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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६०७

जैसे मरुस्थल की नदी मिथ्या है, वैसे ही ग्रहण करनेवाली वृत्ति मिथ्या है। जैसे संवेदन में जो मनन फुरता है, वह भी मिथ्या है—क्योंकि नदी मिथ्या है तो उसका मनन कैसे सत् हो—वैसे ही यह जीव का रूप-अवलोक भी मिथ्या है और भ्रान्ति से सत्य जान पड़ता है। जैसे स्वप्नसृष्टि, संकल्प और मनोराज्य का नगर मिथ्या है और कथा का वृत्तान्त अनहोता ही भ्रान्ति से प्रत्यक्ष लगता है, वैसे ही यह जगत् भ्रान्ति से सत्य लगता है—वास्तव में कुछ नहीं; पर संकल्पविलास में बना देख पड़ता है।

हे राम ! जिस प्रकार मुझको सृष्टि भासित हुई, सो सुनो। जब मुझमें पृथ्वी की धारणा हुई, तब पृथ्वी मुझको शरीर होकर भासित होने लगी; क्योंकि मैं विराट् आत्मा था। उस पृथ्वी पर वन, पर्वत, नदी, समुद्र, वृक्ष, फल, फूल, मनुष्य, पक्षी, देवता, ऋषीश्वर, दैत्य और नाग आदि जो स्थित हैं, अतः पृथ्वी मेरा शरीर हुई, पर्वत मेरे मुख हुए, सुमेरु आदि पर्वत मेरी भुजा हुई, सप्त समुद्र इन्द्रियाँ हुए, सब नदी मेरे कण्ठ की माला और वन मेरी रोमावली हुए। मरुस्थल की नदी मेरे ऊपर विस्तार को प्राप्त हुई और देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी और दैत्य इत्यादि मुझमें कीट-सदृश भासे—जैसे शरीर में जुआँ, लीख, आदिक होते हैं। किसी जगह मेरे ऊपर हल चलाते हैं और बीज बोते हैं, जिससे खेती उगती है और प्राणी अन्न खाते हैं। कहीं मुझे खोदते हैं, कहीं पूजा करते हैं। कहीं समुद्र स्थित हैं, कहीं नदी बहती है, कहीं राजा राज्य करते हैं और कहीं मेरे लिए झगड़ते मरते हैं। एक कहता है कि पृथ्वी मेरी है, दूसरा कहता है मेरी है। इस प्रकार मुझ पर ममता करके युद्ध करते हैं। कहीं हाथी चेष्टा करते हैं। कुछ लोग रुदन करते हैं, कुछ हास्य करते हैं। कहीं वृत्ति फैलाते हैं। कहीं सुगन्ध है, कहीं दुर्गन्ध है। कहीं नदियाँ बहती और क्षोभ को प्राप्त होती हैं, कहीं देवता और दैत्य मेरे ऊपर युद्ध करते हैं। कहीं शीतलता से जल मेरे ऊपर वरफ हो जाता है। इस प्रकार मैंने अपने ऊपर इष्ट-अनिष्ट स्थान देखा और राजसी, तामसी और सात्त्विकी जितनी जीवों की क्रिया

६०८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

होती है उन सबका आधार में हुआ । पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशाओं की संज्ञा संवेदन फुरने से हुई है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ऽन्तरोगोपाख्याने पृथ्वीधातु- वर्णनन्नाम द्विशततमस्सर्गः ॥ २०० ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! तुमको जो धारणा से पृथ्वी का अनुभव हुआ और उसमें जगत् उत्पन्न हुआ, वह संकल्परूप था या मन से उपजा था अथवा आधिभौतिक था ? वशिष्ठ बोले, हे राम ! सब जगत् संकल्प-रूप है, पर आधिभौतिक की नाईं भासित होता है । वास्तव में केवल चिदाकाश अपने आपमें स्थित है । वह चिदाकाश मैं हूँ । मैं न कभी उपजा हूँ और न मेरा नाश होगा, सर्वदा मैं अद्वैत, अचैत्य, चिन्मात्र रूप हूँ । उसके संकल्प का नाम मन और आभास का नाम संकल्प है । ऊर्मी का नाम ब्रह्मा और इच्छा है । उसी में जगत् स्थित है । वह आकाशरूप है—बना कुछ नहीं । हे राम ! जिसको सत्य और असत्य कहते हो, वह शुभ-अशुभरूप जगत् मन में स्थित है, और सब आकार निराकार रूप हैं, भ्रान्ति से पिण्डाकार दिखते हैं । जैसे स्वप्न में जो शुभ-अशुभ पदार्थ दिखते हैं, वे निराकार हैं, पर भ्रान्ति से पिण्डाकार जान पड़ते हैं, वैसे ही वे जगत् भी निराकार है, पर भ्रम से पिण्डाकार लगते हैं और विचार करने से शून्य हो जाते हैं । जैसे मनोराज्य से आकार रचित है, वैसे ही मेरे आकार जानो—स्वरूप से कुछ नहीं उपजे । जैसे मृत्तिका से बालक नाना प्रकार की सेना रचते हैं और उस मृत्तिका के उनको भिन्न-भिन्न भाव निश्चय होते हैं, वैसे ही अद्वैत आत्मा में मन-रूपी बालक ने जगत् की कल्पना की है, वास्तव में कुछ नहीं, आत्म-तत्त्व सदा अपने आपमें स्थित है । जैसे मृगतृष्णा का जल ही नहीं तो उसमें डुबा किसे कहिये, वैसे ही मन आप आभासरूप है तो उसका रचा जगत् कैसे सत् हो ?

हे राम ! सब चिदाकाशरूप है—दूसरा कुछ नहीं बना । आत्मरूप आकाश में जो मनरूपी नीलता है, सो अविचार-सिद्ध है । विचार करने से नीलता कुछ वस्तु नहीं । जैसे दीपक के रहने से अन्धकार नहीं

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६०६

रहता, वैसे ही विचार किये से मन और मन की रचना जगत् नहीं रहता। मन का निर्वाण करना ही परमशान्ति है, और कोई उपाय नहीं। हे राम! जितने क्षोभ हैं, उनका कर्त्ता मन है। सम्पूर्ण शब्द-अर्थ की कल्पना मन से उठती है—मन का निर्वाण होने पर कोई नहीं रहती। राम ने पूछा, हे मुनीश्वर! आप अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुए सो कुछ और रूप भी हुए, अथवा नहीं हुए? वशिष्ठजी बोले, हे राम! आत्मरूपी जो जाग्रत् है, उसमें अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुआ। मैं चैतन्य था और जड़ की नाईं स्थित हुआ—वास्तव में मैं जगत् न था, केवल चिदाकाश था, जिसमें न कुछ नानात्व है, न अनानात्व है, न अस्ति है न नास्ति है, और अहं-त्वं-इदं का अभाव है। वह केवल परम आकाश है, जो आकाश से भी निर्मल चिदाकाश है, और जो है सो सब शब्द-ब्रह्म है। जगत् के होते भी वह अरूप है; क्योंकि कुछ आरम्भ परिणाम से नहीं बना—केवल आत्मा का चमत्कार है।

