योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
५७८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
वशिष्टजी बोले, हे राम ! आदि विराट् ब्रह्मा है । उसका आदि-अन्त नहीं । यह जगत् उसका छोटा शरीर है । उसी चैतन्य वपु का किञ्चन ब्रह्मरूप हुआ है । उसके विस्तार का क्रम सुनो-उस ब्रह्मा ने जिसका वपु संकल्पमात्र है, अपने संकल्प से एक अण्ड रचा और उसको तोड़-फोड़ डाला । ऊर्ध्वभाग ऊपर गया और नीचे का भाग नीचे गया । पाताल ब्रह्मा का चरण हुआ । ऊर्ध्व सिर हुआ । मध्य आकाश उदर हुआ । दसो दिशा वक्षःस्थल, हाथ सुमेरु आदिक पर्वत, मांस पृथ्वी, समुद्र और सब नदियाँ नाड़ी, जल रुधिर, प्राण अपान वायु पवन, हिमालय पर्वत कफ, सब तेज पित्त, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र, तारागण स्थूल लार है । लार प्राण के बल से निकलती है-जैसे ताराचक्र को पवन फेरता है । ऊर्ध्व-लोक उसकी शिखा है । मनुष्य, पशु और पक्षी रोम हैं । सब भूतों की चेष्टा उसका व्यवहार है । पर्वत उसकी अस्थि, ब्रह्मलोक उनका मुख और सब जगत् उस विराट् का वपु है । रामजी बोले, हे भगवन् ! यह जो आपने संकल्परूप ब्रह्मा और जगत् उनका वपु कहा, इसे मैं मानता हूँ; परन्तु यह जगत् जो उसी का शरीर हुआ; फिर ब्रह्मलोक में ब्रह्मा कैसे बैठता है और अपने शरीर से भिन्न होकर कैसे स्थित होता है ? वशिष्टजी बोले, हे राम ! इसमें क्या आश्चर्य है ? जो तुम ध्यान लगाकर बैठो और अपनी मूर्ति अपने हृदय में रच कर स्थित हो तो बन जाय । जैसे मनुष्य को स्वप्न आता है और उसमें जगत् भासित होता है सो सब अपना स्वरूप है । परन्तु अपनी मूर्ति त्यागकर और को देखता है । वैसे ही ब्रह्मा का एक शरीर ब्रह्मलोक में भी होता है । ब्रह्मा और जीव में इतना भेद है कि जीव भी अपनी स्वप्नसृष्टि का विराट् है, परन्तु उसको प्रमाद से नहीं भासित होती और ब्रह्मा सदा आत्मदर्शी है उसको सब जगत् अपना शरीर भासित होता है ।
हे राम ! देवता, सिद्ध, ऋषीश्वर और विद्याधर उस विराट् पुरुष की ग्रीवा में स्थित हैं । भूत, प्रेत, पिशाच सब उस विराट् पुरुष के मल से उपजे हैं और कीट की नाईं उदर में स्थित हैं । सब स्थावर-जङ्गम जगत् संकल्प से रचा हुआ विराट् में स्थित है-सब उसी के अङ्ग हैं ।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५७६
जो जगत् है तो विराट् भी है, और जगत् नहीं तो विराट् भी नहीं । जगत्, ब्रह्म और विराट् तीनों पर्याय हैं । इससे सम्पूर्ण जगत् विराट् का शरीर है । निराकार क्या और आकार क्या—सब भीतर बाहर विराट् का शरीर है । जैसे भीतर-बाहर आकाश में भेद नहीं, वैसे ही विराट् आत्मा में भेद नहीं । जैसे पवन के चलने और ठहरने में भेद नहीं वैसे ही विराट् और आत्मा में भेद नहीं है । जैसे चलना और ठहरना दोनों पवन के रूप हैं, वैसे ही साकार-निराकार सब विराट् का शरीर है । हे राम ! इस प्रकार जगत् हुआ है, सो कुछ उपजा नहीं, संकल्प से उपजे की नाईं भानित होता है । जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं है, और हुए की नाईं लगता है, वैसे ही ब्रह्मसत्ता में जगत् उपजे की नाईं जान पड़ता है । पर उपजा कुछ नहीं—केवल अपने आपमें स्थित है । वह शिला की नाईं स्थित है, अर्थात तुम्हारा संकल्प-विकल्प और चैतन्यरूप चैत्य से रहित चिन्मात्रस्वरूप है—इससे कलना को त्याग-कर अपने स्वभाव में स्थित होओ ।
इति श्री० नि० विराटशरीरवर्णनन्नामशताधिकैकनवतितमसर्गः ॥ १६१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! प्रथम प्रलय का प्रसंग फिर सुनो । मैं ब्रह्म-पुरी में ब्रह्मा के पास बैठा था । जब मैंने नेत्र खोलकर देखा कि मध्याह्न का समय है और दूसरा सूर्य पश्चिम दिशा में उदय हुआ है, उसका बड़ा प्रकाश है—मानो सम्पूर्ण तेज इकट्ठा हुआ है या बड़वाग्नि की नाईं प्रकाश हुआ है और बिजली की नाईं स्थित हुआ है उसको देखकर मैं विस्मित हुआ । देख ही रहा था कि एक ओर सूर्य उदय हुआ । फिर उत्तर दिशा की ओर और सूर्य उदय हुआ । इसी प्रकार प्रथम के अलावा दस सूर्य आकाश में और प्रकट हुए । बड़वाग्नि समुद्र से प्रकट हुई । उससे एक सूर्य निकला । सब द्वादश सूर्य इकट्ठे होकर विश्व को तपाने लगे । हे राम ! प्रलय के तीन नेत्र उदय हुए—एक नेत्र सूर्य, दूसरा नेत्र बड़वाग्नि और तीसरा नेत्र बिजली । वे तीनों विश्व को जलाने लगे । दिशा सब लाल हो गईं । अटटअटट शब्द होने लगे । नगर, वन, कन्दरा, पृथ्वी जलने लगीं । देवताओं
५८० ❇ योगवाशिष्ठ ❇
के स्थान जल जलकर गिरने लगे । पर्वत जलकर श्याम हो गये । ज्वाला के कण निकलकर पाताल को गये । वह भी जल गया । समुद्र जलकर सूख गये और हिमालय पर्वत के बर्फ का जल होकर जलने लगा—जैसे दुर्जनों से संगकर साधु का हृदय तप्त होता है । जब इसी प्रकार बड़ी अग्नि प्रज्वलित हुई, तब मुझको भी तपन आने लगी और मैं वहाँ से दौड़कर नीचे जाकर स्थित हुआ । वहाँ मैंने देखा कि अस्ता-चल पर्वत जलता हुआ उदयाचल पर्वत के पास आ पड़ा । मन्दराचल और सुमेरु पर्वत चलकर गिरने लगे और अग्नि की ज्वाला ऊँचे उठकर भड़भड़ शब्द करने लगी ।
