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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1385, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1385

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५७६

जो जगत् है तो विराट् भी है, और जगत् नहीं तो विराट् भी नहीं । जगत्, ब्रह्म और विराट् तीनों पर्याय हैं । इससे सम्पूर्ण जगत् विराट् का शरीर है । निराकार क्या और आकार क्या—सब भीतर बाहर विराट् का शरीर है । जैसे भीतर-बाहर आकाश में भेद नहीं, वैसे ही विराट् आत्मा में भेद नहीं । जैसे पवन के चलने और ठहरने में भेद नहीं वैसे ही विराट् और आत्मा में भेद नहीं है । जैसे चलना और ठहरना दोनों पवन के रूप हैं, वैसे ही साकार-निराकार सब विराट् का शरीर है । हे राम ! इस प्रकार जगत् हुआ है, सो कुछ उपजा नहीं, संकल्प से उपजे की नाईं भानित होता है । जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं है, और हुए की नाईं लगता है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता में जगत् उपजे की नाईं जान पड़ता है । पर उपजा कुछ नहीं—केवल अपने आपमें स्थित है । वह शिला की नाईं स्थित है, अर्थात तुम्हारा संकल्प-विकल्प और चैतन्यरूप चैत्य से रहित चिन्मात्रस्वरूप है—इससे कलना को त्याग-कर अपने स्वभाव में स्थित होओ ।

इति श्री० नि० विराटशरीरवर्णनन्नामशताधिकैकनवतितमसर्गः ॥ १६१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम प्रलय का प्रसंग फिर सुनो । मैं ब्रह्म-पुरी में ब्रह्मा के पास बैठा था । जब मैंने नेत्र खोलकर देखा कि मध्याह्न का समय है और दूसरा सूर्य पश्चिम दिशा में उदय हुआ है, उसका बड़ा प्रकाश है—मानो सम्पूर्ण तेज इकट्ठा हुआ है या बड़वाग्नि की नाईं प्रकाश हुआ है और बिजली की नाईं स्थित हुआ है उसको देखकर मैं विस्मित हुआ । देख ही रहा था कि एक ओर सूर्य उदय हुआ । फिर उत्तर दिशा की ओर और सूर्य उदय हुआ । इसी प्रकार प्रथम के अलावा दस सूर्य आकाश में और प्रकट हुए । बड़वाग्नि समुद्र से प्रकट हुई । उससे एक सूर्य निकला । सब द्वादश सूर्य इकट्ठे होकर विश्व को तपाने लगे । हे राम ! प्रलय के तीन नेत्र उदय हुए—एक नेत्र सूर्य, दूसरा नेत्र बड़वाग्नि और तीसरा नेत्र बिजली । वे तीनों विश्व को जलाने लगे । दिशा सब लाल हो गईं । अटटअटट शब्द होने लगे । नगर, वन, कन्दरा, पृथ्वी जलने लगीं । देवताओं