योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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होती है उन सबका आधार में हुआ । पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं की संज्ञा संवेदन फुरने से हुई है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ऽन्तरोगोपाख्याने पृथ्वीधातु- वर्णनन्नाम द्विशततमस्सर्गः ॥ २०० ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुमको जो धारणा से पृथ्वी का अनुभव हुआ और उसमें जगत् उत्पन्न हुआ, वह संकल्परूप था या मन से उपजा था अथवा आधिभौतिक था ? वशिष्ठ बोले, हे राम ! सब जगत् संकल्प-रूप है, पर आधिभौतिक की नाईं भासित होता है । वास्तव में केवल चिदाकाश अपने आपमें स्थित है । वह चिदाकाश मैं हूँ । मैं न कभी उपजा हूँ और न मेरा नाश होगा, सर्वदा मैं अद्वैत, अचैत्य, चिन्मात्र रूप हूँ । उसके संकल्प का नाम मन और आभास का नाम संकल्प है । ऊर्मी का नाम ब्रह्मा और इच्छा है । उसी में जगत् स्थित है । वह आकाशरूप है—बना कुछ नहीं । हे राम ! जिसको सत्य और असत्य कहते हो, वह शुभ-अशुभरूप जगत् मन में स्थित है, और सब आकार निराकार रूप हैं, भ्रान्ति से पिण्डाकार दिखते हैं । जैसे स्वप्न में जो शुभ-अशुभ पदार्थ दिखते हैं, वे निराकार हैं, पर भ्रान्ति से पिण्डाकार जान पड़ते हैं, वैसे ही वे जगत् भी निराकार है, पर भ्रम से पिण्डाकार लगते हैं और विचार करने से शून्य हो जाते हैं । जैसे मनोराज्य से आकार रचित है, वैसे ही मेरे आकार जानो—स्वरूप से कुछ नहीं उपजे । जैसे मृत्तिका से बालक नाना प्रकार की सेना रचते हैं और उस मृत्तिका के उनको भिन्न-भिन्न भाव निश्चय होते हैं, वैसे ही अद्वैत आत्मा में मन-रूपी बालक ने जगत् की कल्पना की है, वास्तव में कुछ नहीं, आत्म-तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है । जैसे मृगतृष्णा का जल ही नहीं तो उसमें डुबा किसे कहिये, वैसे ही मन आप आभासरूप है तो उसका रचा जगत् कैसे सत् हो ?
हे राम ! सब चिदाकाशरूप है—दूसरा कुछ नहीं बना । आत्मरूप आकाश में जो मनरूपी नीलता है, सो अविचार-सिद्ध है । विचार करने से नीलता कुछ वस्तु नहीं । जैसे दीपक के रहने से अन्धकार नहीं