हे राम ! इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व जलने लगा । बड़ा क्षोभ हुआ और जहाँ कुछ रस था सो सब सूख गया । हे राम ! जिसको अज्ञानी रस कहते हैं, वह सब विरस है । परन्तु अपने-अपने काल में सब रस-संयुक्त दिखते हैं । उस समय में मुझको सब ऐसे लगे, जैसे जली हुई बेल होती है । हे राम ! इस प्रकार मैंने सब विश्व जलता देखा, परन्तु ज्ञान में जिसका अज्ञान नष्ट हुआ था, वह सुखी दिखता था और सब अग्नि में जलते देख पड़ते थे और बड़े भयानक शब्द होते थे । शिव का जो कैलास पर्वत है, उसके निकट जब अग्नि आई, तब सदाशिव ने अपने नेत्र से अग्नि प्रकट की, जिसमे बड़ा क्षोभ हुआ और ब्रह्माण्ड जलने लगा । तब महापवन चला जिसमे बड़े पर्वत उड़ने लगे--जैसे तृण उड़ते हैं । जो स्थान जले थे, उनकी आँधी होकर यक्षों के स्थान भी उड़ने लगे । निदान बड़ा क्षोभ प्रकट हुआ और इन्द्रियादिक देवता अपने स्थान को त्यागकर ब्रह्मलोक में चले गये । बड़े मेघ, जो जल में पूर्ण थे, सूखकर जलने लगे । कल्परूपी पुतली नृत्य करने लगी । जले स्थानों में जो धुआँ निकलता था, वह उसके केश थे और प्रलय का शब्द उसका बोलना था । बड़ा पवन चलने लगा, पर्वत जलकर उड़ने लगे और सुमेरु आदिक पर्वत तृणों की नाईं उड़ते थे । निदान जीवों को बड़ा कष्ट हुआ, जो कहा नहीं जाता ।
इति० नि० जगद्ब्रह्मप्रलयवर्णनन्नामशताधिकद्विनवतितमस्सर्गः ॥ १६२ ॥
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५८१
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब अग्नि से सब स्थान जल गये, तब उसके उपरान्त पुष्कल मेघ गर्जकर वर्षने लगे। प्रथम मूसल सी, फिर खंभा सी धारा वर्षी। फिर नदी की नाईं और फिर महानद की नाईं मेघ बरसने लगे, जिनका गङ्गा यमुना नदी लहरें थीं। उनमें सब स्थान शीतल हो गये—जैसे तीनों तापों मे जला हुआ अज्ञानी सन्तों के संग मे शीतल होता है। हे राम ! फिर ऐसा जल चढ़ा, जिससे सुमेरु आदि पर्वत नृत्य करने लगे। जैसे समुद्र में झाग होते हैं, वैसे ही हो गये, अथवा ऐसे जान पड़ते थे, जैसे जलचर होते हैं। हे राम ! ऐसा जल चढ़ा कि कहा नहीं जाता। बड़े-बड़े स्थान और देवता, सिद्ध, गन्धर्व बहे जाते थे। जिनको अज्ञानी परमार्थ जानकर सेवन करते हैं, वे भी बहते देख पड़े। जैसे कोई पुरुष कण्टक के अन्धे कूप में गिरके दुःख पावे, वैसे ही वे दीखे, पर मुझको सब ब्रह्म ही देख पड़ता था। पर जब संकल्प की ओर देखता, तब महाप्रलय दीखता और मेघ गर्जते घटा होकर दिखाई देते थे। निदान ब्रह्मलोक तक जल चढ़ गया और मैं देखकर आश्चर्य को प्राप्त हुआ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजलमयवर्णनं नाम शनाधिकत्रिनवतितमस्सर्गः ॥ १६३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! उस ब्रह्मा का जगत् जलमय हो गया और मुझे जल से भिन्न कुछ न देख पड़ा, सब शून्य ही देख पड़ा। ऊपर, नीचे और मध्य दिशा भी न दिखती थी। न कोई तत्त्व, न कोई पर्वत, न कोई देवता, न पशु और न पक्षी देख पड़ते थे। तब मैंने ब्रह्मपुरी को देखा कि इसकी क्या दशा है। फिर जैसे प्रातःकाल का सूर्य अपनी ज्योति को फैलाता है, वैसे ही मैंने ब्रह्मपुरी को दृष्टि फैलाकर देखा। तब ब्रह्माजी मुझको परम समाधि में देख पड़े, और भी जो जीवन्मुक्त ब्रह्मा के सभासद थे, वे भी सब पद्मासन से परमसमाधि लगाये बैठे थे। जैसे पत्थर की मूर्ति हो, वैसे ही सब परमसमाधि में अचल स्थित थे। उनमें संवेदन का फुरना नहीं था। चारों वेद मूर्ति धारण किये और बृहस्पति, वरुण, कुबेर, इन्द्र, यम, चन्द्रमा, अग्नि, देवता इत्यादि ऋषीश्वर मुनीश्वर
५८२ ❈ योगवाशिष्ठ ❈
आदि सब जीवन्मुक्तों को मैंने ध्यान में स्थित देखा। द्वादश सूर्य भी जो विश्व को तपाते थे, वे पद्मासन लगाकर समाधि में स्थित थे। एक मुहूर्त तक मैंने इसी प्रकार देखा। जब एक मुहूर्त बीता, तब सूर्य के सिवा सब अन्तर्धान हो गये। जैसे स्वप्न की सृष्टि अपने में विद्यमान होती है और जागने से उसकी अभावना हो जाती है, वैसे ही मेरे देखते-देखते ब्रह्मपुरी शून्य वन की नाईं उजाड़ हो गई। जैसे राजपतन में मार्गप्रलय हो जाते हैं, वैसे प्रलय हो गया।
हे राम! जैसे स्वप्न में मेघ गरजते दिखते हैं, और यह दृष्टान्त तो बालक भी जानते हैं कि प्रत्यक्ष अनुभव को छिपाते हैं, वे मूर्ख हैं। मैं अनुभव से भी जानता हूँ, स्मृति भी होती है और सुना भी है कि जब तक निद्रा है, तब तक स्वप्न की सृष्टि दिखती है और जागने पर उसका अभाव होता है, वैसे ही जब तक ब्रह्मा की वासना थी, तब तक सृष्टि थी, जब वासना क्षय हुई, तब सृष्टि कहाँ रही? जब वासना नष्ट होती है, तब आन्तवाहक आधिभौतिक शरीर नहीं रहते। हे राम! जब शुद्धमात्र पद में चित्तशक्ति स्फुरती है, तब पिण्डाकार होकर भासित होती है। और जबतक वह शरीर है, तबतक संसार उपजता है और नष्ट भी होता है। वैसे ही ब्रह्मा की सुषुप्ति में जगत् लीन हो जाता है और जाग्रत में उत्पन्न होता है; क्योंकि ब्रह्मा के शरीर का सुषुप्ति में लीन होना ही प्रलय है। यदि कहिये कि इस शरीर के नाश का नाम महाप्रलय हो तो ऐसे नहीं है; क्योंकि मृतक हुए शरीर का नाश होता है और फिर लोक भासित होता है। और जो कहिये कि जैसे वह परलोक भ्रममात्र है, वैसे ही यह भी भ्रान्तिमात्र है, इसी का नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुति, स्मृति और पुराण सब कहते हैं कि महाप्रलय में कुछ नहीं रहता, केवल आत्मसत्ता ही रहती है। और जो कहिये कि परलोक भ्रान्तिमात्र है, इसका नाश होना क्या है तो श्रुति और शास्त्र का कहना व्यर्थ होता है और जो उनका कहना व्यर्थ हो तो उनके कहने से ब्रह्माकार वृत्ति किसी की उत्पन्न न हो। जो तुम कहो कि जैसे अङ्गवाला अङ्ग को सिकोड़ लेता है, वैसे ही स्थूल भूत
