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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1386, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1386

५८० ❇ योगवाशिष्ठ ❇

के स्थान जल जलकर गिरने लगे । पर्वत जलकर श्याम हो गये । ज्वाला के कण निकलकर पाताल को गये । वह भी जल गया । समुद्र जलकर सूख गये और हिमालय पर्वत के बर्फ का जल होकर जलने लगा—जैसे दुर्जनों से संगकर साधु का हृदय तप्त होता है । जब इसी प्रकार बड़ी अग्नि प्रज्वलित हुई, तब मुझको भी तपन आने लगी और मैं वहाँ से दौड़कर नीचे जाकर स्थित हुआ । वहाँ मैंने देखा कि अस्ता-चल पर्वत जलता हुआ उदयाचल पर्वत के पास आ पड़ा । मन्दराचल और सुमेरु पर्वत चलकर गिरने लगे और अग्नि की ज्वाला ऊँचे उठकर भड़भड़ शब्द करने लगी ।

हे राम ! इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व जलने लगा । बड़ा क्षोभ हुआ और जहाँ कुछ रस था सो सब सूख गया । हे राम ! जिसको अज्ञानी रस कहते हैं, वह सब विरस है । परन्तु अपने-अपने काल में सब रस-संयुक्त दिखते हैं । उस समय में मुझको सब ऐसे लगे, जैसे जली हुई बेल होती है । हे राम ! इस प्रकार मैंने सब विश्व जलता देखा, परन्तु ज्ञान में जिसका अज्ञान नष्ट हुआ था, वह सुखी दिखता था और सब अग्नि में जलते देख पड़ते थे और बड़े भयानक शब्द होते थे । शिव का जो कैलास पर्वत है, उसके निकट जब अग्नि आई, तब सदाशिव ने अपने नेत्र से अग्नि प्रकट की, जिसमे बड़ा क्षोभ हुआ और ब्रह्माण्ड जलने लगा । तब महापवन चला जिसमे बड़े पर्वत उड़ने लगे--जैसे तृण उड़ते हैं । जो स्थान जले थे, उनकी आँधी होकर यक्षों के स्थान भी उड़ने लगे । निदान बड़ा क्षोभ प्रकट हुआ और इन्द्रियादिक देवता अपने स्थान को त्यागकर ब्रह्मलोक में चले गये । बड़े मेघ, जो जल में पूर्ण थे, सूखकर जलने लगे । कल्परूपी पुतली नृत्य करने लगी । जले स्थानों में जो धुआँ निकलता था, वह उसके केश थे और प्रलय का शब्द उसका बोलना था । बड़ा पवन चलने लगा, पर्वत जलकर उड़ने लगे और सुमेरु आदिक पर्वत तृणों की नाईं उड़ते थे । निदान जीवों को बड़ा कष्ट हुआ, जो कहा नहीं जाता ।

इति० नि० जगद्ब्रह्मप्रलयवर्णनन्नामशताधिकद्विनवतितमस्सर्गः ॥ १६२ ॥