योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें✵ निर्वाण प्रकरण ✵ ६२१
यदि पाँचों इन्द्रियों के इष्ट विषय बड़ी उत्तम मूर्ति रखकर उपस्थित हों तो भी मुझको आकृष्ट नहीं कर सकते । जैसे मूर्ति की लिखी कमलिनी भौंरे को नहीं खींच सकती, वैसे ही मुझ सरीखों को विषय नहीं चलायमान कर सकते । हे मुनीश्वर ! तुम्हारा शरीर मैंने अवज्ञा करके डाल दिया है—विचार से नहीं फेंका । ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक जो त्रिकालज्ञ हैं, वे भी इस चर्मदृष्टि से नहीं देख सकते; जब विचार से देखते हैं तभी जानते हैं । इस कारण विचार बिना मैंने तुम्हारा शरीर फेंक दिया था । अब तुम क्षमा करो । योगेश्वर विचार से ही भूत, भविष्यत् और वर्तमान को जानता है । इन नेत्रों से तो वही जाना जाता है कि जो अग्रभाग में होता है, विशेष नहीं जाना जाता, इस कारण मुझसे तुम्हारा शरीर गिरा है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे आकाशकुटीसिद्धिसमाधियोगवर्णनन्नाम द्विशताधिकचतुर्थसर्गः ॥२०४॥
वशिष्ठजी बोले, हे साधु ! मैंने भी तुझे विचार बिना गिराया है कि विचार बिना मैं उठ गया था । यह कुटी मेरे अन्तवाहक संकल्प में थी सो मैं अपने स्थान को चला, इस कारण यह कुटी गिर पड़ी और तुम भी गिर पड़े । जो बीत गई सो भली हुई, उसकी क्या चिन्ता कीजिए ? ज्ञानवान् बीती की चिन्ता नहीं करते । जो होनी थी, सो भली हुई । हे साधु ! अब जहाँ तुम्हें जाना है, वहाँ जाओ और हम भी जाते हैं । हे राम ! इस प्रकार चर्चा करके हम दोनों आकाशमार्ग को उड़े—जैसे पक्षी उड़ते हैं—और परस्पर नमस्कार करके अलग हो गये । वह अपने स्थान को गया और अपने स्थान को चलकर बहुतेरे स्थान देखता गया, परन्तु मुझको कोई न जानता था । हे राम ! यह सम्पूर्ण वृत्तान्त जो मैंने तुमसे कहा है, उसे तुम विचारो । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने जो सिद्ध के साथ समागम किया था तो आकाशमार्ग में कैसे शरीर से किया ? आपका पाञ्चभौतिक शरीर तो पृथ्वी पर पड़ा था और पृथ्वी में अणुरूप हो गया था, फिर आप किस शरीर से विचरे ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अन्तवाहक शरीर से मैं विचरता फिरा था और