योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1431, कुल 1734 में से
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अन्तर्वाहक शरीर है । जैसे ब्रह्मा का अन्तर्वाहक शरीर था, वैसे ही सब जीवों का अन्तर्वाहक शरीर होता है, परन्तु संकल्प की दृढ़ता से आधि-भौतिक भासित होता है ।
सब जीवों का अपना-अपना भिन्न-भिन्न संकल्प है । उसी के अनु-सार सब की अपनी-अपनी सृष्टि होती है । जो तुम कहो कि भिन्न-भिन्न हैं, तो जीव इकट्ठे क्यों दिखते हैं ? चाहिए तो यह कि अपनी-अपनी सृष्टि में हों ? तो इसका उत्तर यह है कि जैसे एक नगरस्वामी और नगर में जाय और एक नगरस्वामी और में आवे और दोनों जाकर इकट्ठे बैठें, वैसे ही सब जीव इकट्ठे दिखते हैं, पर उनके इकट्ठे होने पर भी इसकी सृष्टि को वह नहीं देखता और उसकी सृष्टि को यह नहीं देखता, जैसे स्वप्न में जो भिन्न-भिन्न भूतजात होते हैं, वे अनुभव में इकट्ठे दिखते हैं और एक अनुभव में भिन्न-भिन्न होते हैं, एक दूसरे की सृष्टि को नहीं जानते । जीव को अन्तर्वाहक भूल गया है, इससे आधिभौतिक दृढ़ हो रहा है । जैसा अनुभव में अभ्यास होता है, वैसा ही दिखता है । जहाँ पिशाच होता है, वहाँ अन्धकार भी होता है । जो मध्याह्न का सूर्य उदय हो और पिशाच आगे आवे तो अन्ध-कार हो जाता है, ऐसा तमरूप वह होता है । जैसे उलूकादिक को प्रकाश में अन्धकार होता है, वैसे ही अनेक सूर्यों का प्रकाश हो तो भी पिशाच को अन्धकार ही रहता है । हे राम ! जैसा उनमें निश्चय होता है, वैसा ही भान होता है, क्योंकि उनका ओज तमरूप है । जैसा किसी को निश्चय होता है, वैसा ही भासता है । मुझको तो सदा आत्मा का निश्चय है, इससे मुझे सदा आत्मतत्त्व का भान होता है । जैसे पिशाच पाञ्चभौतिक शरीर से रहित चेष्टा करते हैं, वैसे ही मैं पाञ्चभौतिक शरीर से रहित आकाश में चेष्टा करता रहा हूँ ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे उत्तरार्धे उपाख्यानवर्णनन्नाम द्विशताधिकपञ्चमस्सर्गः ॥ २०५ ॥
वशिष्टजी बोले, हे राम ! मैं चिदाकाश हूँ, इसलिए पाञ्चभौतिक शरीर से रहित अन्तर्वाहक शरीर से विचरण करता रहा परन्तु मुझको