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५८३
सिमट कर अपने सूक्ष्मकारण में जाकर लीन होते हैं, इसी का नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सूक्ष्मभूत के रहने महाप्रलय नहीं होता। और जो तुम कहो कि संवेदन जो अज्ञान है, जिसमें अहं फुरता है, उसका नाम महाप्रलय है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि मूर्च्छा में जीव को अज्ञान होता है, परंतु फिर सृष्टि भासित होती है और मृत्यु होती है। सो मृत्यु वही मूर्च्छा है। पर उसमें भी फिर पाञ्च-भौतिक शरीर भासित होता है और आगे जगत् भासित होता है। इससे इसका नाम भी महाप्रलय नहीं। जो तुम कहो कि जबतक यह पाञ्च-भौतिक शरीर है, तबतक जगत् है और इसका अभाव होने पर महाप्रलय होता है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जब शरीर को जीव छोड़ता है और उसकी क्रिया नहीं होती तो वह पिशाच होता है।
इस शरीर का जब नीरूप होना है और मनुष्य शव हो जाता है, तब क्षत्रिय-ब्राह्मण की संज्ञा नहीं रहती। इससे तुम देखो कि केवल देह का नाश भी महाप्रलय नहीं है और प्रमाद से विपर्यय का नाम भी महाप्रलय नहीं है। महाप्रलय उसको कहते हैं, जिसमें सबका अभाव हो जाय। और सबका अभाव तब होता है, जब वासना का क्षय हो जाता है। इसलिए वासना के क्षय को ज्ञानी लोग निर्वाण कहते हैं। जैसे जबतक निद्रा है, तब तक स्वप्न का जगत् दिखता है और जाग्रत् में स्वप्न के जगत् का अभाव हो जाता है, वैसे ही जबतक वासना है, तबतक जगत् है, जब वासना का क्षय होता है, तब जगत् का अभाव होता है। हे राम! वासना भी फुरती नहीं, आभासमात्र है। जो तुम कहो कि आमता क्यों है? तो जो कुछ भासित होता है, वह सदा अपने भाव में आप स्थित है। हे राम! उत्थान होने का नाम बन्धन है और उत्थान के मिटने का नाम मोक्ष है। हे राम! नेत्र के खोलने और मूँदने में भी कुछ यत्न है, पर मुक्त होने में कुछ यत्न नहीं। जो वृत्ति बहिर्मुख हुई तो बन्धन हुआ और वृत्ति अन्तर्मुख हुई तो मुक्त हुआ। इसमें क्या यत्न है। इसलिए सुषुप्त की नाईं निर्वासनिक हो जाओ। जब अहंसंवेदन फुरता है, तब मिथ्या जगत् सत्य सा भासित होता है। आगे तुम्हारी जो
५८४ * योगवाशिष्ठ *
इच्छा हो सो करेंगे। पर जब अहं उत्थान में रहित होंगे, तब निर्वाण- पद को प्राप्त होंगे। जहाँ एक और दो की कोई कल्पना नहीं, उस परमशान्त निर्विकल्प पद को प्राप्त होंगे। इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकचतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः॥१६४॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! निदान वे ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये— जैसे तेल बिना दीपक बुझ जाता है। ब्रह्माजी जब ब्रह्मपद में निर्वाण हुए और द्वादश सूर्य फिर ब्रह्मपुरी को जलाने लगे और सम्पूर्ण ब्रह्म- पुरी जल गई, तब वे सूर्य भी ब्रह्मा की नाईं पद्मासन लगाकर स्थित हुए। जैसे तेल बिना दीपक का निर्वाण होता है, वैसे ही वे सूर्य भी निर्वाण को प्राप्त हो गये। हे राम! जब द्वादश सूर्य निर्वाण हो गये, तब समुद्र उमड़े और उन्होंने ब्रह्मपुरी को ढक लिया। जैसे रात्रि में अन्धकार नगर को ढक लेता है, वैसे ही ब्रह्मपुरी को उन्होंने आच्छा- दित किया। बड़े तरङ्ग उछले और पुष्करमेघ भी तरङ्गों से छेदे गये और जलरूप हो गये। हे राम! तब एक पुरुष आकाश में निकला मुझको देख पड़ा, जो महाभयानक श्यामवर्ण उग्र आकार था। उमने सबको ढक लिया। वह कृष्णमूर्ति ऐसा था, मानों कल्पपर्यन्त की रात इकट्ठी होकर उमके रूप में स्थित हुई हो। उमके मुख में ज्वाला निक- लती थी। उमके शरीर में बड़ा प्रकाश या मानों कोटि सूर्य हों, या बिजली का प्रकाश इकट्ठा हुआ हो। उमके पाँच मुख थे, दस भुजाएँ थीं और तीन नेत्र थे—मानों तीनों सूर्य चमक रहे थे। उमके हाथ में त्रिशूल था और आकाश की नाईं उमकी मूर्ति थी।
जैसे क्षीरसमुद्र के मथने को भुजा बड़ी करके विष्णु ने शरीर धारण किया था और क्षीरसमुद्र को क्षुब्ध किया था, वैसे ही नासिका की साँस से वह समुद्र को क्षुब्ध कर रहा था। जैसे आकाश का बड़ा आकार है, वैसा ही स्वरूप उमने धारण किया—मानों प्रलयकाल के समुद्र मूर्ति धर के स्थित हुए हों, अथवा मानों सब अहंकार की समष्टि वह था, अथवा महाप्रलय की बड़वाग्नि की मूर्ति स्थित था, या प्रलयकाल के मेघ मूर्ति धरके स्थित हुए थे। हे राम! मैंने जाना
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५८५
कि यह महारुद्र है, क्योंकि इनके हाथ में त्रिशूल है, तीन नेत्र और पाँच मुख हैं । यह जानकर मैंने उन्हें प्रणाम किया । राम ने पूछा, हे भगवन् ! उनका भयानक रूप क्या था और रुद्र किसको कहते हैं ? उनका बड़ा आकार, दस भुजा, पञ्च मुख और तीन नेत्र क्या थे और हाथ में त्रिशूल क्या था ? क्या वह किसी के भेजे आये थे ? उन्होंने क्या किया और कहाँ गये ? वह अकेले थे अथवा उनके साथ कोई और था ? वह श्याम-वर्ण क्यों थे ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! विषम विष परिच्छिन्न जो अहंकार है, वह त्यागने योग्य है, और समष्टि अहंकार सेवन करने के योग्य है । सब आत्मा प्रतीति का नाम समष्टि अहंकार है । उसी का नाम रुद्र है । कृष्णवर्ण इसलिए था कि वह आकाशरूप है । जैसे आकाश में नीलापन है, वैसे ही उसमें कृष्णता थी सब जीव जो अपने अहंकार को त्यागकर