योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५६६
कुछ सृष्टि होती तो हिलाने से उसका कोई स्थान गिर पड़ता—इसी से जाना जाता है कि किसी का नाश नहीं होता—वास्तव कुछ नहीं है। हे राम! वह सृष्टि, जो प्रत्यक्ष अंगीकार होती है, उसके चित्तस्पन्दन में स्थित है, परन्तु जबतक निद्रा है, तभी तक वह सृष्टि है; जब निद्रा निवृत होती है तब स्वप्नसृष्टि भी नहीं दिखती। वैसे ही यह सृष्टि भी वास्तव में कुछ नहीं है, अज्ञान ने चित्तशक्ति में भासती है। हे राम! सब पदार्थ चित्त के फुरने में भासते हैं जिसका संकल्प शुद्ध होता है, उसके मनोराज्य की सृष्टि यदि देशकाल में प्रत्यक्ष होती है तो संकल्प-रूप होती है, क्योंकि कुछ बना नहीं। जब संकल्प फुरता है, तब संकल्प के अनुसार सृष्टि भासती है; इससे संकल्परूप ही हुई। और जब उसकी सत्यता हृदय में होती है, तब इसका अर्थ हृदय में अनुभव होता है। जैसे परलोक अदृष्ट है, पर जब उसकी सत्यता हृदय में होती है, तब उसका राग-द्वेष भी हृदय में फुरता है, क्योंकि संकल्प में उसका भाव है। वैसे ही जबतक चित्त में स्पन्दन फुरता है, तब तक जगत् है, और जब चित्त निस्पन्दन होता है, तब जगत् की सत्यता नहीं भासती।
हे राम! यह सब जगत् क्रियाशक्ति ने आत्मा में रचा है। जबतक यह क्रियाशक्ति काली शिव से व्यतिरिक्त होती है, तबतक नाना प्रकार के जगत् रचती है और क्षोभ को प्राप्त होती है। और जब शिव की ओर आती है तब शान्तरूप हो जाती है। तब फिर उसकी प्रकृति संज्ञा नहीं रहती—वह अद्वैततत्त्व में अद्वैतरूप ही हो जाती है। जैसे जबतक पवन चलता है, तबतक शीत, उष्ण, सुगन्ध, दुर्गन्ध, बड़ी और छोटी संज्ञा होती है, और जब ठहरता है, तब यह नहीं कहा जाना कि ऐसा है अथवा वैसा है। वैसे ही जबतक चित्तशक्ति स्पन्दनरूप होती है, तब तक जगत् रचती है और प्रकृति कारण रूप कहाती है। उसमें दो प्रकार के शब्द होते हैं—विद्या और अविद्या! हे राम! जो कुछ कहना होता है वह स्पन्दनरूप जो चित्र लिखा है, उसमें है। वह जब शिव-तत्त्व के अन्तर्गत होती है, तब अद्वैतरूप हो जाती है—वहाँ किसी शब्द की गति नहीं।