हे राम! जहाँ-जहाँ पदार्थसत्ता है, वहाँ-वहाँ जगत् वस्तु है। सर्वदा, सब प्रकार, सब पदार्थों का स्पन्दन ब्रह्म है। जहाँ ब्रह्मसत्ता है, वहाँ जगत् है। इस प्रकार मैंने अनन्त ब्रह्माण्ड को देखा। जब मैं अनन्त ब्रह्माण्ड की पृथ्वी होकर स्थित हुआ तो जब जल की धारणा की, तब जल-रूप होकर फैला। वृक्ष, धाम, फूल, गुच्छे डाल, तमाल और पत्तों में रस होकर स्थित हुआ। खम्भे में मैं ही बल हुआ और समुद्र हुआ, नदियों के प्रवाह होकर मैं ही बहने लगा और उनमें गड़गड़ शब्द करने लगा। तरङ्ग बुलबुले और फेन को फैलाकर विलास किया। ओस के कण होकर मैं ही स्थित हुआ। आकाश में मेघ होकर बरसता और प्राणियों को तृप्त करने लगा। उनमें रुधिर आदि रस होकर मैं ही स्थित हुआ और उनकी नाड़ियों में मथन करके आप ही प्रवेश किया। जैसी-जैसी नाड़ी होती है, वैसा-वैसा रस होकर मैं स्थित हुआ। सब नाड़ियों में रस, बीज, कफ, पित्त, मूत्र आदि मैं ही स्थित हुआ। सब प्राणियों की जिह्वा के अग्रभाग में रस होकर मैं स्थित

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हुआ। अपने का आप स्वाद ग्रहण करने लगा। हिमालय में बर्फ होकर स्थित हुआ। हे राम! मैं चैतन्य होकर जड़ की नाईं स्थित हुआ। बीज होकर मैंने ही अपने को उत्पन्न किया और प्रलय के मेघ होकर मैंने ही अपना नाश किया। इस प्रकार जल होकर स्थावर, जङ्गम सब जगत् में स्थित हुआ और सदा अपने आपमें स्थित होकर अपने स्वरूप को न त्यागा। जैसे स्वप्न में जगत् अनुभवरूप है और अनहोता भासित होता है, वैसे ही मैंने जलरूप होकर जगत् को धारण किया। हे राम! में नाना प्रकार के स्थानों में स्थित हुआ। फूलों की शय्या पर चिरकाल तक विश्राम करता रहा। गन्ध होकर फूलों में स्थित हुआ। मेघ होकर आकाश में विचरा और ऐसी वर्षा की कि पर्वतों पर वेग से प्रवाह चलने लगा। मैं कण-कण होकर समुद्र और नदी में विचरा। यह भावना चित्अणु में मुझको हुई।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ऽन्तर्गोपाख्याने जलरूपवर्णन-नाम द्विशताधिकप्रथमसर्गः ॥ २०१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! जल के अनन्तर मैंने तेज की भावना की, अर्थात तेज धारण किया. तब मुझमें इतने अङ्ग उदय हुए-चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि-और इनसे जगत् की क्रिया सिद्ध होने लगी। जैसे राजा के अङ्ग अनुचर और हरकारे होते हैं, वैसे ही तमरूपी चोर को दीपकरूपी हरकारे मारने लगे। में आकाशरूपी था, इससे मेरे कण्ठ में तारावलीरूपी माला पड़ी थी। सूर्य होकर मैं जल को सोखता और दशों दिशाओं को प्रकाश देता रहा। आकाश जो ऊँचाई के कारण श्याम भासित होता है, वह मेरे निकट प्रकाशमान होता था। सब जगत् में में ही फैल रहा था। जहाँ में रहता, वहाँ से तम का अभाव हो जाता। चन्द्रमा और सूर्यरूपी डब्बा है, जिसमें दिन-रात और कालसर्परूपी अनेक रत्न सर्वदा निकलते रहते हैं। राजसी, सात्त्विकी और तामसी क्रियारूपी कमलिनी का मैं सूर्य हुआ और सब देवताओं और पितरों को तृप्त करता रहा। यज्ञ की अग्नि और रत्न, मोती, मणि आदिक जो प्रकाशमान पदार्थ हैं, उनमें प्रकाश मैं ही

ॐ निर्वाण प्रकरण ॐ

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हुआ। प्राणों के भीतर मैं स्थित हुआ और प्राण-अपान के क्षोभ से अन्न को पचाने लगा। जैसे आत्मा के प्रकाश से रूप, अवलोक और मनस्कार प्रकाशित होते हैं, वैसे ही सब पदार्थ मेरे प्रकाश से प्रकाशित होने लगे, क्योंकि मैं तेजरूप था—मानों चैतन्यसत्ता का दूसरा भाई हूँ। जैसे सब पदार्थ आत्मा से सिद्ध होते हैं, वैसे ही मुझसे सिद्ध होने लगे। हे राम! राजाओं में तेज और सिद्धों में वीर्य मैं ही था। बलरूप होकर जगत् को मैं ही पुष्ट करता था। बड़वाग्नि की दाहकशक्ति होकर जगत् को मैं ही नष्ट करता था। तेजवानों में तेज और बलवानों में बल मैं ही था। तले भी मैं था, मध्य भी मैं ही था और चन्द्रमा सूर्य से रहित जो स्थान हैं, उनमें भी मैं ही था। मैं अग्निरूपी दीपक और चन्द्रमा-सूर्यरूपी नेत्रों से मध्यमण्डल में स्पष्ट देखता था।

हे राम! इस प्रकार मैं तेजरूप होकर भीतर-बाहर सब स्थावर-जङ्गम पदार्थों में स्थित हुआ, पर जब बोधदृष्टि से देखता, तब सब आत्मा ही का भान होता और जब अन्तवाहक दृष्टि से देखता तब अपने को विराटरूप जानता कि सब जगत् में मैं ही फैल रहा हूँ और सब पदार्थ मेरे ही अङ्ग हैं। निदान तेजवानों में तेज और क्रोधवानों में क्रोध, यतियों में यती और अजित मैं हुआ। सब ओर मेरी ही जय है; क्योंकि जय उसकी होती है, जिसमें बल और तेज होता है—सो बल में हूँ और तेज भी मैं हूँ, इससे मेरी जय है। हे राम! सुवर्ण और रत्नमणि में जो प्रकाश और रूप है, वह मैं हुआ। राम ने पूछा, हे भगवन्! इस प्रकार जो आप जगत् की क्रिया अनुभव करने लगे कि जलरूप होकर अग्नि को बुझाया और अग्नि होकर जल को जलाया, ये क्रियाएँ जो तुम्हारे ऊपर इष्ट-अनिष्ट से होती रहीं, उनको तुमने सुख-दुःख के साथ अनुभव किया या नहीं किया? यह मेरे बोध के लिए कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! जैसे चैतन्य पुरुष स्वप्न में पर्वत, वृक्ष, देह, इन्द्रियाँ और नाना प्रकार के जड़ पदार्थ देखता है, जो वास्तव में उनमें नहीं हैं, केवल अनुभवरूप हैं, परन्तु निद्रादोष से वे उन्हें द्वैत की नाईं जानते हैं, और उनका राग-द्वेष अपने में मानते हैं—यथार्थ में द्रष्टा ही दृश्यरूप

