योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1407, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें६०२ ॐ योगवासिष्ठ ॐ
हे, उसे पाने का यत्न नहीं करता। हे राम! भौंरा तबतक और स्थानों में घूमता है, जबतक कमल की पंक्ति पर नहीं पहुँचता, पर जब उस पंक्ति पर पहुँच जाता है, तब और स्थान को त्याग देता है, वैसे ही चित्तशक्ति जब आत्मपद में लीन होती है, तब किसी पदार्थ की इच्छा नहीं करती, निर्विकल्पपद को प्राप्त होती है।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे पुरुषप्रकृतिविचारो नाम शताधिकाष्टनवतितमसर्गः॥ १९८॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब पूर्व का प्रसङ्ग फिर सुनो। जब काली नृत्य करके निर्वाण हो गई, तब शिव अकेला रह गया। वहाँ मुझे देख पड़ता था और दो खण्ड आकाश के देख पड़े—एक अधोभाग और दूसरा ऊर्ध्वभाग। और कुछ न देख पड़ता था। तब रुद्र ने नेत्रों को फैलाकर दोनों खण्ड देख—जैसे सूर्य जगत् को देखता है—और प्राण को भी खींचा। तब ऊर्ध्व और अधः दोनों खण्ड इकट्ठे हो गये और ब्रह्माण्ड को अन्तर्मुख कर लिया—एक शिव ही रह गया और कुछ न दिखता था। हे राम! जब एक क्षण व्यतीत हुआ, तब रुद्र बड़े आकार को धारण कर ब्रह्माण्ड को भी नाँघ गया और एक वृक्ष के समान हो गया। फिर अङ्गुष्ठमात्र शरीर रखकर एक क्षण में सूक्ष्म अणु सा हो गया। फिर रेत के कण से भी सूक्ष्म हो गया। फिर नेत्रों से अदृश्य हो गया। तब दिव्यदृष्टि से मैं देखता रहा। फिर वह भी लुप्त हो गया, केवल चिदाकाश ही शेष रहा और दूसरी वस्तु कुछ न दिखी। जैसे वर्षाकाल के मेघ शरत्काल में नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही वह रुद्र भी लुप्त हो गया। हे राम! उस काल में मुझको तीनों इकट्ठे दिखे—एक देवी ब्रह्मा की शक्ति; दूसरी कालीशक्ति और तीसरी शिला। तब मैंने विचार किया कि यह स्वप्न गन्धर्व नगर सा आश्चर्य था, और कुछ नहीं। तब मैंने क्या देखा कि स्वर्ण की शिला ही पड़ी है। यह सृष्टि शिलाकोष में स्थित थी। तब मैंने विचार किया कि यह सृष्टि शिलाकोष में है तो और सृष्टि भी होगी, क्योंकि सब वस्तु सब प्रकार और सब स्थान पूर्ण है। इसलिए मैं उसमें भी सृष्टि देखने लगा और नाना प्रकार की