योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1406, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६०१
शब्द करना और दौड़ना नष्ट हो जाता है और नदीसंज्ञा भी नहीं रहती—समुद्र को मिलकर परमगम्भीर समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही जबतक चित्तशक्ति शिव से अलग होती है, तबतक जगत्भ्रम को रचती है और जब शिवतत्त्व को मिलती है, तब शिवरूप हो जाती है और द्वैतभ्रम मिट जाता है। हे राम! जब यह चित्तशक्ति शिवपद में लीन हो जाती है, तब प्रथम जो देह और इन्द्रियों से तद्रूप हुई थी, इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट में अपने को सुखी-दुःखी मानती थी और राग-द्वेष से जलती थी, वह भाव जाता रहता है, और नित्यतृप्त अनामय पद के मिलने से सुख-दुःख से रहित हो जाती है, क्योंकि अनात्मदेह इन्द्रियों की तद्रूपता का अभाव हो जाता है और आत्मतत्त्व के साथ यह तद्रूप हो जाती है। जैसे पत्थर की शिला में मिलकर खड्ग की धार तीक्ष्ण होती है, वैसे ही चित्तसंवित् जब आत्मपद में मिलती है, तब एक अद्वैतरूप हो जाती है। तब आत्मपद का स्पर्श करने से अनात्म-भाव का त्याग करती है।
जैसे ताँबा पारस के स्पर्श से सुवर्ण हो जाता है और फिर ताँबा नहीं होता, वैसे ही यह वृत्ति अनात्मभाव को नहीं प्राप्त होती। चित्तकला तबतक विषय की ओर दौड़ती है, जबतक अपने वास्तव स्वरूप को नहीं प्राप्त हुई। जब अपने वास्तवस्वरूप को प्राप्त होती है, तब विषय की ओर नहीं दौड़ती है। जैसे जिस पुरुष को अमृत प्राप्त होता है और उसके स्वाद का अनुभव होता है, वह नीम खाने की इच्छा नहीं करता, वैसे ही जिसको आत्मानन्द प्राप्त हुआ है, वह विषयों के सुख की इच्छा नहीं करता। हे राम! यह संसारभ्रम चित्तसंवित् में दृढ़ सत्य होकर स्थित है और संसार के सुख का त्याग नहीं कर सकता। पर जब आत्मसुख प्राप्त होगा, तब उस तुच्छ सुख को त्याग देगा। जैसे किसी पुरुष को जबतक पारस नहीं मिलता, तबतक वह और धन को त्याग नहीं सकता, पर जब पारस प्राप्त हो जाता है, तब तुच्छ धन का त्याग करता है और फिर धन के लिए कोई यत्न नहीं करता, वैसे ही जब जीव को आत्मानन्द प्राप्तहोता है, तब वह विषय के सुख का त्याग करता