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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1430, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1430

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ६२५

देखेगा। हे राम! अपना संकल्प अपने को नहीं बाँधता। जबतक स्वरूप का प्रमाद नहीं होता, तब तक ब्रह्मा का संकल्प ब्रह्मा को नहीं बन्धन करता। स्वरूप भी अहंप्रत्यय से तो संकल्परूप है। दूसरी कुछ वस्तु सत्य नहीं-आत्मा ही है। वास्तव में न जगत् का आदि है, न मध्य है और न अन्त है। न जगत् का होना है और न अनहोना है-आत्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है। हे राम! जब सर्वात्मा ही है, तब राग-द्वेष किसका हो? सब अपना रूप ही है। अपना रूप जो आत्मतत्त्व है उसका किञ्चन संवेदन फुरने से जगतरूप होकर स्थित हुआ है। जैसे किसी पुरुष ने मनोराज्य में एक स्थान रचा और उसमें भावना हुई तो वह आधिभौतिक भासित होने लग जाता है, वैसे ही यह जगत् भी ब्रह्मा का संकल्प है। चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, रुद्र, वरुण और कुबेर आदि सब संकल्परूप हैं, पर संकल्प की दृढ़ता से आधिभौतिक भासित होते हैं। हे राम! आत्मारूपी एक तालाब है, जिसमें चैतन्यरूपी जल है, फुरन-रूपी कीचड़ है। उसमें चौदह प्रकार के भूतजातरूप मेढक रहते हैं। वे सब संकल्पमात्र हैं।

हे राम! आकाश में एक आकाशक्षेत्र है, जिसमें शिला उत्पन्न होती हैं। स्वर्गलोक और देवता बड़ी शिला हैं। एक उनमें उज्ज्वल शिला है, वह ज्ञानवान् है। मध्यम शिला मनुष्य है। नीच शिला तिर्यक् आदि योनि हैं। सो भी निर्बीज अर्थात कारण से रहित हैं। अद्वैत आत्मा सदा अपने आपमें स्थित है-कुछ उत्पन्न नहीं हुआ, परन्तु भ्रान्ति से भिन्न-भिन्न भासता है। जैसे फेन बुलबुले और तरङ्ग सब जलरूप हैं, वैसे ही यह सब जगत् आत्मरूप है। जैसे स्वप्न और संकल्प की सृष्टि कारण बिना होती है, वैसे ही यह जगत् कारण बिना संकल्प से उत्पन्न हुआ है। जैसे ब्रह्मादिक हुए हैं, वैसे ही पिशाच भी प्रकट हुए हैं। हे राम! जैसा किञ्चन आत्मा में होता है, वैसा ही होकर दिखता है। वास्तव में पृथ्वी आदि तत्त्व कहीं नहीं हैं। न कहीं ब्रह्मा उपजा है, न कोई जगत् उपजा है, सब भ्रममात्र हैं। जितने शरीर दिखते हैं, वे सब निर्वपु हैं; चेतनता में फुरे हैं सब जीवों का आदि