निर्वाण हुए, उनकी समष्टि होकर रुद्ररूप प्रकट हुई, इसी से वह उग्र था । पञ्चमुख ज्ञान इन्द्रियों की समष्टि थी और दस भुजा कर्म इन्द्रियों की समष्टि थी । राजस, तामस और सात्त्विक तीन गुण तीनों नेत्र थे अथवा भूत, भविष्यत् वर्तमान, या ऋग्, यजुः, साम ये तीनों वेद नेत्र थे । अथवा मन, बुद्धि और चित्त तीनों नेत्र थे । ॐकार की तीन मात्रा उसके नेत्र और आकाश वपु था । त्रिलोकी-रूपी हाथ में त्रिशूल था । चितसंवित् से वह फुरा था, इसमें उसी का भेजा आया था और फिर उसी में लीन होगा । वह केवल आकाश-रूप था । जो कुछ उसने किया, वह भी सुनो । हे राम ! ऐसा वह रुद्र था मानों आकाश को पंख लगे हों । उसने अपने नेत्र प्राणों को खींचा तो सब जल उसके मुख में प्रवेश करने लगे । जैसे नदी समुद्र में प्रवेश करती है, वैसे ही सब जल रुद्र में लीन हुए । जैसे बड़वाग्नि समुद्र को पी लेती है, वैसे ही उस रुद्र ने एक मुहूर्त में सब जल पान कर लिया । कहीं जल का अंश भी न देखने को रह गया । जैसे अन्धकार को सूर्य सोख लेता है या जैसे अज्ञानी का अज्ञान सन्त के संग से नष्ट हो जाता है, वैसे ही उसने जल को पान कर लिया । तब केवल शुद्ध आकाश हो गया । न कहीं पृथ्वी दिखती; न अग्नि, न वायु, कोई तत्त्व
५८६ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
कहीं न दिखता---एक आकाश ही दिखता जैसा उज्ज्वल मोती होता है वैसा ही उज्ज्वल आकाश दिखता था, और चारों तत्त्व न दिखता था। एक तो अधोभाग दिखता; दूसरे मध्य भाग आकाश, सो रुद्र ही दिखता; तीसरे ऊर्ध्वभाग देख पड़ता और चौथे चिदाकाश देख पड़ता जो सर्वात्मा है। और कुछ न देख पड़ता। हे राम! वह रुद्र भी आकाश-रूप था और उसका कोई आकार न था। केवल भ्रान्ति से आकार भासित होता था। जैसे भ्रम से आकाश में नीलापन और तरुवर और स्वप्न में भ्रम से आकार भासते हैं, वैसे ही रुद्र का आकार देख पड़ा; पर आत्मा आकाश से भिन्न न था। जैसे भ्रम से चिदाकाश में शूनाकाश भासता है, वैसे ही रुद्र का शरीर भासित हुआ। वह रुद्र सर्वात्मा था और आकाश होकर जो भासित हुआ, वह किञ्चन था। हे राम! आकाश में रुद्र निराधार दिखता था। जैसे मेघ निराधार होते हैं, वैसे ही वह निराधार दिखता था। श्रीराम ने पूछा, हे भगवन्! इस ब्रह्माण्ड के ऊपर और उसके ऊपर क्या है, सो कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह जो ब्रह्माण्ड का आकाश है, उस पर दस गुना जल है। जल के ऊपर दस गुना अग्नि है। उसके ऊपर दसगुना वायु है। उसके ऊपर दसगुना आकाश है।
राम ने पूछा, हे भगवन्! ये तत्त्व जो तुमने वर्णन किये, सो किसके ऊपर हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! ये तत्त्व पृथ्वी के ऊपर स्थित हैं। जैसे माता की गोद में बालक आ बैठता है, वैसे ही ये तत्त्व पृथ्वी पर हैं और पृथ्वी भागों के आश्रय में है। राम ने पूछा, हे भगवन्! पृथ्वी आदि तत्त्वों सहित निराधार ब्रह्माण्ड किसके आश्रय से स्थित हुआ है। उनका चलना और ठहरना कैसे होता है और वे नष्ट कैसे होते हैं? वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुम्हीं कहो कि आकाश में मेघ किसके आश्रय होते हैं? सूर्य और चन्द्रमा किसके आश्रय होते हैं? जैसे ये संकल्प के आश्रित हैं, वैसे ही ब्रह्माण्ड भी संकल्प के आश्रित है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प ही के आश्रित है और संकल्प आत्मा के आश्रित है, वैसे ही यह जगत् और तत्त्व भी आत्मसत्ता के
❇ निर्वाण प्रकरण ❇
५८७
आश्रित स्थित है। इनका ठहरना और गिरना भी आत्मा के आश्रित है। जैसे आदि चित्त का स्पन्दन होकर नीति हुई है, वैसे ही है। इस प्रकार इसका गिरना है, इस प्रकार ठहरना है, इस प्रकार इसका नाश होना और इस प्रकार रहना है। वास्तव में परम स्वरूप से भिन्न कुछ नहीं—केवल भ्रममात्र है। जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है और चित्संवित् ही जगत् के आकार से भासित होता है। जैसे आकाश में नीलिमा प्रतीत होती है, वैसे ही आत्मा में जगत् की प्रतीत है और जैसे तलवार में श्यामता झलकती है, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है। जैसे नेत्रदोष से आकाश में मोती दिखते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् दिखता है और मिथ्या जगतों की संख्या कीजिये तो नहीं गिने जा सकते। जैसे सूर्य की किरणों का आभास और रेत के कणों की संख्या नहीं होती, वैसे ही जगतों की संख्या नहीं होती। पर वास्तव में कुछ बना नहीं—सब अजातजात है। जैसे स्वप्न में अनहोती सृष्टि भासती है, वैसे ही यह जगत् भासता है, इससे दृश्य को मिथ्या जानकर जगत् की वासना त्यागो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादनं नाम शताधिकपञ्चनवत्तितमस्सर्गः ॥ १६५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! उस रुद्र का तो मैंने बड़ा भयानक रूप देखा था। उसके नेत्र बड़े तेज से पूर्ण थे—चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि ये तीनों उसके नेत्र थे और वह महाभयानक था—मानों प्रलय के समुद्र साक्षात् स्थित हैं। रुग्डों की माला उसके कण्ठ में थी और उसकी परछाहीं बड़ी और श्याम पड़ती थी। उसको देखकर मैं आश्चर्यचकित हुआ कि यहाँ सूर्य और अग्नि भी नहीं और किसी का प्रकाश भी नहीं है, तब यह परछाहीं किस प्रकार है और क्या है? ऐसे में देखता ही था कि वह परछाहीं नृत्य करने लगी। उससे एक स्त्री निकली, जिसका शरीर दुर्बल आकार बड़ा ऊँचा और वर्ण कृष्ण था—मानों साक्षात् अँधेरी रात्रि है। उसके तीन नेत्र, बड़ी भुजा ऊँची ग्रीवा
