योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें⚙️ निर्वाण प्रकरण ६२३
देखा। मैं बड़े-बड़े शब्द करता कि किसी प्रकार कोई शब्द सुने और मुझको देखे, परन्तु मेरा शब्द कोई न सुनता और न कोई मुझको देख पाता। जैसे स्वप्न में कोई शब्द करे तो उसका शब्द कोई जाग्रत मनुष्य नहीं सुनता, और जैसे न संकल्पवाला दूसरे के सृष्टिव्यवहार का शब्द नहीं जानता, वैसे ही मुझको कोई न जानता था। हे राम! इस प्रकार में प्रथम आकाश में पिशाच की नाईं विचरा। फिर दैत्यों के स्थानों में विचरा। मैं सबको देखता था, पर मुझको कोई न देख पाता था। राम ने पूछा, हे भगवन्! पिशाच का शरीर, जाति और क्रिया कैसी होती है? उनके रहने का स्थान कौन है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! पिशाच की कथा से कुछ प्रयोजन न था, तथापि तुमने प्रसंगवश पूछा है, इसमें मैं कहता हूँ। पिशाच का आकार नहीं होता। वे जो जो रूप रखते हैं, सो सुनो। कई तो आकाश की नाईं शून्य होते हैं और परछाहीं की नाईं डराते हैं। कई शूकर और कई काकरूप रखकर स्थित होते हैं। ऐसे रूप रख वे विचरते हैं और सबको देखते और जानते हैं, पर उनको कोई नहीं जानता। शीत-उष्ण से भी वे दुःख पाते हैं और इच्छा, द्वेष, लोभ, मान, मोह, क्रोध आदि विकार उनमें भी रहते हैं। शीतल जल और अच्छे भोजन की भी वे इच्छा करते हैं और नगरों, वृक्षों और दुर्गन्धपूर्ण स्थानों में भी रहते हैं। कहीं सियार होकर दिखाई देते हैं, और कहीं श्वान होकर दिखते हैं। मन में भी प्रवेश करते हैं और मन्त्र, पाठ, दान आदि से जो वश होते हैं, वह भी अपनी अपनी वासना के अनुसार होते हैं। इनमें भी उत्तम, मध्यम और नीच होते हैं। जो उत्तम हैं वे देवताओं के स्थानों में, मध्यम मनुष्यों के स्थानों में और नीच नरकों में रहते हैं। इनकी उत्पत्ति अचैत्य चिन्मात्र से, जो दृश्य से रहित शुद्ध चैतन्य है, हुई है।
हे राम! सबका अपना रूप वही चैतन्यसत्ता कल्पवृक्ष की नाईं है। उसमें जैसी-जैसी वासना होती है, वैसा ही वैसा पदार्थ होकर भासित होता है। हे राम न कहीं पिशाच है और न जगत्! ब्रह्मसत्ता ही ज्यों की त्यों अपने आपमें स्थित है। शुद्ध आत्मत्वमात्र में किञ्चन 'अहं'