६१२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

होकर स्थित होता है, परन्तु निद्रादोष में नहीं जान सकता, और जब जागता है, तब स्वप्न की सब सृष्टि को अपना रूप ही जानता है—वैसे ही यह जगत् अपने स्वरूप में नहीं है। जब बोधस्वरूप में जागोगे तब पदार्थ भावना जाती रहेगी और सब जगत् बोधस्वरूप प्रतीत होगा।

हे राम ! जिस पुरुष को देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित अखण्ड मत्ता उदय हुई है, उसको ज्ञानी कहते हैं। जब यह पुरुष परमात्मा का अवलोकन करता है, तब सब जगत् आत्मस्वरूप ही भासित होता है। जिस पुरुष को स्वप्न की सृष्टि में पूर्व का स्वरूप नहीं भूला, उसको अन्तवाहक कहते हैं। उसको पत्थर, जल और अग्नि में प्रवेश करने से भी खेद नहीं होता। हे राम ! मैं जो आकाश में उड़ता फिरा और आकाश को भी नाँघकर ब्रह्माण्ड के खप्पर पर फिरा हूँ सो अन्तवाहक शरीर से ही फिरा हूँ। जिसको अन्तवाहक शरीर प्राप्त होता है, उसको कोई आवरण नहीं रोक सकता, क्योंकि सब उसके अङ्ग होते हैं। मुझको शुद्ध आत्मा में स्वप्न हुआ था पर पहले का स्वरूप नहीं भूला, इससे सब जगत् मुझको अपना स्वरूप ही भासित होता रहा। अपने संकल्प में कल्पित अपने ही अङ्ग भासित होते थे। जैसे कोई मनोराज्य में अग्नि का समुद्र रचे और उसमें स्नान करे तो वह भी होता है; क्योंकि उसको खेद नहीं होता, सब अपने संकल्प में ही उसको भासित होते हैं। अन्तवाहक शरीर से विराट् सबका अपना रूप देखता है। वैसे ही सब जगत् मुझको अपना रूप भासित होता था, तो खेद कैसे हो ? स्वप्न देखनेवाला स्वप्न में पर्वत, नदियाँ और अग्नि देखता है, सो वही रूप है, और आप भी एक आकार धारण करके बन जाता है और पहले का स्वरूप उसकी परिच्छिन्नता में भूल जाता है और राग-द्वेष से जलता है। मैंने तत्त्वरूप बन अपने को जडरूप देखा और चैतन्यरूप भी देखा। इस प्रकार मुझको अपना स्वरूप न भूला। तब मैं विराट्‌रूप हो सबको अपना अङ्ग ही देखता रहा, इससे मुझे खेद कैसे होता ? खेद तब होता है, जब अपना स्वरूप भूलता है और परिच्छिन्न सा बन जाता है; पर मैं तो बोधवान् रहा कि मैंने

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६१३

स्पन्दन से सब रूप धारण किये हैं । हे राम ! जिसको यह निश्चय है, उसको दुःख कहाँ ? सुखदुःखरूप जो पदार्थ हैं, वे मैंने अपने में ऐसे देखे, जैसे आईने में प्रतिबिम्ब पड़ता है । जिसको यह दृष्टि हो, उसको दुःख कहाँ है ?

हे राम ! जिसको अन्तवाहक शक्ति प्राप्त होती है, वह पाताल और आकाश में जाने को समर्थ होता है और जहाँ प्रवेश किया चाहे वहाँ जा सकता है, क्योंकि सृष्टि संकल्पमात्र है । हे राम ! और कुछ सृष्टि नहीं बनी । आत्मा का किञ्चन ही सृष्टिरूप होकर भासित होता है । हे राम ! यह सब सृष्टि ब्रह्मस्वरूप है । मुझको तो सदा ऐसी ही भासती है । जब तुम जागोगे, तब तुमको भी ऐसी ही भासित होगी । तुम भी अब जागे हो । उस प्रकार मैं अग्नि होकर स्थित हुआ कि जिसकी शिखा से कालख निकलती थी । प्रकाश में ही हुआ और अपने चित्तस्वरूप अनुभव में मुझको जगत् भासित हो रहा था, उसमें मैं स्थित हुआ । अन्धकार और उलूकादि भी मेरे प्रकाश में प्रकाश पाते हैं और भावरूप पदार्थ भी मैंने अपने में जाने क्योंकि भावरूप पदार्थ तब भासित होते हैं, जब उनका रूप होता है । सो रूपवान पदार्थ में ही था, इस कारण सब मुझ ही में सिद्ध होते थे । इस प्रकार मुझको यह भावना हुई ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणेऽन्तरुपाख्याने चिद्रूप-वर्णनन्नामद्विशताधिकद्वितीयसर्गः ॥ २०२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! फिर मैंने पवन की धारणा का अभ्यास किया, तब पवनरूप होकर विचरने लगा और कमल के फूलों और वृक्षों को हिलाने लगा । तारों और नक्षत्रों का आधारभूत हुआ और वे मेरे आधार पर फिरने लगे । चन्द्रमा और सूर्य को चलानेवाला भी मैं ही हुआ । समुद्र और नदियों के प्रवाह भी मेरी ही शक्ति से चलते रहे । मन का बड़ा वेग भी मैं ही हुआ प्राणियों के शरीरों में मेरा निवास हुआ । मैं ही प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान पञ्चरूप होकर स्थित हुआ और सब नाड़ियों में मेरा निवास हुआ । सब नाड़ियों

६१४ * योगवाशिष्ठ *

को अपना-अपना भाग रस में ही पहुँचाता रहा। हिलना, चलना, बोलना, लेना, देना, सब मुझ ही में सिद्ध होता था। निदान सब पदार्थों में स्पर्शशक्ति मैं ही हुआ और सब शब्द मुझ ही से सिद्ध होते थे। क्रियारूपी बूँद का मैं मेघ हुआ। आकाशरूपी गृह में मेरा निवास था और दशों दिशाएँ सब मुझ में ही फुरी थीं। देवताओं को गन्ध से मैं ही सुख देता था और दीपक को मैं ही प्रज्वलित करता था। पक्षियों में मेरा सदा निवास था। जैसे अग्नि में उष्णता रहती है, वैसे ही सब के सुखाने और हरियावल करनेवाला मैं ही हूँ। हे राम! इस प्रकार मैं पवन होकर स्थित हुआ, इसलिए रूप, अवलोक और मनस्कार सब पदार्थ में ही हुआ। चन्द्रमा, सूर्य, तारे, अग्नि, इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, वरुण, कुबेर और यम आदि का जगत होकर मैं ही स्थित हुआ। पञ्च-भूतों के भीतर और बाहर भी मैं था। प्राण-अपान के क्षोभ से दुःख होता है। मैं ही साकार-निराकाररूप हूँ। सब रक्त-पीत श्यामरङ्ग पदार्थ में ही हूँ। पञ्चभूत जो चितअणु में फुरे हैं, सो उर्मी का रूप है, जैसे स्वप्न की सृष्टि सब अपना ही रूप होती है, इतर कुछ नहीं होती। हाड़, मांस, पृथ्वी होकर भूतों में स्थित हुआ और वायुरूप प्राण, अग्निरूप समिधा और आकाशरूप अवकाश हुआ। इस प्रकार मैं सब में स्थित हुआ। मैं भी चैतन्य शरीर था और वे तत्त्व भी चैतन्य शरीर थे। जैसे स्वप्न में जगत आकाशरूप होता है, वैसे ही वे भी आकाशरूप हैं।