५८८ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
थी—मानो प्रलयकाल के मेघ मूर्ति धारण कर स्थित हुए हैं। उसके गले में रुद्राक्ष और मुण्डों की माला पड़ी हुई थी। वह विकराल स्वभाव की नारी हाथों में त्रिशूल, खड्ग, बाण, ध्वजा, ऊखल मूसल आदिक आयुध लिये थी। ऐसा भयानक आकार देखकर मैंने विचार किया कि यह काली भवानी है। उसको मैंने नमस्कार किया। जैसे अग्नि के जले हुए पर्वत के शिखर श्याम होते हैं, वैसे ही वह श्यामवर्ण थी। उसके मस्तक में तीसरा नेत्र बड़वाग्नि की नाईं तेज से युक्त निकला था। कभी उसकी दो भुजा दिखतीं, कभी सहस्रभुजा दिखतीं, कभी अनन्त भुजा हो जातीं, कभी एक ही भुजा दीखती और कभी कोई भुजा न देख पड़ती। कभी सिर पैर कोई न रहता, केवल एक बुत सी लगती और नृत्य करती थी।
ज्यों-ज्यों वह नृत्य करती, त्यों-त्यों उसका शरीर स्थूल देख पड़ता, मानों आकाश को भी ढक लिया है, और दसों दिशाओं ने आकाश को पूर्ण किये हैं। नख-शिख की सीमा कुछ न दिखती, ऐसा आकार बढ़ाया। जब वह भुजा को हिलाती, तब मानों आकाश को मापती थी। पाताल तक उसके चरण, आकाश पर्यन्त सीस, पृथ्वी उसका उदर, सुमेरु आदि पर्वत नाभिस्थान और दशों दिशा भुजा थीं, मानों प्रलय काल की मूर्ति रचकर स्थित हुई है। बड़े पर्वत की कन्दरा सदृश उसकी नासिका थी। लोकालोक पर्वत हाड़ थे और कण्ठ में नदियों की माला थी, जो हिलती थी। वरुण, कुबेर आदि देवताओं के सिर की माला उसके कण्ठ में थी। पवन नासिका के मार्ग से निकलता था, जिससे सुमेरु आदि पर्वत तृणों की नाईं उड़े जाते थे। ब्रह्माण्ड की माला उसके गले में थी। हाथों में ब्रह्माण्डरूपी भूषण थे और कटि में ब्रह्माण्ड के घुँघरू और करधनी थी। जब वह नृत्य करती, तब सब ब्रह्माण्ड नृत्य करने लगता था। जैसे पवन से पत्ते नाचते हैं, वैसे ही सुमेरु आदि नृत्य करते थे। उसके एक-एक रोम में ब्रह्माण्ड थे। जैसे तारागण वायु के अधीन हैं। उसके कानों में धर्म-अधर्मरूपी मुद्राएँ थीं। बड़े-बड़े कान और बड़ा मुख था, मानो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भक्षण कर लेगी।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ५८६
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष स्तन थे। उन स्तनों में चारों वेदों और शास्त्रों के अर्थरूपी दूध निकलता था। निदान जगत् की सब मर्यादा मुझको उसमें दिखाई दी। उसके नृत्य करने से ब्रह्माण्ड और अस्ताचल आदि पर्वत तृणों की नाईं नृत्य करते थे और सब कुछ उलटपुलट होता दिखता था। उसके शरीर में नीचे आकाश ऊपर पृथ्वी थी। तारामण्डल सिद्ध, देवता, विद्याधर, गंधर्व, किन्नर, दैत्य, स्थावर, जङ्गम सब उस शरीर में दृष्टिगोचर होता था-मानो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों का आदर्श हो। भुजाओं के उछलने से चन्द्रमा की नाईं नखों का प्रकाश होता था। मन्दराचल, उदयाचल पर्वत कानों के भूषण से और हिमालय पर्वत बरफ के कण के समान दिखता था।
हे राम! इस प्रकार उस देवी के शरीर में मुझको अनन्त सृष्टि दीखी। कहीं इकट्ठी और कहीं भिन्न-भिन्न, कहीं एक ही सी चेष्टा करे और कहीं भिन्न-भिन्न चेष्टा करे। मानों ब्रह्माण्डरूपी रत्नों का डब्बा है। हे राम! जब मैं संकल्प-सहित देखता, तब मुझको सृष्टि दृष्टिगत होती और जब आत्मा की ओर देखता, तब केवल आत्मरूप ही दिखता और कुछ न दिखता। संकल्पदृष्टि से सम्पूर्ण जगत् नृत्य करता देख पड़ता, पर ऐसी सामर्थ्य किसी की न दिखती कि नृत्य न करे। जगत् की उत्पत्ति, स्थित और प्रलय सब उसी में दिखते और सम्पूर्ण क्रिया उसी से होती दिखतीं। उसी में सिद्ध, देवता, गन्धर्व, अप्सरा विमान पर आरूढ़ फिरते और नक्षत्रों के चक्र फिरते-मानों ब्रह्माण्ड फिर उदय हुए हैं। जब मैं फिर आत्मदृष्टि से देखता, तब ब्रह्मस्वरूप भासता और संकल्पदृष्टि से जगत् भासित होता। वह चित्तकला, जो संकल्परूप है उसमें सभी दिखते। हे राम! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब उसी में दृष्टिगत होते थे। जैसे मच्छर वायु से उड़ते हैं, वैसे ही अनन्त सृष्टि उसके शरीर में उड़ती दृष्टिगत होती। इससे मुझे महान् आश्चर्य हुआ। वह भैरव था और यह भैरवी उसकी शक्ति थी। दोनों मुझको विशालकाय देख पड़े। यह नित्य शक्ति सर्वात्मा थी और परमात्मा की क्रियाशक्ति सब विश्व को अपने
५६० ⁕ योगवाशिष्ट ⁕
आपमें जानती थी। जैसे समुद्र सब तरङ्गों को अपने में अपना रूप जानता है, वैसे ही सब ब्रह्माण्ड को वह अपने में अपना रूप जानती थी। वह तो सदाशिव से भी बड़े अहंकार को धारण किये थी, मानों सब ब्रह्माण्ड की माला कण्ठ में डाले है और यमादिक सब उसकी मर्यादा हैं।
