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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1414, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1414

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६०६

रहता, वैसे ही विचार किये से मन और मन की रचना जगत् नहीं रहता। मन का निर्वाण करना ही परमशान्ति है, और कोई उपाय नहीं। हे राम! जितने क्षोभ हैं, उनका कर्त्ता मन है। सम्पूर्ण शब्द-अर्थ की कल्पना मन से उठती है—मन का निर्वाण होने पर कोई नहीं रहती। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर! आप अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुए सो कुछ और रूप भी हुए, अथवा नहीं हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! आत्मरूपी जो जाग्रत् है, उसमें अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुआ। मैं चैतन्य था और जड़ की नाईं स्थित हुआ—वास्तव में मैं जगत् न था, केवल चिदाकाश था, जिसमें न कुछ नानात्व है, न अनानात्व है, न अस्ति है न नास्ति है, और अहं-त्वं-इदं का अभाव है। वह केवल परम आकाश है, जो आकाश से भी निर्मल चिदाकाश है, और जो है सो सब शब्द-ब्रह्म है। जगत् के होते भी वह अरूप है; क्योंकि कुछ आरम्भ परिणाम से नहीं बना—केवल आत्मा का चमत्कार है।

हे राम! जहाँ-जहाँ पदार्थसत्ता है, वहाँ-वहाँ जगत् वस्तु है। सर्वदा, सब प्रकार, सब पदार्थों का स्पन्दन ब्रह्म है। जहाँ ब्रह्मसत्ता है, वहाँ जगत् है। इस प्रकार मैंने अनन्त ब्रह्माण्ड को देखा। जब मैं अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुआ तो जब जल की धारणा की, तब जल-रूप होकर फैला। वृक्ष, धाम, फूल, गुच्छे डाल, तमाल और पत्तों में रस होकर स्थित हुआ। खम्भे में मैं ही बल हुआ और समुद्र हुआ, नदियों के प्रवाह होकर मैं ही बहने लगा और उनमें गड़गड़ शब्द करने लगा। तरङ्ग बुलबुले और फेन को फैलाकर विलास किया। ओस के कण होकर मैं ही स्थित हुआ। आकाश में मेघ होकर बरसता और प्राणियों को तृप्त करने लगा। उनमें रुधिर आदि रस होकर मैं ही स्थित हुआ और उनकी नाड़ियों में मथन करके आप ही प्रवेश किया। जैसी-जैसी नाड़ी होती है, वैसा-वैसा रस होकर मैं स्थित हुआ। सब नाड़ियों में रस, बीज, कफ, पित्त, मूत्र आदि मैं ही स्थित हुआ। सब प्राणियों की जिह्वा के अग्रभाग में रस होकर मैं स्थित

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