हे राम! सब कालों में सब प्रकार सब का सर्वात्मा स्थित है, दूसरा कुछ नहीं। आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, इससे भिन्न जानना भ्रान्तिमात्र है। यह दृष्टि ज्ञानवान् की है। पर जो असम्यक्दर्शी हैं, उनको भिन्न-भिन्न पदार्थ भासित होते हैं। इस प्रकार मैंने सम्पूर्ण जगत अपने में ही देखा। हे राम! मैं ब्रह्मरूप था, इससे उसमें जगत उत्पन्न होते दिखे। जो मैं ब्रह्म से इतर होता तो एक तृण भी न उत्पन्न होता। मैं जो ब्रह्मरूप था, इससे सृष्टि उत्पन्न होती है। हे राम! जब मैंने बोध-दृष्टि से देखा तब आत्मा से भिन्न कुछ न दीखा और जब आन्तवाहक दृष्टि से देखा तब स्पन्दन के कारण अणु-अणु में सृष्टि भासित हुई। जैसे

* निर्वाण प्रकरण * ६१५

जहाँ चन्दन का अणु होता है, वहाँ सुगन्ध भी होती है; वैसे ही जहाँ-जहाँ तत्त्व के अणु हैं, वहाँ-वहाँ सृष्टि भी है। हे राम! एक अणु में अनन्त सृष्टि मुझको भासित हुई। जैसे एक पुरुष शयन करता है और उसको स्वप्न में सृष्टि दिखती है और फिर स्वप्न से स्वप्नान्तर की सृष्टि देखता है, तो एक ही जीव में बहुत भासते हैं; वैसे ही एक अणु में अनेक सृष्टि होती हैं। हे राम! जो सृष्टि है, वह आभासरूप है और आभास अधिष्ठान के आश्रित होता है। सबका अधिष्ठान ब्रह्मसत्ता है, जो देश और काल के परिच्छेद से रहित अखण्ड अद्वैतसत्ता है। इसी से कहा है कि अणु-अणु में सृष्टि है; क्योंकि कोई अणु भिन्न नहीं, ब्रह्मसत्ता ही है। जो सब ब्रह्म है तो सृष्टि भी ब्रह्मरूप है, इससे सब ब्रह्म ही जानो। ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। जैसे वायु और स्पन्दन में भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में भेद नहीं है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे ब्रह्मजगदेकताप्रतिपादनं नाम द्विशताधिकतृतीयसर्गः ॥ २०३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! इस प्रकार जब मुझमें सृष्टि फुरी, तब मैं उनके भ्रम को त्याग और संकल्प को खींचकर अन्तर्मुख हुआ और अपनी जो कुटी थी, उसकी ओर आया। जब मैंने कुटी देखी तो उसमें एक पुरुष बैठा मुझको देख पड़ा। तब मैंने विचार किया कि यह कौन है, मेरा शरीर कहाँ है? मैंने विचार करके देखा कि यह कोई महासिद्ध है। मेरा शरीर इसने मृतक जानकर गिरा दिया है और आप पद्मासन बाँधकर, दोनों टखने पुट्ठों के ऊपर किये और शिर और ग्रीवा सीधी किये बैठा है। दोनों हाथ कंधों पर ऊपर किये है, मानों कमल फूल है या मानों अन्तर का प्रकाश बाहर उदय हुआ है और नेत्र मूँदे है, मानों सब वृत्ति खींच ली है। हे राम! इस प्रकार समाधि लगाकर पद्मासन बाँधे वह आत्मपद में स्थिर बैठा था। उसका मुख सूर्य की भाँति प्रकाशता था। जैसे धुएँ से रहित अग्नि प्रकाशित होता है, वैसे ही वह सिद्ध प्रकाशमान था। इस प्रकार मैंने उसको आत्मपद में स्थित देखा। जैसे दीपक निर्वाण में स्थिर होता है, वैसे ही उसे स्थिर देखकर

६१६ ☸ योगवासिष्ठ ☸

मैंने विचार किया कि इसे यहीं बैठा रहने दूँ और मैं अपने स्थान सप्तर्षियों में जाऊँ। इस प्रकार कुटी के संकल्प को त्यागकर में उड़ा। उड़ते हुए मार्ग में मेरे मन में आया कि देखूँ अब उस सिद्ध की क्या दशा है। फिर उलटकर देखा तो कुटी सहित सिद्ध वहाँ नहीं था; क्योंकि कुटी उसकी आधारभूत थी, सो मेरे संकल्प में स्थित थी। जब मेरा संकल्प निर्वाण हो गया, तब वह कुटी गिर पड़ी। तब उसमें वह सिद्ध कैसे रहे? वह भी गिर पड़ा। हे राम! उसको गिरता देखकर में भी उसके पीछे हुआ कि उसका कौतुक देखूँ। निदान आगे वह और पीछे-पीछे में चला। परन्तु में स्वाधीन और वह पराधीन चला जाता था। जैसे मेघ से बूँद गिरती है तो नहीं ठहरती, वैसे ही वह चला और सप्तद्वीप के पार दशसहस्र योजन स्वर्ण की जो धरती है, उस पर आ पड़ा और उसी प्रकार पद्मासन बाँधे हुए शीश और ग्रीवा उसी प्रकार सम ठहरे रहे, क्योंकि उसके शीश और ग्रीवा ऊपर को थे।

हे राम! शरीर प्राण से हिलता चलता है। जब प्राण ठहर जाते हैं, तब शरीर नहीं हिलता चलता। इस कारण उसका शरीर सम ही रहा और जैसे कुटी में बैठा था, उसी प्रकार आसन से पृथ्वी पर आ पड़ा। तब मेरे मन में आया कि इसके साथ कुछ चर्चा भी करनी चाहिए। परन्तु यह तो समाधि में स्थित है, इसलिए प्रथम किसी प्रकार इसको जगाऊँ। हे राम! ऐसा विचार करके में मेघ होकर उसके शिर पर वर्षा करने लगा और बड़ा शब्द किया, जिससे पहाड़ फटने लगे। पर उस शब्द और वर्षा से भी वह न जागा। फिर जब मैं ओले हाँककर उसके ऊपर बरसने लगा—जैसे पत्थर की वर्षा होती है तब ऐसी वर्षा होने से वह नेत्र खोलकर देखने लगा—जैसे पर्वत पर मोर मेघ को देखने लगे। मैं उसके आगे आकर उपस्थित हुआ। तब उसने समाधि खोली और उसकी प्राण-इन्द्रियाँ अपने स्थान में आईं। हे राम! उसने जब मुझको अपने आगे देखा, तब में अद्वैतभाव को त्यागकर बोला, हे साधो! तू कौन है, कहाँ स्थित है, क्या करता था और किस निमित्त कुटी में स्थित था? सिद्ध बोले, हे मुनीश्वर! मैं अपने प्रकृतभाव में