हे राम! इस प्रकार मैंने रुद्र और काली भवानी को देखा। रुद्र के शिर पर जो जटा थी, वे मोर की पंख की नाईं थीं। काली को मैंने देखा कि नाना प्रकार के मृग उसके साथ हैं और वह डम-डम शब्द करती है। यह शब्द भी वह करती थी—"दिग्वंटिग्वं तुदिग्वं पंचमना वह संमंभप्रलये मियतयत्रिषंत्रो त्रीलं त्रीपलपलुमं पनुपं सुमंप मषमश्रिणु ही गुंहींगुंहीं उगुभियगुं दलुमददारो मीदातंदर्ता।" हे राम! इस प्रकार के शब्द करती हुई वह श्मशानों में नृत्य करती थी। हे राम! ऐसी देवी तुम्हारी सहायक हो, जो सर्वशक्ति परमात्मा है और सब ब्रह्माण्ड उसके आश्रय है। क्षण में वह अंगुष्ठप्रमाण हो जाती थी और क्षण में बड़े दीर्घ आकार धारण करती थी। सब जगत् में जो क्रिया होती है, वे उसके आश्रय से होती हैं। कहीं उत्पत्ति होती है, कहीं युद्ध होते हैं। ऐसी नाना प्रकार की क्रिया उस देवी के आश्रय से होती हैं। जैसे आइने में प्रतिबिम्ब होता है, वैसे ही उस देवी में क्रिया होती हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे देवीरुद्रोपाख्यानवर्णनन्नाम शताधिकपण्णवतिमस्सर्गः ॥ १६६ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो तुमने रुद्र और कालिका का वर्णन किया, सो वे कौन थे? महाप्रलय में तो कुछ नहीं रहता। उनके शरीर में तुमने सृष्टि कैसे देखी और महाप्रलय होकर उनके शरीर में सृष्टि ने कैसे प्रवेश किया? उस काली के हाथ में शस्त्र क्या थे? कहाँ से आई थी और कहाँ गई? उसका आकार क्या था? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई रुद्र है, न काली है, न कोई पुरुष है, न कोई स्त्री है, न कोई नपुंसक है, न पुरुष। मिलकर कुछ नहीं हुआ है। न ब्रह्माण्ड है और न पिण्ड है केवल चिदाकाश है और संकल्प से उपजे सब
❋ निर्वाण प्रकरण ❋
५६१
आकार भासित होते हैं। जैसे स्वप्न में आकार भासित होते हैं वैसे ही वे आकार भी भासित होते हैं। वास्तव में केवल चिदाकाश ज्यों का त्यों है। हे राम! आत्मपद अनन्त, चैतन्य, सत्य, प्रकाशरूप, अविनाशी और अपने आपमें स्थित है। रुद्रदेव का आकार जो दिखा था, सो वह चैतन्य आत्मा-ही ऐसे होकर भासित हुआ था-कोई और आकार न था। जैसे सुवर्ण ही भूषण होकर दिखता है, वैसे ही परमदेव चिदाकाश ऐसे होकर भासित हुआ था, क्योंकि वह चैतन्यस्वरूप है। जैसे मधुरता पौंड़े का स्वरूप है, वैसे ही आत्मा का स्वरूप चैतन्य है। हे राम! चैतन्यसत्ता अपने स्वरूप को नहीं त्यागती, आकार होकर भासित होती है और सदा अपने आपमें स्थित है। जैसे पौंड़े के रस में मधुरता न हो तो उसको कोई रख नहीं सकता, वैसे ही आत्मसत्ता में चेतनता न हो तो उसे चैतन्य कोई न कहे। जो आत्मा चेतनता को त्यागे तो परिणामी हो और चैतन्य न कहावे; परन्तु वह तो सदा आप अपने स्वभाव में स्थित है और किसी और अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ। इसी से कहा कि जो कुछ भासित होता है, वह आत्मा का किञ्चन है।
हे राम! जैसे पौंड़े के रस में मधुरता होती है, वैसे ही आत्मा में चेतनता है। चैतन्यमात्र में चेतनता लक्षण चेतनतारूप रहता है, इससे यह जगत् भावरूप है जो शुद्धचिन्मात्र में चित्त का उत्थान न होता तो जगद्भाव न लखाता। आत्मसत्ता दोनों अवस्थाओं में सदा ज्यों की त्यों है-जैसे वायु जब स्पन्दित होता है, तब उसका स्पर्शरूप लक्षण प्रतीत होता और जब निस्पन्द होता है, तब उसमें कोई शब्द नहीं प्रवेश कर सकता, पर वायु दोनों अवस्थाओं में तुल्य है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य में किसी शब्द का प्रवेश नहीं; पर चेतननाभाव में है और आत्मसत्ता सदा एकरस है-इसमें वास्तव में यह जगत् ही नहीं है। हे राम! आदि, मध्य, अन्त, जगत्, आकाश, कल्प, महाकल्प, उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, जन्म, मरण, सत्, असत्, प्रकाश, अन्धकार, पण्डित, मूर्ख, ज्ञानी, अज्ञानी, नामरूप, कर्मरूप, अवलोक, मनस्कार,
५६२ | योगवाशिष्ठ
विद्या, अविद्या, दुःख, सुख, बन्धन, मोक्ष, जड़, चेतन, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, आना, जाना, जगत्, अजगत्, कुछ नहीं हे बढ़ना, घटना, में, तुम, भेद, शास्त्र, पुराण, मन्त्र, आकार, उकार, मकार, जय, नाम आदिक स्थावर-जङ्गम सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं। जैसे समुद्र में तरङ्ग, बुलबुले और आवर्त्त सब जलरूप हैं, वैसे ही सब ब्रह्मस्वरूप हैं। ब्रह्म से भिन्न जगत् कुछ वस्तु नहीं। जैसे स्वप्न में जो पर्वत दिखते हैं, वे अनुभव से भिन्न नहीं होते, वैसे ही यह जगत् ब्रह्म से भिन्न नहीं। जैसे सूर्य की किरणों में जल जान पड़ता है, वैसे ही आत्मसत्ता जगत् रूप होकर भासित होती है।
हे राम! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु, आकाश आदि जितने शब्द हैं, वे सब ब्रह्मसत्ता ही से होकर स्थित हुए हैं, परन्तु सत्ता अपने आपमें ज्यों की त्यों है, कभी परिणाम को नहीं प्राप्त हुई और वही सत्ता सब की आत्मा है। जैसे समुद्र अपने तरङ्गभाव को त्यागे तो अपने सौम्यभाव में स्थित होता है; वैसे ही ब्रह्मसत्ता स्फुरने को त्यागे तो अपने स्वभाव में स्थित हो, जो अनामय है अर्थात् दुःखों से रहित, परमशान्तिरूप, अनन्त और निर्विकार है। जब इस प्रकार बोध हो, तब जीव उस ब्रह्मसत्ता को प्राप्त हो। बोध, अबोध, विधि, निषेध भी वही है। जैसे जल और समुद्र की संज्ञा कही है और तरङ्ग शब्द कहने में विलक्षण भासित होता है, पर जब जल तरङ्ग-बुद्धि को त्यागे, तब केवल समुद्र-रूप है, वैसे ही यह जीव जब अपने जीवत्वभाव को त्यागे, तब आत्म-रूपी समुद्र को प्राप्त हो, अर्थात् जब दृश्य का सम्बन्ध त्याग करे, तब आत्मा हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अन्तर्गोपाख्यानवर्णनं नाम शताधिकसप्तनवतितमस्सर्गः ॥ १६७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुमसे मैंने जो चिदाकाश कहा है, वह परमचिदाकाश है और सदा अपने आपमें स्थित है। हे राम! शुद्ध चिदाकाश जो मैंने तुमसे कहा है, वही यह रुद्ररूप है और वही नृत्य
