योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1405, कुल 1734 में से
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हे राम ! शिव क्या है और शक्ति क्या है, यह भी सुनो । ये सब जीव शिवरूप हैं और इनके चित्त का फुरना काली है । जबतक इच्छा में चित्तशक्ति बाहर फुरती है, तबतक भ्रम का अन्त नहीं होता और नाना प्रकार के विकारों का अनुभव होता है, कभी शान्ति नहीं होती । और जब चित्तशक्ति उलटकर अधिष्ठान को देखता है, तब जगद्भ्रम निवृत्त हो जाता है और परम शान्ति प्राप्त होती है । हे राम ! आत्मा और चित्तसंविद् में कुछ भेद नहीं । जैसे वायु के स्पन्दन और निष्पन्द में कुछ भेद नहीं होता, परन्तु जब स्पन्दन होता है, तब जाना जाता है और निष्पन्द नहीं जाना जाता, वैसे ही चित्तसंविद् जब फुरता है, तब जाना जाता है, और नहीं फुरता तब नहीं जाना जाता, और जानना और न जानना दोनों नहीं रहते हैं । हे राम ! जबतक इच्छा-शक्ति शिव की ओर नहीं देखती, तब तक नाना प्रकार के नृत्य करती है अर्थात् जगत् को रचती है, और जब शिव की ओर देखती है, तब नृत्य बन्द हो जाता है । और सब अङ्ग सूक्ष्म हो जाते हैं । हे राम ! इस काली का आकार अपरिमित था, पर शिव की ओर देखने से सूक्ष्म हो गया । पहले पर्वत-समान था; फिर निकट आई तब ग्राम के समान हुआ; फिर वृक्ष के समान हुआ । जब और निकट आई, तब सूक्ष्म आकार हो गया और शिव के साथ मिली तब शिवरूप हो गई । शिव के सम्मिश्रण में इसका जो विलास है, वह शून्य हो जाता है और परमशान्त शिवपद की प्राप्ति होती है ।
श्रीराम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! यह जो परमेश्वरी कालीशक्ति है, वह उसका मिलकर शान्त कैसे हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! देवी परमात्मा की इच्छाशक्ति है । इसका नाम जगन्माता है । जब तक यह शिवतत्त्व से अलग रहती है, तब तक जगत् को रचती है और जब अपने अधिष्ठान की ओर आती है, जो नित्यतृप्त, अनामय, निर्विकार, द्वैतभाव से रहित है, तब परमशान्ति को प्राप्त होती है, तब इसकी प्रकृतिसंज्ञा जाती रहती है । जैसे नदी जबतक समुद्र को नहीं प्राप्त हुई, तबतक दौड़ती और शब्द करती है, पर जब समुद्र को मिली, तब