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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1416, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1416

ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ

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हुआ। प्राणों के भीतर मैं स्थित हुआ और प्राण-अपान के क्षोभ से अन्न को पचाने लगा। जैसे आत्मा के प्रकाश से रूप, अवलोक और मनस्कार प्रकाशित होते हैं, वैसे ही सब पदार्थ मेरे प्रकाश से प्रकाशित होने लगे, क्योंकि मैं तेजरूप था—मानों चैतन्यसत्ता का दूसरा भाई हूँ। जैसे सब पदार्थ आत्मा से सिद्ध होते हैं, वैसे ही मुझसे सिद्ध होने लगे। हे राम! राजाओं में तेज और सिद्धों में वीर्य मैं ही था। बलरूप होकर जगत् को मैं ही पुष्ट करता था। बड़वाग्नि की दाहकशक्ति होकर जगत् को मैं ही नष्ट करता था। तेजवानों में तेज और बलवानों में बल मैं ही था। तले भी मैं था, मध्य भी मैं ही था और चन्द्रमा सूर्य से रहित जो स्थान हैं, उनमें भी मैं ही था। मैं अग्निरूपी दीपक और चन्द्रमा-सूर्यरूपी नेत्रों से मध्यमण्डल में स्पष्ट देखता था।

हे राम! इस प्रकार मैं तेजरूप होकर भीतर-बाहर सब स्थावर-जङ्गम पदार्थों में स्थित हुआ, पर जब बोधदृष्टि से देखता, तब सब आत्मा ही का भान होता और जब अन्तवाहक दृष्टि से देखता तब अपने को विराटरूप जानता कि सब जगत् में मैं ही फैल रहा हूँ और सब पदार्थ मेरे ही अङ्ग हैं। निदान तेजवानों में तेज और क्रोधवानों में क्रोध, यतियों में यती और अजित मैं हुआ। सब ओर मेरी ही जय है; क्योंकि जय उसकी होती है, जिसमें बल और तेज होता है—सो बल में हूँ और तेज भी मैं हूँ, इससे मेरी जय है। हे राम! सुवर्ण और रत्नमणि में जो प्रकाश और रूप है, वह मैं हुआ। राम ने पूछा, हे भगवन्! इस प्रकार जो आप जगत् की क्रिया अनुभव करने लगे कि जलरूप होकर अग्नि को बुझाया और अग्नि होकर जल को जलाया, ये क्रियाएँ जो तुम्हारे ऊपर इष्ट-अनिष्ट से होती रहीं, उनको तुमने सुख-दुःख के साथ अनुभव किया या नहीं किया? यह मेरे बोध के लिए कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे चैतन्य पुरुष स्वप्न में पर्वत, वृक्ष, देह, इन्द्रियाँ और नाना प्रकार के जड़ पदार्थ देखता है, जो वास्तव में उनमें नहीं हैं, केवल अनुभवरूप हैं, परन्तु निद्रादोष से वे उन्हें द्वैत की नाईं जानते हैं, और उनका राग-द्वेष अपने में मानते हैं—यथार्थ में द्रष्टा ही दृश्यरूप