❊ निर्वाण प्रकरण ❊
५६३
करता था। वहाँ आकार कोई न था, केवल चिद्घनसत्ता थी और वही ऐसे होकर किञ्चन होती थी। हे राम! जब मैं आत्मदृष्टि से देखता था, तब मुझको चिदाकाशरूप ही भासित होता था। हे राम! जो मेरे जैसा हो, वही वैसा रूप देख सकता है और नहीं देख सकता। हे राम! जिसका नाम कृतान्त है वही रुद्र और वही भैरव है। वही कृतान्त की मूर्ति नृत्य करके अन्तर्धान हो गई। वास्तव में वह रूप मायामात्र था। यह चैतन्यसत्ता के आश्रय नाचते थे। हे राम! जैसे सोने में भूषण हैं, परन्तु वे सोने के बिना नहीं होते, वैसे ही चेतनता किञ्चन से जगत् भासित होता है और फिर वही प्रमाद से आधिभौतिक हो जाता है। वास्तव में शुद्ध चिदाकाशरूप ही है और चेतनता से वही जगत्रूप दिखता है। राम ने पूछा, हे भगवन्! प्रथम तो आपने कहा कि अद्वैत आत्मतत्त्व में यह जगत् प्रमाद से कल्पित है और जो है तो कल्प के अन्त में नाश हो जाता है, केवल अद्वैतसत्ता रहती है, अब फिर आप-ही कहते हो कि चैत्यता से जगत्रूप भासता है। अद्वैत में चैत्यता कैसे हुई और कौन चेतनेवाला हुआ ? प्रलय के अनन्तर काली क्यों-कर भासित हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई चैत्य है और न कोई चेतता है केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, जो चैतन्यघन परम निर्मल और शान्तरूप है। उसी को शिवतत्त्व भी कहते हैं। वही शिवतत्त्व रुद्र आकार को धारण किये देख पड़ा था, दूसरा कुछ नहीं—केवल परम चिदाकाश है। वही चिदाकाश आकार रखकर भासित होता है। पर वास्तव में कोई आकार नहीं हुआ। न भैरव है, न भैरवी है, न काली है, न यह जगत् है। सब मायामात्र है।
जैसे स्वप्न में आत्मसत्ता चैत्यता के कारण जगत्रूप दिखती है, पर स्वरूप से न कुछ चैत्यता है और न जगत् है, आत्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है, वैसे ही उस जगत् को भी जानो। कुछ और नहीं हुआ, अद्वैतसत्ता ही है। इससे चैत्य और चेतनेवाला सब भ्रम से भासते हैं; आत्मा में ये नहीं उपजे, केवल स्वच्छ चिदाकाश है। मुझ-को तो सदा वही भासता है, पर अज्ञानी को नाना प्रकार का जगत्
५६४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
भासता है। आत्मा सदा एक है किञ्चन से उसमें आकार दिखते हैं। भैरव और काली सब निराकार हैं। भ्रान्ति में आकार प्रतीत होते हैं। जैसे मनोराज्य में युद्ध भासते हैं और जैसे कथा में अर्थ भासते हैं, वे असत् ही संकल्प-विज्ञान से हैं; वैसे ही चिदात्मा में यह जगत् भासित होता है। जैसे आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही ये आकार दिखते हैं। हे राम! ये जो जगत्, प्रलय और महाप्रलय आदि शब्द हैं, उनका नाश करने के लिए मैं तुमको कहता हूँ। आत्मा एक अद्वैत चैतन्य है, उस चैतनता का अभाव कभी नहीं होता। वह अपने आपमें स्थित है और किञ्चन है। जैसे सूर्य की किरणें किञ्चनरूप होती हैं और उनमें जल भासता है, वैसे ही चित्त का किञ्चन जगत् भासता है। वही महाप्रलय में रुद्र और भैरवी होकर भासता है। वास्तव में न कुछ रुद्र है और न काली है, सब आत्मा ही है।
हे राम! जो कुछ कहना-सुनना होता है सो वाच्य तथा वाचक से होता है, आत्मा में कहना और सुनना कुछ नहीं। वही चिदाकाश रुद्र संकल्प में नृत्य करता था। जैसे सुवर्ण भूषण होकर भासित होता है, वैसे ही चिदाकाश संकल्प में आकार होकर भासित होता है, दृश्य कुछ नहीं बना। मैं, तुम और जगत्, चेत्य और अचेत्य सब वही रूप है; उसमें कोई शब्द नहीं फुरा। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के शब्द भासित होते हैं सो कुछ वास्तव नहीं—पत्थर की नाईं मौन हैं—वैसे ही जाग्रत् जगत् में भी जितना शब्द होता है सो सब स्वप्न है; कुछ हुआ नहीं। केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही आत्मसत्ता अपने आप भाव में स्थित है, जहाँ न एक है, न द्वैत है, न सत्य है, न असत्य है, न चित्त है, न चेत है, न मौन है, न अमौन है और न कोई चेतनेवाला है। चेत के अभावसा केवल अचेत चिन्मात्र आत्मसत्ता निर्विकल्परूप स्थित है। हे राम! सबसे बड़ा शास्त्र का सिद्धान्त यही है; इस दृष्टि से तुम मौन में स्थित हो। हे राम! सब सिद्धान्तों की समता है निर्विकल्प होना। जैसे पत्थर की शिला मौन होती है, वैसे ही चेत्य से रहित रहकर ही
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६५
जो कुछ प्रत्यक्ष आचार प्राप्त हो, उसमें वृत्त होना और सदा आत्म-निश्चय रखना, इसी का नाम परम मौन है। सब क्रिया होती रहें, पर अपने से कुछ न देखना—जैसे नट स्वाँग भरता है और उसके अनुसार विचरता है, परन्तु निश्चय उसका आदि शरीर में ही होता है, उससे वह चलायमान नहीं होता, वैसे ही जो कुछ अनिच्छित प्राप्त हो, उसको यथाशास्त्र करे, परन्तु अपने निर्गुण निष्क्रियस्वरूप में चलायमान न हो, उसी अद्वैत स्वरूप में स्थित रहे।
