योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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पड़ता है और उसका संकल्प जो जगत् है, वह भी ब्रह्मरूप है। जैसे समुद्र में तरङ्ग जलरूप है—भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही ब्रह्म में जगत् ब्रह्मरूप है—भिन्न कुछ नहीं। इसमें मैं चिदाकाशरूप हूँ—द्वैत कुछ नहीं फुरता। जब अहं जगता है, तब जगत् द्वैतरूप होकर भासता है। जैसे अहं के फुरने में स्वप्न की सृष्टि होती है, वैसे ही जाग्रत् सृष्टि भी होती है। सो संकल्पमात्र है। ब्रह्मा और ब्रह्मा का जगत् संकल्प की दृढ़ता में आधि-भौतिक की नाईं प्रतीत होता है, पर वास्तव में न ब्रह्मा उपजा है और न जगत् उपजा है। चिदानन्द ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। वह सदा एकरस है। हे राम! सृष्टि के आदि में प्रलयपर्यन्त जो कुछ क्षोभ है, उसमें आत्मा सदा एकरस है। उनमें कभी क्षोभ नहीं, क्योंकि वास्तव में कुछ उपजा नहीं। जो कुछ भासता है, वह अज्ञान से सिद्ध है। ज्ञान से जगद्भ्रम निवृत्त हो जाता है। जैसे स्वप्नसृष्टि में किसी को कहीं निधि दिखे तो वह उसकी प्राप्ति के लिए यत्न करता है, पर जब जागता है तो उसको स्वप्न जानकर फिर उसे पाने का यत्न नहीं करता, वैसे ही जब आत्मबोध होता है, तब फिर इस जगत् में जगत्-बुद्धि नहीं रहती।
अज्ञान ही जगद्भ्रम का कारण है। उस अज्ञान की निवृत्ति का उपाय यही है कि इस महारामायण का विचार करे—इसी से संसार-भ्रम निवृत्त होगा। यह संसार अविद्या से वासनामात्र है। जो इसको सत्य जानकर इसकी ओर दौड़ते हैं, वे परमार्थ से शून्य, मूढ़, कीट और वानर की नाईं चञ्चल हैं। जिनके भोगों की सदा इच्छा रहती है, वे नीच पशु हैं, उनका संसार से उबरना कठिन है, क्योंकि उनके हृदय में सदा तृष्णा रहती है। वे वैराग्य को नहीं प्राप्त होते। हे राम! भोग तो ज्ञानवान् भी भोगते हैं, परन्तु वे भोगबुद्धि से नहीं भोगते, किन्तु प्रवाहपतित जो कुछ प्रारब्धवेग से प्राप्त होता है, उसको भोगते हैं; वे जानते हैं कि गुणों में गुण बरतते हैं। वे इन्द्रियों सहित भोग को भ्रान्तिमात्र जानते हैं। जो अज्ञानी हैं, वे आसक्त होकर भोगते और तृष्णा करते हैं और भोग की तृष्णा से उनका हृदय जलता है—इसी