योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1432, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें* निर्वाण प्रकरण * ६२७
कोई न देखता था । चन्द्रमा, सूर्य, सहस्र नेत्रवाले इन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व, ऋषीश्वर, मुनीश्वर, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी इस चर्मदृष्टि से मुझे न देख सके और मैं सबको देखता फिरता था । इन्द्र के निकट जाकर मैंने उसके अङ्ग हिलाये, परन्तु उसने मुझको न जाना । जैसे संकल्प का नर किर्मी को हिलाये और वह न देखे और आधिभौतिक शरीर न हिले, वैसे ही उनके शरीर मेरे हिलाने से नहीं हिले । इससे मैं अति मोह को प्राप्त हुआ कि इतने काल तक मैं रहा और मुझको कोई देख नहीं सकता । तब मैंने यह इच्छा की कि मुझको सब देखें । मैं तो सत्य-संकल्प था, इससे सब मुझे देखने लगे । जैसे कोई इन्द्रजाल को देखे; वैसे ही वे मुझको देखने लगे । जिसने पृथ्वी पर देखा उसने पृथ्वी से उपजा वशिष्ठ जाना । मनुष्यलोक में कई ने जल से उपजा जाना कि वारिज वशिष्ठ है । कई ने वायु से उपजा जाना और कई ने जाना कि सप्तऋषियों के बीच जो तेजोमय वशिष्ठ है, वही यह है । इस प्रकार जगत् में मुझको सब देखने लगे, और मैं सबके साथ व्यवहार करने लगा । इसी प्रकार जब बहुत काल व्यतीत हुआ, तब सबने भावना की दृढ़ता से पाञ्चभौतिक शरीर में मुझको देखा । सबको प्रथम वृत्तान्त भूल गया, आधिभौतिकता दृढ़ हो गई, जैसे अज्ञान से जीव स्वप्न के नर को आधिभौतिक देखता है, वैसे ही मेरे साथ उन्होंने आकार देखा, पर मुझको सदा अपने स्वरूप में अहंप्रत्यय से भिन्न कुछ द्वैत न भासित होता था, क्योंकि मैं ब्रह्मरूप था । मेरा वशिष्ठ नाम ऐसा है, जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम होता है । मैं तो चिदाकाशरूप हूँ, पर औरों को वशिष्ठ की प्रतीति उपजी है ।
हे राम ! तुम सरीखों को मेरा आकार दिखता है, पर मुझको आधिभौतिक और अन्तर्वाहक, दोनों शरीर चिदाकाश का किञ्चन भासते हैं । मैं सदा अद्वैतरूप निराकार हूँ । तुम्हारी और मेरी चेष्टा समान है, परन्तु मुझको सदा आत्मपद का निश्चय है, इस कारण मैं जीवन्मुक्त होकर विचरता हूँ । अज्ञानी को क्रिया में द्वैत भासता है और मुझको अक्रिया में भी अद्वैत भासता है । ब्रह्मा भी ब्रह्मरूप जान