभाव हो जाता है। हे राम ! जगत् के भाव और अभाव को ज्ञानी जानता है। जैसे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को तुरीयावस्थावाला जानता है, वैसे ही जगत् के भाव-अभाव को ज्ञानी जानता है। जैसे अग्नि में सूखा तृण डालो तो देख नहीं पड़ता, वैसे ही ज्ञानवान् को जगत् नहीं दीखता। हे राम ! ज्ञानवान् को सर्वदा समाधि है, कभी अहं का उत्थान नहीं होता। जब तक उस पद को प्राप्त न हो, तब तक साधना में लगा रहे और जब उस पद को प्राप्त हो, तब फिर कोई यत्न करना बाकी नहीं रहता। हे राम ! इस चित्त के दो प्रवाह हैं—एक तो जगत् की ओर जाता है और दूसरा स्वरूप की ओर। जो जगत् की ओर जाता है, वह औपाधिक है, और जो स्वरूप की ओर जाता है, वह उपाधि को दूर करनेवाला है। जैसे एक लकड़ी गीली और एक सूखी होती है। जो गीली है उसमें उपाधि जल है, वह फैल जाता है। और जब जल नष्ट हो जाता है, तब वह शुद्ध होती है, फिर प्रफुल्लित नहीं होती। वैसे ही संसार की सत्यता से चित्त बढ़ता है, और जब संसार की वासना नष्ट होती है तब शुद्धपद पाता है। हे राम ! वाद भी दो प्रकार के हैं। जो वाद किसी को दुःख दे, उसे मूर्ख कहते हैं। और जो परस्पर मित्रभाव से तत्त्व का निरूपण करे, वह वाद ज्ञानवान् करते हैं। जो जैसा वाद करते हैं, उन्हें उनका दृढ़ अभ्यास होता है और वैसा ही रूप उनका हो जाता है। जो झगड़ा करते हैं उनका वही रूप हो जाता है और जो मित्रता से स्वरूप का वाद करते हैं, उनका वही रूप होता है—उस पद को पाकर परम शान्ति होती है।

इति० नि० मनमृगोपाख्यानयांगोनामशताधिकपञ्चषष्टितमसर्गः॥ १६५॥

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पूर्वार्द्ध समाप्तम् ।