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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1434, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1434

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ६२६

का नाम बन्धन है। भोग दुःखरूप हैं। जो इनको सेवते हैं वे हृदय में सदा तृष्णा से जलते हैं। उनका द्वैतरूप जगतभ्रम कभी नहीं मिटता। पर ज्ञानवान् सदा आत्मा में तृप्त रहते हैं, इससे शान्तरूप हैं। जैसे हिमालय पर्वत में सब पदार्थ शीतल हो जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान से हृदय शीतल हो जाता है, आत्मानन्द की प्राप्ति होती है और कोई दुःख नहीं रहता। जिनका चित्त सदा स्त्री, पुत्र और धन में आसक्त है और इनकी जो इच्छा करते हैं, वे महामूर्ख और नीच हैं। उनको धिक्कार है। जिसको आत्मपद की इच्छा हो, उसको सदा सन्तों का संग करना चाहिए और शास्त्रों को श्रवण कर उन पर विचार करना चाहिये। इस अभ्यास से आत्मपद की प्राप्ति होती है। हे रामचन्द्र! इस शास्त्र का विचार परमपद को प्राप्त करानेवाला है। जो पुरुष इस शास्त्र को त्यागकर और की ओर लगते हैं, वे मूर्ख हैं। वाल्मीकिजी बोले, हे राजन्! जब इस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा, तब सायंकाल का समय हुआ और सब श्रोता परस्पर नमस्कार करके गये और सूर्य की किरणों के उदय होने पर फिर आकर स्थित हुए।

इति श्रीयो० अन्तरोपा० वर्णनसमाप्तिर्नामद्विशताधिकषष्ठस्सर्गः ॥२०६॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुमको यह अन्तरोपाख्यान सुनाया है, इसके विचार से जगतभ्रम नष्ट हो जावेगा। ऐसे जब तुम विचार कर देखोगे, तब आत्मा में अनन्त ब्रह्माण्ड समाते देख पड़ेंगे। हे राम! आत्मा में जगत् कुछ वास्तव में नहीं हुआ, इससे मिटता भी नहीं। चित्त के फुरने से भासता है। जब चित्त का फुरना अधिष्ठान में लीन हो जावेगा, तब अद्वैततत्त्व आत्मा ही भासित होगा। हे राम! अद्वैततत्त्व में जगत् भ्रम से दिखता है। ज्ञानवान् की दृष्टि में सदा अद्वैत ही आता है। जगत्, मैं और तुम, सब चिदाकाश है। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं—आत्मसत्ता ही जगत् होकर दिखती है। जैसे अपना अनुभव स्वप्न में स्वप्न की सृष्टि होकर दिखता है, सो अनुभवरूप ही है, वैसे ही यह जगत् भी चिदाकाशरूप है। यदि नाना प्रकार के विकार भी दिखते हैं, तो भी आत्मसत्ता उनमें अनुस्यूत और अखण्डरूप है—आत्मसत्ता और जगत्