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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1384, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1384

५७८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

वशिष्टजी बोले, हे राम ! आदि विराट् ब्रह्मा है । उसका आदि-अन्त नहीं । यह जगत् उसका छोटा शरीर है । उसी चैतन्य वपु का किञ्चन ब्रह्मरूप हुआ है । उसके विस्तार का क्रम सुनो-उस ब्रह्मा ने जिसका वपु संकल्पमात्र है, अपने संकल्प से एक अण्ड रचा और उसको तोड़-फोड़ डाला । ऊर्ध्वभाग ऊपर गया और नीचे का भाग नीचे गया । पाताल ब्रह्मा का चरण हुआ । ऊर्ध्व सिर हुआ । मध्य आकाश उदर हुआ । दसो दिशा वक्षःस्थल, हाथ सुमेरु आदिक पर्वत, मांस पृथ्वी, समुद्र और सब नदियाँ नाड़ी, जल रुधिर, प्राण अपान वायु पवन, हिमालय पर्वत कफ, सब तेज पित्त, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र, तारागण स्थूल लार है । लार प्राण के बल से निकलती है-जैसे ताराचक्र को पवन फेरता है । ऊर्ध्व-लोक उसकी शिखा है । मनुष्य, पशु और पक्षी रोम हैं । सब भूतों की चेष्टा उसका व्यवहार है । पर्वत उसकी अस्थि, ब्रह्मलोक उनका मुख और सब जगत् उस विराट् का वपु है । रामजी बोले, हे भगवन् ! यह जो आपने संकल्परूप ब्रह्मा और जगत् उनका वपु कहा, इसे मैं मानता हूँ; परन्तु यह जगत् जो उसी का शरीर हुआ; फिर ब्रह्मलोक में ब्रह्मा कैसे बैठता है और अपने शरीर से भिन्न होकर कैसे स्थित होता है ? वशिष्टजी बोले, हे राम ! इसमें क्या आश्चर्य है ? जो तुम ध्यान लगाकर बैठो और अपनी मूर्ति अपने हृदय में रच कर स्थित हो तो बन जाय । जैसे मनुष्य को स्वप्न आता है और उसमें जगत् भासित होता है सो सब अपना स्वरूप है । परन्तु अपनी मूर्ति त्यागकर और को देखता है । वैसे ही ब्रह्मा का एक शरीर ब्रह्मलोक में भी होता है । ब्रह्मा और जीव में इतना भेद है कि जीव भी अपनी स्वप्नसृष्टि का विराट् है, परन्तु उसको प्रमाद से नहीं भासित होती और ब्रह्मा सदा आत्मदर्शी है उसको सब जगत् अपना शरीर भासित होता है ।

हे राम ! देवता, सिद्ध, ऋषीश्वर और विद्याधर उस विराट् पुरुष की ग्रीवा में स्थित हैं । भूत, प्रेत, पिशाच सब उस विराट् पुरुष के मल से उपजे हैं और कीट की नाईं उदर में स्थित हैं । सब स्थावर-जङ्गम जगत् संकल्प से रचा हुआ विराट् में स्थित है-सब उसी के अङ्ग हैं ।