योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1429, कुल 1734 में से
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होकर फुरा है। उसी को जीव कहते हैं। उस अहं की दृढ़ता में मन फुरा है। वह मन ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है। उस ब्रह्मा ने मनोराज्य में आगे जगत् उत्पन्न किया है और ब्रह्मा ही जगतरूप होकर स्थित हुआ है। वह ब्रह्मा ब्रह्म में स्थित है। हे राम! ब्रह्मा का शरीर अन्त-वाहक और केवल आकाशरूप है और उसके दृढ़ संकल्प में आधिभौतिक जगत् दृढ़ हुआ है—उसी मन से और मन हुआ है। हे राम! जैसे ब्रह्मा का शरीर अन्तवाहक है, वैसे ही सबका शरीर अन्तवाहक है। परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक भासित होता है और सब मनरूप है परन्तु दीर्घकाल का स्वप्न है। वह जाग्रत होकर स्थित हुआ है, इससे दृढ़ भासित होता है। जिनको शरीर में अहंकार है, उनको जगत् आधिभौतिक भासित होता है, और जो प्रबोधरूप हैं, उनको सब जगत् संकल्परूप है—वास्तव में कुछ उपजा नहीं। न तुम हो, न मैं हूँ, न ब्रह्मा है और न जगत् है—सभी ब्रह्मारूप हैं। जैसे आकाश और शून्यता में, अग्नि और उष्णता में, वायु और स्पन्द में कुछ भेद नहीं, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं है, ब्रह्मा और जगत् दोनों अज हैं। न ब्रह्मा ही उपजा है और न जगत् ही उपजा है—दोनों ब्रह्मारूप हैं। जो ब्रह्म से भिन्न दिखता है, वह भ्रान्तिमात्र है।
हे राम! पञ्चभूत और छठवाँ मन इनका नाम जगत् है। जबतक ये सत् उमग दिखते हैं, तबतक भ्रान्ति है और जब इनमें रहित केवल चैतन्य भासित हो, तब उसी का नाम परमपद है। हे राम! जब आत्म-पद में जागोगे, तब पञ्चभूत भी आत्मा से भिन्न न दिखेंगे। सबका अधिष्ठान चैतन्यसत्ता है। जबतक आत्मा का प्रमाद है, तबतक संसार-भ्रम न मिटेगा। सब जगत् निराकार संकल्पमात्र है, परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आकाश में स्थूलभूत दिखते हैं। ज्ञानकाल और अज्ञानकाल में जगत् उपजा नहीं, परन्तु अज्ञानी को दृढ़ भासित होता है। जैसे मनोराज्य में किसी ने नगर रचा हो तो वह उसी के हृदय में है और कहीं नहीं दिखता, वैसे ही जबतक जीव अज्ञाननिद्रा में सोया है, तब तक जगत् भासित होता है, पर जब जागेगा, तब आकाशरूप