योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1412, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६०७
जैसे मरुस्थल की नदी मिथ्या है, वैसे ही ग्रहण करनेवाली वृत्ति मिथ्या है। जैसे संवेदन में जो मनन फुरता है, वह भी मिथ्या है—क्योंकि नदी मिथ्या है तो उसका मनन कैसे सत् हो—वैसे ही यह जीव का रूप-अवलोक भी मिथ्या है और भ्रान्ति से सत्य जान पड़ता है। जैसे स्वप्नसृष्टि, संकल्प और मनोराज्य का नगर मिथ्या है और कथा का वृत्तान्त अनहोता ही भ्रान्ति से प्रत्यक्ष लगता है, वैसे ही यह जगत् भ्रान्ति से सत्य लगता है—वास्तव में कुछ नहीं; पर संकल्पविलास में बना देख पड़ता है।
हे राम ! जिस प्रकार मुझको सृष्टि भासित हुई, सो सुनो। जब मुझमें पृथ्वी की धारणा हुई, तब पृथ्वी मुझको शरीर होकर भासित होने लगी; क्योंकि मैं विराट् आत्मा था। उस पृथ्वी पर वन, पर्वत, नदी, समुद्र, वृक्ष, फल, फूल, मनुष्य, पक्षी, देवता, ऋषीश्वर, दैत्य और नाग आदि जो स्थित हैं, अतः पृथ्वी मेरा शरीर हुई, पर्वत मेरे मुख हुए, सुमेरु आदि पर्वत मेरी भुजा हुई, सप्त समुद्र इन्द्रियाँ हुए, सब नदी मेरे कण्ठ की माला और वन मेरी रोमावली हुए। मरुस्थल की नदी मेरे ऊपर विस्तार को प्राप्त हुई और देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी और दैत्य इत्यादि मुझमें कीट-सदृश भासे—जैसे शरीर में जुआँ, लीख, आदिक होते हैं। किसी जगह मेरे ऊपर हल चलाते हैं और बीज बोते हैं, जिससे खेती उगती है और प्राणी अन्न खाते हैं। कहीं मुझे खोदते हैं, कहीं पूजा करते हैं। कहीं समुद्र स्थित हैं, कहीं नदी बहती है, कहीं राजा राज्य करते हैं और कहीं मेरे लिए झगड़ते मरते हैं। एक कहता है कि पृथ्वी मेरी है, दूसरा कहता है मेरी है। इस प्रकार मुझ पर ममता करके युद्ध करते हैं। कहीं हाथी चेष्टा करते हैं। कुछ लोग रुदन करते हैं, कुछ हास्य करते हैं। कहीं वृत्ति फैलाते हैं। कहीं सुगन्ध है, कहीं दुर्गन्ध है। कहीं नदियाँ बहती और क्षोभ को प्राप्त होती हैं, कहीं देवता और दैत्य मेरे ऊपर युद्ध करते हैं। कहीं शीतलता से जल मेरे ऊपर वरफ हो जाता है। इस प्रकार मैंने अपने ऊपर इष्ट-अनिष्ट स्थान देखा और राजसी, तामसी और सात्त्विकी जितनी जीवों की क्रिया