राम ने पूछा, हे भगवन्! वह रुद्र क्या था और वह काली शक्ति क्या थी? उनके अङ्गों का बढ़ना-घटना और नृत्य करना क्या था और वस्त्र क्या थे, सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शिवतत्त्व ही आकार होकर भासता है और कोई आकार नहीं। वह चिन्मात्र, अमल विद्या और अविद्या के कार्य से रहित, शान्त और अवाच्यपद है। यह संज्ञा भी संकल्प में तुमसे कही है, आत्मवेत्ता आत्मपद को अवाच्यपद कहते हैं, तथापि मैं कुछ कहता हूँ। हे राम केवल आत्मतत्त्वमात्र जो चिदाकाश है, वही शिव भैरव है। उसी के चमत्कार का नाम चित्तशक्ति है। उसी का नाम काली है। उस काली, आत्मा और शिवरूप में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन और स्पन्दन में और अग्नि तथा उष्णता में कुछ भेद नहीं होता, वैसे ही चित्तकला और आत्मा में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन निष्पन्द होता है, तब उसका लक्षण नहीं होता, अवाचकरूप होता है, और जब स्पन्दन होता है, तब उसका लक्षण भी होता है और उसमें शब्द प्रयोग होता है वैसे ही चित्तशक्ति में उसका लक्षण होता है। उसके अनेक नाम हैं। उसी का नाम स्पन्दन और इच्छा है। उसी को चैत्योन्मुखत्व से वासना कहते हैं। उसी के स्वाद की इच्छा से जब चित्तसंवित् में वासना फुरती है, तब उसका नाम वासना करने वाला वासक कहलाता है—फिर आगे दृश्य होता है। जब त्रिपुटी हुई अर्थात् वासना, वासक और वास्य हुए, तब वासक को जीव कहते हैं—जो जीवत्व भाव लेकर स्थित होता है। तब इसको यह भावना होती है कि मैं जीव हूँ और मेरा नाश कभी
५६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
न हो, इस इच्छा में जीव कहाता है। चित्शक्ति की जो ऐसी संज्ञा होती है, वह स्पन्दन में होती है। पर शिवतत्त्व अस्फुरण है और अचेत शक्ति में फुरने की नाईं स्थित है।
जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं होता और हुए की नाईं भासता है, वैसे ही यह जगत् है नहीं और हुए की नाईं दिखता है, इससे उसको यह संज्ञा देते हैं। परमात्मा की क्रियाशक्ति काली प्रथम तो कारणरूप-प्रकृति है और उसी मे सब हैं—इसी मे प्रकृतिरूप है। वह विकृति अर्थात् किसी का कार्य नहीं है। महत्तत्त्व, पञ्चभूत, और अहंकार ये सात प्रकृति—विकृत हैं—अर्थात् कार्य भी हैं और कारण भी हैं। कार्य आदि देवी के हैं और कारण षोडश के हैं—पञ्चज्ञान इन्द्रियाँ, पञ्चकर्म इन्द्रियाँ, पञ्चप्राण और एक मन। इनके सप्तदश कार्य हैं। षोडश विकृति हैं अर्थात् कार्यरूप हैं, कारण किसी के नहीं। सत्रहवाँ पुरुष जो परमात्मा का अंश है वह अद्वैत, अचिन्त्य और चिन्मात्र है। न किसी का कारण है और न कार्य अपने आपमें स्थित है। इससे कारणकार्य में जितनी द्वैतकल्पना है, वह सब चित्तशक्ति में स्थित है। जब यह निस्पन्द होती है तब तत्त्वरूप शिवपद में निर्वाण हो जाती है और कारण-कार्यरूपी सब भ्रम मिट जाता है, केवल आकाशवत् शेष रहता है। वह शुद्ध, अद्वैत, अचेत चिन्मात्र सदा अपने आप-भाव में स्थित है और उसकी स्पन्दनरूप क्रियाशक्ति की ये सब संज्ञा हैं। प्रथम तो सबका कारणरूप प्रकृति है, जो शोष है, अर्थात् जैसे वडवाग्नि समुद्र को सुखाती है, वैसे ही वह जगत् को सुखाती है। वह सिद्ध है, अर्थात् साधक उसे आश्रय करके सेवते हैं। वह जयन्ती है, अर्थात् उसकी जय है। वह चण्डिका है अर्थात् उसके क्रोध से जगत् का प्रलय होता है और संसार डरता है। वह वीर्य है, अर्थात् उसका वीर्य अनन्त है। वह दुर्गा है, अर्थात् उसका रूप जानना कठिन है, वह गायत्री है, अर्थात् उसके पाठ से संसार समुद्र से रक्षा होती है। वह सावित्री है, अर्थात् जगत् का पालन करती है। वह कुमारी अर्थात् कोमलस्वभाव है। वह गौरी अर्थात् गौर अङ्गवाली है। वह शिवा अर्थात्
५६८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
हे राम! स्पन्दन शक्ति का जबतक शिव में व्यतिरेक है, तब तक वह जगत को रचती है---जहाँ वह है वहाँ जगत है---जगत से विलग नहीं रहती। जैसे जहाँ सूर्य की किरणें हैं, वहाँ जलाभास होता है---किरण बिना जलाभास नहीं रहता, वैसे ही स्पन्दनशक्ति जगत के बिना नहीं रहती। जैसे आकाश के अङ्ग आकाश हैं, वैसे ही इसके अङ्ग जगत हैं और जैसे समुद्र में तरङ्ग समुद्ररूप हैं, वैसे ही जगत इसका रूप है। यह शक्ति चिदाकाश है उसमें व्यतिरिक्त नहीं। जब यह फुरती है, तब जगदाकार मानती है और जब शिव की ओर आती है, तब शिवरूप हो जाता है, ओर जगत का भाव नहीं रहता। इससे हे राम! तुम्हारी चित्तशक्ति जब तुम्हारी ओर आवै तब जगतभ्रम मिटै। इस चित्त शक्ति ने ही जगतभ्रम रचा है। शिव शान्तरूप है और अजर, अमर, अचेत, चिन्मात्र है। उसमें कुछ क्षोभ नहीं---आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुमने काली के अङ्गों की जो सृष्टि देखी थी, वह आत्मा में सत् है अथवा असत्, सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह काली देवी आत्मा की क्रियाशक्ति अर्थात स्फुरणशक्ति है, इसमें आत्मा में सत्य है और वास्तव में आत्मा में कुछ नहीं, मिथ्या है। जैसे तुम मनोराज्य में अपने से दूसरा चिन्तन करो तो वह कुछ वस्तु नहीं पर, उस काल में सत् भासता है, वैसे ही जितनी सृष्टियाँ हैं, वे आत्मा में सत्य नहीं, परन्तु चित्तशक्ति से बसती दिखती हैं जैसे जितने कुछ विधि-निषेध पदार्थ और आकाश, पर्वत, समुद्र, वन, जगत, तीर्थ, कर्म, बन्ध, मोक्ष, गुरु, शास्त्र, युद्ध शास्त्र आदि भासते हैं, वे सब चिदाकाश ब्रह्मरूप हैं और वास्तव में इनका होना ब्रह्म से भिन्न नहीं। सब प्रकार और सर्वदा आत्मा अपने आपमें स्थित है। वह शुद्ध, अद्वैत, निराकार, निर्विकार और ज्यों का त्यों है। उसमें जगत कोई नहीं उपजा।
सब जगत आत्मा में क्रियाशक्ति ने रचा है, सो वह माया काल में सत्य है, वास्तव में कुछ नहीं। जैसे सोनेवाले को स्वप्न में सृष्टि दिखती है और उसके शरीर को कोई हिलावे तो वह नहीं जागता, पर जो