योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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हे राम! स्पन्दन शक्ति का जबतक शिव में व्यतिरेक है, तब तक वह जगत को रचती है---जहाँ वह है वहाँ जगत है---जगत से विलग नहीं रहती। जैसे जहाँ सूर्य की किरणें हैं, वहाँ जलाभास होता है---किरण बिना जलाभास नहीं रहता, वैसे ही स्पन्दनशक्ति जगत के बिना नहीं रहती। जैसे आकाश के अङ्ग आकाश हैं, वैसे ही इसके अङ्ग जगत हैं और जैसे समुद्र में तरङ्ग समुद्ररूप हैं, वैसे ही जगत इसका रूप है। यह शक्ति चिदाकाश है उसमें व्यतिरिक्त नहीं। जब यह फुरती है, तब जगदाकार मानती है और जब शिव की ओर आती है, तब शिवरूप हो जाता है, ओर जगत का भाव नहीं रहता। इससे हे राम! तुम्हारी चित्तशक्ति जब तुम्हारी ओर आवै तब जगतभ्रम मिटै। इस चित्त शक्ति ने ही जगतभ्रम रचा है। शिव शान्तरूप है और अजर, अमर, अचेत, चिन्मात्र है। उसमें कुछ क्षोभ नहीं---आत्मसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। राम ने पूछा, हे भगवन्! तुमने काली के अङ्गों की जो सृष्टि देखी थी, वह आत्मा में सत् है अथवा असत्, सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह काली देवी आत्मा की क्रियाशक्ति अर्थात स्फुरणशक्ति है, इसमें आत्मा में सत्य है और वास्तव में आत्मा में कुछ नहीं, मिथ्या है। जैसे तुम मनोराज्य में अपने से दूसरा चिन्तन करो तो वह कुछ वस्तु नहीं पर, उस काल में सत् भासता है, वैसे ही जितनी सृष्टियाँ हैं, वे आत्मा में सत्य नहीं, परन्तु चित्तशक्ति से बसती दिखती हैं जैसे जितने कुछ विधि-निषेध पदार्थ और आकाश, पर्वत, समुद्र, वन, जगत, तीर्थ, कर्म, बन्ध, मोक्ष, गुरु, शास्त्र, युद्ध शास्त्र आदि भासते हैं, वे सब चिदाकाश ब्रह्मरूप हैं और वास्तव में इनका होना ब्रह्म से भिन्न नहीं। सब प्रकार और सर्वदा आत्मा अपने आपमें स्थित है। वह शुद्ध, अद्वैत, निराकार, निर्विकार और ज्यों का त्यों है। उसमें जगत कोई नहीं उपजा।
सब जगत आत्मा में क्रियाशक्ति ने रचा है, सो वह माया काल में सत्य है, वास्तव में कुछ नहीं। जैसे सोनेवाले को स्वप्न में सृष्टि दिखती है और उसके शरीर को कोई हिलावे तो वह नहीं जागता, पर जो