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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1415, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1415

६१० ❊ योगवासिष्ठ ❊

हुआ। अपने का आप स्वाद ग्रहण करने लगा। हिमालय में बर्फ होकर स्थित हुआ। हे राम! मैं चैतन्य होकर जड़ की नाईं स्थित हुआ। बीज होकर मैंने ही अपने को उत्पन्न किया और प्रलय के मेघ होकर मैंने ही अपना नाश किया। इस प्रकार जल होकर स्थावर, जङ्गम सब जगत् में स्थित हुआ और सदा अपने आपमें स्थित होकर अपने स्वरूप को न त्यागा। जैसे स्वप्न में जगत् अनुभवरूप है और अनहोता भासित होता है, वैसे ही मैंने जलरूप होकर जगत् को धारण किया। हे राम! में नाना प्रकार के स्थानों में स्थित हुआ। फूलों की शय्या पर चिरकाल तक विश्राम करता रहा। गन्ध होकर फूलों में स्थित हुआ। मेघ होकर आकाश में विचरा और ऐसी वर्षा की कि पर्वतों पर वेग से प्रवाह चलने लगा। मैं कण-कण होकर समुद्र और नदी में विचरा। यह भावना चित्अणु में मुझको हुई।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ऽन्तर्गोपाख्याने जलरूपवर्णन-नाम द्विशताधिकप्रथमसर्गः ॥ २०१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जल के अनन्तर मैंने तेज की भावना की, अर्थात तेज धारण किया. तब मुझमें इतने अङ्ग उदय हुए-चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि-और इनसे जगत् की क्रिया सिद्ध होने लगी। जैसे राजा के अङ्ग अनुचर और हरकारे होते हैं, वैसे ही तमरूपी चोर को दीपकरूपी हरकारे मारने लगे। में आकाशरूपी था, इससे मेरे कण्ठ में तारावलीरूपी माला पड़ी थी। सूर्य होकर मैं जल को सोखता और दशों दिशाओं को प्रकाश देता रहा। आकाश जो ऊँचाई के कारण श्याम भासित होता है, वह मेरे निकट प्रकाशमान होता था। सब जगत् में में ही फैल रहा था। जहाँ में रहता, वहाँ से तम का अभाव हो जाता। चन्द्रमा और सूर्यरूपी डब्बा है, जिसमें दिन-रात और कालसर्परूपी अनेक रत्न सर्वदा निकलते रहते हैं। राजसी, सात्त्विकी और तामसी क्रियारूपी कमलिनी का मैं सूर्य हुआ और सब देवताओं और पितरों को तृप्त करता रहा। यज्ञ की अग्नि और रत्न, मोती, मणि आदिक जो प्रकाशमान पदार्थ हैं, उनमें प्रकाश मैं ही