💥 निर्वाण प्रकरण 💥 ६१७

स्थित हूँ और सब कुछ कहूँगा। परन्तु जल्दी मत कर—मैं स्मरण करके कहता हूँ। हे राम! मुझसे इस प्रकार कहकर वह स्मरण करने लगा और फिर स्मरण करके बोला—हे वशिष्ठजी! मुझको क्षमा करो, क्योंकि सन्तों का स्वभाव शान्त होता है। मुझसे तुम्हारी बड़ी अवज्ञा हुई है, परन्तु तुम क्षमा करो—मेरा तुमको नमस्कार है।

हे राम! इस प्रकार नमस्कार करके उसने निर्मल आनन्द उपजाने-वाले ये वचन कहे—हे मुनीश्वर! संसार एक नदी है, जिसका बड़ा प्रवाह है और वह कभी नहीं सूखता। चित्तरूपी समुद्र से यह प्रवाह निकलता है। जन्म-मरण इसके दोनों किनारे हैं। रागद्वेष ही इसमें तरङ्ग हैं। भोग की तृष्णा इसमें आवर्त है—उसमें मैंने बड़ा दुःख पाया है। हे मुनीश्वर! अपने सुख के निमित्त देवों के स्थानों में भी मैं गया, दिव्यभोग भोगे और स्पर्श आदि जो भोग हैं, वे भी सब मैंने भोगे। परन्तु मुझको शान्ति नहीं प्राप्त हुई। जिस सुख को मैं चाहता था, वह न पाया। जैसे पपीहा मेघ की बूँद चाहता है और मरुस्थल की भूमि में उसको शान्ति नहीं मिलती, वैसे ही मुझको विषयों के सुख में शान्ति न हुई। हे मुनीश्वर! इस जगत् को असार जानकर मेरा चित्त विरक्त हुआ है कि इतने काल तक मैंने भोग भोगे, परन्तु मुझको शान्ति न हुई। इनको असत् जानकर मैं फिरा और विचार किया कि जो सार हो, उसे अपनाऊँ। तब मैंने जाना कि सार अपना अनुभवरूप ज्ञानसंवित् ही है—इससे मैं उसी में स्थित हुआ हूँ। हे मुनीश्वर! जितने विषय हैं, वे विषरूप हैं। विष के पान से मृत्यु ही होती है। स्त्री, धन आदि सुख मोह और दुःख देनेवाले हैं। ऐसा कौन पुरुष है, जो इनमें पड़कर सावधान रहता है? ये तो स्वरूप को भुलानेवाले हैं। हे मुनी-श्वर! देहरूपी एक नदी है, जिसमें बुद्धिरूपी एक मछली रहती है। जब वह सिर बाहर निकालती है अर्थात् इच्छा करती है, तब भोगरूपी बगला इसको खा जाता है, अर्थात् आत्ममार्ग से भ्रष्ट करता है। ये जो भोगरूपी चोर हैं, इनका संग जब जीव करता है, तब वे इसको लूट लेते हैं, अर्थात् आत्मज्ञान से शून्य करते हैं। और जब यह आत्मज्ञान से

६२ = ✻ योगवाशिष्ठ ✻

शून्य होता है, तब जन्मों का अन्त नहीं आता—अनेक शरीर पाता है। जैसे चाक पर चढ़ी हुई मृत्तिका अनेक बर्तनों के आकार धारण करती है, वैसे ही आत्मज्ञान से रहित जीव अनेक शरीर धारण करता है। पर अब मैं जागा हूँ। मुझको ये अब नहीं लूट सकते।

हे मुनीश्वर ! भोगरूपी बड़े नाग हैं। और जो नागों के डसने से शरीर मृतक होते हैं, पर विषयरूपी सर्प के फूत्कार से ही जीव मृतक होता है अर्थात् इच्छा करने से ही आत्मपद से शून्य हो जाता है। जब जीव का विषयों की इच्छा से सम्बन्ध होता है, तब क्षण-क्षण में उसका निरादर होता है—जैसे कदली वन से निकला और महावत के वश में आया हाथी निरादर पाता है। हे मुनीश्वर ! जिस शरीर के लिए जीव विषयों की इच्छा करता है, वह शरीर भी नाशवान् है। इसमें अहंप्रतीति करना परम आपदा का और अहंप्रतीति न करना परमसुख का कारण है। जैसे सर्प के मुख में पड़ा हुआ मेढक मच्छर खाने की इच्छा करता है, वह महामूर्ख है। किसी क्षण काल इसको ग्रस लेगा। इसमें भोगों की इच्छा करना व्यर्थ है और दुःख का कारण है। हे मुनीश्वर ! जब बाल अवस्था व्यतीत होती है, तब युवा अवस्था आती है और युवा के उपरान्त जब वृद्धावस्था आती है, तब शरीर जर्जर हो जाता है। जैसे बसन्तऋतु की मञ्जरी जेठ-आषाढ़ में सूख जाती है, वैसे ही वृद्धावस्था में शरीर जर्जर होकर दुःख पाता है। बाल अवस्था में जीव क्रीड़ा में मग्न होता है। यौवन अवस्था में कामादिक का सेवन करता और वृद्ध होकर चिन्ता में मग्न रहता है। इस प्रकार जब ये तीनों अवस्था व्यतीत होती हैं, तब मर जाता है। जीवों की आयु इस प्रकार व्यतीत होती है और वे परमपद से वंचित रहते हैं। हे मुनीश्वर ! यह आयु बिजली की चमक की तरह है। इस क्षणभंगुर अवस्था में जो भोगों की वाञ्छा करते हैं, वे महादुःख को प्राप्त होते हैं। इनमें सुख देखकर जो कोई कहे कि मैं स्वस्थ रहूँगा तो कभी न होगा जैसे जल के तरङ्गों में बैठकर कोई पार हुआ चाहे तो नहीं हो सकता—अवश्य मरेगा—वैसे ही विषय-भोगों से शान्ति-सुख नहीं मिलता। जैसे कोई तेज धूप में

⚙️ निर्वाण प्रकरण

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तपा हुआ सर्प के फन की छाया के नीचे बैठकर सुख की वाञ्छा करे तो सुख न पावेगा, पर जब आत्मज्ञानरूपी वृक्ष की छाया के नीचे बैठे, तब शान्त और सुखी होगा। जिन पुरुषों ने विषयों का सेवन किया है, वे परम दुःख पाते हैं और जिन्होंने आत्मपद का सेवन किया है, वे परमानन्द को प्राप्त होते हैं। जैसे नदी का प्रवाह नीचे जाता है, वैसे ही मूर्ख का मन विषयों की ओर दौड़ता है। यह संसार मायामात्र है और इसमें शान्ति कभी नहीं प्राप्त होती। जैसे मरुस्थल की नदी के जल से प्यास नहीं मिटती, वैसे ही विषयभोगों से शान्ति कभी नहीं होती। जो आत्मपद से विमुख हैं, वे विषयों की ओर दौड़ते हैं और जो आत्मपद में स्थित हैं, वे विषयों की ओर नहीं दौड़ते। जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजकर नष्ट होते हैं और नदी का वेग समुद्र की ओर गमन करता है, पर पत्थर की शिला गमन नहीं करती, वैसे ही भोगरूपी समुद्र की ओर अज्ञानी दौड़ता है, ज्ञानी नहीं जाता। हे मुनीश्वर ! कमल में सुगन्ध तभी तक होती है, जब तक सर्प के मुख की वायु नहीं लगी। वैसे ही बुद्धि में विचार तभी तक है, जब तक चित्तरूपी सर्प को भोग और इच्छारूपी वायु नहीं लगी। जब यह लगती है, तब विचाररूपी सुगन्ध ले जाती है और विषरूपी तृष्णा को छोड़ जाती है। बाण निशाने की ओर तब दौड़ता है, जब धनुष और चिल्ले को त्यागता है और त्यागने पर फिर नहीं मिलता। वैसे ही आत्मारूपी चिल्ले से जब चित्तरूपी बाण छूटता है, तब भोगरूपी निशाने की ओर दौड़ता है और जब जाता है, तब फिर आना कठिन होता है—अर्थात् अन्तर्मुख होना कठिन होता है।

