योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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उर्मी में सिद्धों, देवताओं, इन्द्र, वरुण और कुबेर के स्थानों में फिरा हूँ। परन्तु मुझे कोई न देखता था, मैं सबको देखता था। संकल्परचित पुरुष से मेरा व्यवहार हुआ था और किससे कहूँ ?
राम ने पूछा, हे मुनीश्वर ! अन्तवाहक शरीर तो इन्द्रियों का विषय नहीं है, फिर सिद्ध से आपने चर्चा कैसे की और उसने आपको कैसे देखा ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार जो तुम कहते हो सो सुनो। सिद्ध को मैं इसलिए देख पड़ा कि मेरा संकल्प सत्य था। मुझे यह स्फुरणा हुआ कि सिद्ध मुझको देखे और मुझसे चर्चा करे इससे उसने मुझको देखा और उसका संकल्प भी मुझमें आया तब जाना। जो दोनों सिद्ध हों और उनका संकल्प भिन्न-भिन्न हो तो एक दूसरे के संकल्प को नहीं जानते, परन्तु किसी का विशेष संकल्प हो तो वह दूसरे के संकल्प को जानता है। इससे यद्यपि उसका संकल्प मेरे देखने को न था, पर मेरा दृढ़ संकल्प था, इससे मैं उसके संकल्प को खींचकर अपना ओर ले आया। जो बली होता है, उसी की जय होती है— इससे उसने मुझको देखा। हे राम ! जो अन्तवाहक में स्थित होता है, उसको तीनों कालों का ज्ञान होता है, परन्तु व्यवहार में लगे तो उसे भूल जाता है, और जो वर्तमान पदार्थ होता है, उर्मी का ज्ञान होता है। इसी कारण उसने मेरा शरीर डाल दिया था; क्योंकि वह समाधि के व्यवहार में लगा था, और मेरे संकल्प से वह कुटी भी तब गिरी थी, जब मैं अपने स्थान के व्यवहार को ऐसा चिन्तन करके चला था। जो मैं चिन्तन में न होता, अन्तवाहक शरीर में होता और उस कुटी का भविष्यत् विचार उस संकल्प को रहने देता तो वह सिद्ध न गिरता। पर मैं तो और ही व्यवहार में लगा था, इससे अन्तवाहक शरीर भूल गया, जिससे वह कुटी गिर पड़ी और सिद्ध भी गिर पड़ा।
हे राम ! इस प्रकार सिद्ध गिरा। उसमें चर्चा हुई, तब मैं वहाँ से चला और अन्तवाहक शरीर में आकाशमार्ग में फिरने लगा। सिद्धों के समूह और देवता, विद्याधर, गन्धर्व, किन्नर, ऋषि, मुनि, वरुण, कुबेर, इन्द्र, यम आदि सबके स्थान देखे; परन्तु मुझको किसी ने न