हे मुनीश्वर ! यह आश्चर्य है कि जो पदार्थ सुखदायक नहीं हैं, उनकी ओर चित्त बड़ा यत्न करता है, पर तो भी वे सिद्ध नहीं होते, पर वे अयत्नसिद्ध आत्मपद को त्याग देते हैं। जिनको यह जीव सुख जानता है, वे सब दुःख के स्थान हैं। जिस अपने होने को यह भला जानता है, वह अनर्थ का कारण है। जिस देह को जीव सुखरूप जानता है, वह सब रोगों का मूल है। जिसको यह भोग जानता है, वे इसको

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दुःख देनेवाले परमरोग हैं, और जिनको यह सत्य जानता है, वे सब मिथ्या हैं। जिनको यह स्थिर जानता है, वे स्थिर नहीं चलरूप हैं, जिनको यह सम जानता है, वे सब विषम हैं। जिनको बान्धव जानता है, वे सब अबान्धव और दृढ़ बन्धनरूप हैं। जिसको यह सुख देनेवाली स्त्री जानता है, वह सर्पिणी परम विष उगलनेवाली है। उसका काटा मर जाता है, फिर नहीं जीता, अर्थात् आत्मपद में स्थित नहीं होता। हे मुनीश्वर ! मैं देह को परम आपदा का कारण जानता हूँ। इससे निवृत्त होने पर जीव परमपद को प्राप्त होता है। जिन पुत्र, धन आदि को यह जीव संपदा जानता है, वे परम दुःखरूप आपदा है; इनमें सुख कदापि नहीं। यह बात मैं सुनकर नहीं कहता; मैंने देखकर विचार किया है; विचार करके अनुभव किया है और अनुभव करके कहा है कि यह संसार मायामात्र है। बड़े-बड़े स्थानों में भी मैं गया हूँ, परन्तु सार पदार्थ मुझको कोई नहीं देख पड़ा। स्वर्ग में नन्दनवन आदि काष्ठरूप ही दीखे। मृत्युलोक में आकर देखा तो पञ्चभूत ही देखे; शरीर में रक्त, मांस, हाड़, मूत्र आदि देखे। ऐसे शरीर में जो अहंप्रत्यय करते हैं, उनको मैं धिक्कार देता हूँ। शरीर की आयुष्य ऐसी है, जैसे दोनों हाथों में जल लीजिए तो बह जाता है अथवा जैसे जल में तरङ्ग बुलबुले उपजकर नष्ट होते हैं या बिजली की चमक होकर नष्ट हो जाती है। जो ऐसे शरीर को पाकर सुख की तृष्णा करते हैं वे महामूर्ख हैं। बाल अवस्था तरङ्ग की नाईं नष्ट हो जाती है। यौवन अवस्था बिजली की चमक सी छिप जाती है। वृद्ध अवस्था में केश श्वेत हो जाते हैं और दाँत घिसकर गिर पड़ते हैं। जैसे नीचे स्थान में जल स्थिर हो जाता है, वैसे ही सब रोग वृद्धावस्था में घेर लेते हैं और तृष्णा दिन-दिन बढ़ती जाती है।

हे मुनीश्वर ! उस समय सब पदार्थ जर्जर हो जाते हैं और तृष्णा जवान होती है—जैसे वसन्तऋतु की मञ्जरी बढ़ती जाती है—और जो सुखभोग प्राप्त होकर बिछुड़ जाते हैं, उनका दुःख होता है। हे मुनीश्वर ! इस प्रकार इनको असत्य जानकर मैं स्वरूप में स्थित हुआ हूँ।

✵ निर्वाण प्रकरण ✵ ६२१

यदि पाँचों इन्द्रियों के इष्ट विषय बड़ी उत्तम मूर्ति रखकर उपस्थित हों तो भी मुझको आकृष्ट नहीं कर सकते । जैसे मूर्ति की लिखी कमलिनी भौंरे को नहीं खींच सकती, वैसे ही मुझ सरीखों को विषय नहीं चलायमान कर सकते । हे मुनीश्वर ! तुम्हारा शरीर मैंने अवज्ञा करके डाल दिया है—विचार से नहीं फेंका । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक जो त्रिकालज्ञ हैं, वे भी इस चर्मदृष्टि से नहीं देख सकते; जब विचार से देखते हैं तभी जानते हैं । इस कारण विचार बिना मैंने तुम्हारा शरीर फेंक दिया था । अब तुम क्षमा करो । योगेश्वर विचार से ही भूत, भविष्यत् और वर्तमान को जानता है । इन नेत्रों से तो वही जाना जाता है कि जो अग्रभाग में होता है, विशेष नहीं जाना जाता, इस कारण मुझसे तुम्हारा शरीर गिरा है ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे आकाशकुटीसिद्धिसमाधियोगवर्णनन्नाम द्विशताधिकचतुर्थसर्गः ॥२०४॥

वशिष्ठजी बोले, हे साधु ! मैंने भी तुझे विचार बिना गिराया है कि विचार बिना मैं उठ गया था । यह कुटी मेरे अन्तवाहक संकल्प में थी सो मैं अपने स्थान को चला, इस कारण यह कुटी गिर पड़ी और तुम भी गिर पड़े । जो बीत गई सो भली हुई, उसकी क्या चिन्ता कीजिए ? ज्ञानवान् बीती की चिन्ता नहीं करते । जो होनी थी, सो भली हुई । हे साधु ! अब जहाँ तुम्हें जाना है, वहाँ जाओ और हम भी जाते हैं । हे राम ! इस प्रकार चर्चा करके हम दोनों आकाशमार्ग को उड़े—जैसे पक्षी उड़ते हैं—और परस्पर नमस्कार करके अलग हो गये । वह अपने स्थान को गया और अपने स्थान को चलकर बहुतेरे स्थान देखता गया, परन्तु मुझको कोई न जानता था । हे राम ! यह सम्पूर्ण वृत्तान्त जो मैंने तुमसे कहा है, उसे तुम विचारो । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने जो सिद्ध के साथ समागम किया था तो आकाशमार्ग में कैसे शरीर से किया ? आपका पाञ्चभौतिक शरीर तो पृथ्वी पर पड़ा था और पृथ्वी में अणुरूप हो गया था, फिर आप किस शरीर से विचरे ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अन्तवाहक शरीर से मैं विचरता फिरा था और

६२२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

उर्मी में सिद्धों, देवताओं, इन्द्र, वरुण और कुबेर के स्थानों में फिरा हूँ। परन्तु मुझे कोई न देखता था, मैं सबको देखता था। संकल्परचित पुरुष से मेरा व्यवहार हुआ था और किससे कहूँ ?

राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! अन्तवाहक शरीर तो इन्द्रियों का विषय नहीं है, फिर सिद्ध से आपने चर्चा कैसे की और उसने आपको कैसे देखा ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार जो तुम कहते हो सो सुनो। सिद्ध को मैं इसलिए देख पड़ा कि मेरा संकल्प सत्य था। मुझे यह स्फुरणा हुआ कि सिद्ध मुझको देखे और मुझसे चर्चा करे इससे उसने मुझको देखा और उसका संकल्प भी मुझमें आया तब जाना। जो दोनों सिद्ध हों और उनका संकल्प भिन्न-भिन्न हो तो एक दूसरे के संकल्प को नहीं जानते, परन्तु किसी का विशेष संकल्प हो तो वह दूसरे के संकल्प को जानता है। इससे यद्यपि उसका संकल्प मेरे देखने को न था, पर मेरा दृढ़ संकल्प था, इससे मैं उसके संकल्प को खींचकर अपना ओर ले आया। जो बली होता है, उसी की जय होती है— इससे उसने मुझको देखा। हे राम ! जो अन्तवाहक में स्थित होता है, उसको तीनों कालों का ज्ञान होता है, परन्तु व्यवहार में लगे तो उसे भूल जाता है, और जो वर्तमान पदार्थ होता है, उर्मी का ज्ञान होता है। इसी कारण उसने मेरा शरीर डाल दिया था; क्योंकि वह समाधि के व्यवहार में लगा था, और मेरे संकल्प से वह कुटी भी तब गिरी थी, जब मैं अपने स्थान के व्यवहार को ऐसा चिन्तन करके चला था। जो मैं चिन्तन में न होता, अन्तवाहक शरीर में होता और उस कुटी का भविष्यत् विचार उस संकल्प को रहने देता तो वह सिद्ध न गिरता। पर मैं तो और ही व्यवहार में लगा था, इससे अन्तवाहक शरीर भूल गया, जिससे वह कुटी गिर पड़ी और सिद्ध भी गिर पड़ा।

हे राम ! इस प्रकार सिद्ध गिरा। उसमें चर्चा हुई, तब मैं वहाँ से चला और अन्तवाहक शरीर में आकाशमार्ग में फिरने लगा। सिद्धों के समूह और देवता, विद्याधर, गन्धर्व, किन्नर, ऋषि, मुनि, वरुण, कुबेर, इन्द्र, यम आदि सबके स्थान देखे; परन्तु मुझको किसी ने न

⚙️ निर्वाण प्रकरण ६२३

देखा। मैं बड़े-बड़े शब्द करता कि किसी प्रकार कोई शब्द सुने और मुझको देखे, परन्तु मेरा शब्द कोई न सुनता और न कोई मुझको देख पाता। जैसे स्वप्न में कोई शब्द करे तो उसका शब्द कोई जाग्रत मनुष्य नहीं सुनता, और जैसे न संकल्पवाला दूसरे के सृष्टिव्यवहार का शब्द नहीं जानता, वैसे ही मुझको कोई न जानता था। हे राम! इस प्रकार में प्रथम आकाश में पिशाच की नाईं विचरा। फिर दैत्यों के स्थानों में विचरा। मैं सबको देखता था, पर मुझको कोई न देख पाता था। राम ने पूछा, हे भगवन्! पिशाच का शरीर, जाति और क्रिया कैसी होती है? उनके रहने का स्थान कौन है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! पिशाच की कथा से कुछ प्रयोजन न था, तथापि तुमने प्रसंगवश पूछा है, इसमें मैं कहता हूँ। पिशाच का आकार नहीं होता। वे जो जो रूप रखते हैं, सो सुनो। कई तो आकाश की नाईं शून्य होते हैं और परछाहीं की नाईं डराते हैं। कई शूकर और कई काकरूप रखकर स्थित होते हैं। ऐसे रूप रख वे विचरते हैं और सबको देखते और जानते हैं, पर उनको कोई नहीं जानता। शीत-उष्ण से भी वे दुःख पाते हैं और इच्छा, द्वेष, लोभ, मान, मोह, क्रोध आदि विकार उनमें भी रहते हैं। शीतल जल और अच्छे भोजन की भी वे इच्छा करते हैं और नगरों, वृक्षों और दुर्गन्धपूर्ण स्थानों में भी रहते हैं। कहीं सियार होकर दिखाई देते हैं, और कहीं श्वान होकर दिखते हैं। मन में भी प्रवेश करते हैं और मन्त्र, पाठ, दान आदि से जो वश होते हैं, वह भी अपनी अपनी वासना के अनुसार होते हैं। इनमें भी उत्तम, मध्यम और नीच होते हैं। जो उत्तम हैं वे देवताओं के स्थानों में, मध्यम मनुष्यों के स्थानों में और नीच नरकों में रहते हैं। इनकी उत्पत्ति अचैत्य चिन्मात्र से, जो दृश्य से रहित शुद्ध चैतन्य है, हुई है।

हे राम! सबका अपना रूप वही चैतन्यसत्ता कल्पवृक्ष की नाईं है। उसमें जैसी-जैसी वासना होती है, वैसा ही वैसा पदार्थ होकर भासित होता है। हे राम न कहीं पिशाच है और न जगत्! ब्रह्मसत्ता ही ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। शुद्ध आत्मत्वमात्र में किञ्चन 'अहं'

६२४ ✵ योगवाशिष्ठ ✵

होकर फुरा है। उसी को जीव कहते हैं। उस अहं की दृढ़ता में मन फुरा है। वह मन ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है। उस ब्रह्मा ने मनोराज्य में आगे जगत् उत्पन्न किया है और ब्रह्मा ही जगतरूप होकर स्थित हुआ है। वह ब्रह्मा ब्रह्म में स्थित है। हे राम! ब्रह्मा का शरीर अन्त-वाहक और केवल आकाशरूप है और उसके दृढ़ संकल्प में आधिभौतिक जगत् दृढ़ हुआ है—उसी मन से और मन हुआ है। हे राम! जैसे ब्रह्मा का शरीर अन्तवाहक है, वैसे ही सबका शरीर अन्तवाहक है। परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक भासित होता है और सब मनरूप है परन्तु दीर्घकाल का स्वप्न है। वह जाग्रत होकर स्थित हुआ है, इससे दृढ़ भासित होता है। जिनको शरीर में अहंकार है, उनको जगत् आधिभौतिक भासित होता है, और जो प्रबोधरूप हैं, उनको सब जगत् संकल्परूप है—वास्तव में कुछ उपजा नहीं। न तुम हो, न मैं हूँ, न ब्रह्मा है और न जगत् है—सभी ब्रह्मारूप हैं। जैसे आकाश और शून्यता में, अग्नि और उष्णता में, वायु और स्पन्द में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं है, ब्रह्मा और जगत् दोनों अज हैं। न ब्रह्मा ही उपजा है और न जगत् ही उपजा है—दोनों ब्रह्मारूप हैं। जो ब्रह्म से भिन्न दिखता है, वह भ्रान्तिमात्र है।

हे राम! पञ्चभूत और छठवाँ मन इनका नाम जगत् है। जबतक ये सत् उमग दिखते हैं, तबतक भ्रान्ति है और जब इनमें रहित केवल चैतन्य भासित हो, तब उसी का नाम परमपद है। हे राम! जब आत्म-पद में जागोगे, तब पञ्चभूत भी आत्मा से भिन्न न दिखेंगे। सबका अधिष्ठान चैतन्यसत्ता है। जबतक आत्मा का प्रमाद है, तबतक संसार-भ्रम न मिटेगा। सब जगत् निराकार संकल्पमात्र है, परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आकाश में स्थूलभूत दिखते हैं। ज्ञानकाल और अज्ञानकाल में जगत् उपजा नहीं, परन्तु अज्ञानी को दृढ़ भासित होता है। जैसे मनोराज्य में किसी ने नगर रचा हो तो वह उसी के हृदय में है और कहीं नहीं दिखता, वैसे ही जबतक जीव अज्ञाननिद्रा में सोया है, तब तक जगत् भासित होता है, पर जब जागेगा, तब आकाशरूप

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६२५

देखेगा। हे राम! अपना संकल्प अपने को नहीं बाँधता। जबतक स्वरूप का प्रमाद नहीं होता, तब तक ब्रह्मा का संकल्प ब्रह्मा को नहीं बन्धन करता। स्वरूप भी अहंप्रत्यय से तो संकल्परूप है। दूसरी कुछ वस्तु सत्य नहीं-आत्मा ही है। वास्तव में न जगत् का आदि है, न मध्य है और न अन्त है। न जगत् का होना है और न अनहोना है-आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। हे राम! जब सर्वात्मा ही है, तब राग-द्वेष किसका हो? सब अपना रूप ही है। अपना रूप जो आत्मतत्त्व है उसका किञ्चन संवेदन फुरने से जगतरूप होकर स्थित हुआ है। जैसे किसी पुरुष ने मनोराज्य में एक स्थान रचा और उसमें भावना हुई तो वह आधिभौतिक भासित होने लग जाता है, वैसे ही यह जगत् भी ब्रह्मा का संकल्प है। चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, रुद्र, वरुण और कुबेर आदि सब संकल्परूप हैं, पर संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक भासित होते हैं। हे राम! आत्मारूपी एक तालाब है, जिसमें चैतन्यरूपी जल है, फुरन-रूपी कीचड़ है। उसमें चौदह प्रकार के भूतजातरूप मेढक रहते हैं। वे सब संकल्पमात्र हैं।

हे राम! आकाश में एक आकाशक्षेत्र है, जिसमें शिला उत्पन्न होती हैं। स्वर्गलोक और देवता बड़ी शिला हैं। एक उनमें उज्ज्वल शिला है, वह ज्ञानवान् है। मध्यम शिला मनुष्य है। नीच शिला तिर्यक् आदि योनि हैं। सो भी निर्बीज अर्थात कारण से रहित हैं। अद्वैत आत्मा सदा अपने आपमें स्थित है-कुछ उत्पन्न नहीं हुआ, परन्तु भ्रान्ति से भिन्न-भिन्न भासता है। जैसे फेन बुलबुले और तरङ्ग सब जलरूप हैं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मरूप है। जैसे स्वप्न और संकल्प की सृष्टि कारण बिना होती है, वैसे ही यह जगत् कारण बिना संकल्प से उत्पन्न हुआ है। जैसे ब्रह्मादिक हुए हैं, वैसे ही पिशाच भी प्रकट हुए हैं। हे राम! जैसा किञ्चन आत्मा में होता है, वैसा ही होकर दिखता है। वास्तव में पृथ्वी आदि तत्त्व कहीं नहीं हैं। न कहीं ब्रह्मा उपजा है, न कोई जगत् उपजा है, सब भ्रममात्र हैं। जितने शरीर दिखते हैं, वे सब निर्वपु हैं; चेतनता में फुरे हैं सब जीवों का आदि

६२६ ❈ योगवाशिष्ठ ❈

अन्तर्वाहक शरीर है । जैसे ब्रह्मा का अन्तर्वाहक शरीर था, वैसे ही सब जीवों का अन्तर्वाहक शरीर होता है, परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आधि-भौतिक भासित होता है ।

सब जीवों का अपना-अपना भिन्न-भिन्न संकल्प है । उसी के अनु-सार सब की अपनी-अपनी सृष्टि होती है । जो तुम कहो कि भिन्न-भिन्न हैं, तो जीव इकट्ठे क्यों दिखते हैं ? चाहिए तो यह कि अपनी-अपनी सृष्टि में हों ? तो इसका उत्तर यह है कि जैसे एक नगरस्वामी और नगर में जाय और एक नगरस्वामी और में आवे और दोनों जाकर इकट्ठे बैठें, वैसे ही सब जीव इकट्ठे दिखते हैं, पर उनके इकट्ठे होने पर भी इसकी सृष्टि को वह नहीं देखता और उसकी सृष्टि को यह नहीं देखता, जैसे स्वप्न में जो भिन्न-भिन्न भूतजात होते हैं, वे अनुभव में इकट्ठे दिखते हैं और एक अनुभव में भिन्न-भिन्न होते हैं, एक दूसरे की सृष्टि को नहीं जानते । जीव को अन्तर्वाहक भूल गया है, इससे आधिभौतिक दृढ़ हो रहा है । जैसा अनुभव में अभ्यास होता है, वैसा ही दिखता है । जहाँ पिशाच होता है, वहाँ अन्धकार भी होता है । जो मध्याह्न का सूर्य उदय हो और पिशाच आगे आवे तो अन्ध-कार हो जाता है, ऐसा तमरूप वह होता है । जैसे उलूकादिक को प्रकाश में अन्धकार होता है, वैसे ही अनेक सूर्यों का प्रकाश हो तो भी पिशाच को अन्धकार ही रहता है । हे राम ! जैसा उनमें निश्चय होता है, वैसा ही भान होता है, क्योंकि उनका ओज तमरूप है । जैसा किसी को निश्चय होता है, वैसा ही भासता है । मुझको तो सदा आत्मा का निश्चय है, इससे मुझे सदा आत्मतत्त्व का भान होता है । जैसे पिशाच पाञ्चभौतिक शरीर से रहित चेष्टा करते हैं, वैसे ही मैं पाञ्चभौतिक शरीर से रहित आकाश में चेष्टा करता रहा हूँ ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे उत्तरार्धे उपाख्यानवर्णनन्नाम द्विशताधिकपञ्चमस्सर्गः ॥ २०५ ॥

वशिष्टजी बोले, हे राम ! मैं चिदाकाश हूँ, इसलिए पाञ्चभौतिक शरीर से रहित अन्तर्वाहक शरीर से विचरण करता रहा परन्तु मुझको