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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1435, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1435

६३० ❈ योगवाशिष्ठ ❈

में भेद कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण और भूषणों में भेद नहीं होता, वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं। ब्रह्म ही चेतनता से जगतरूप होकर दिखता है। जैसे स्वप्न में अपने ही अनुभव से बहुत विस्तृत होकर जगत् भासित होता है, सो अनुभव से इतर कुछ नहीं हुआ, और जैसे समुद्र और तरङ्गों में कुछ भेद नहीं; वैसे ही ब्रह्म, जगत् और अनुभव तीनों में कुछ भेद नहीं—असम्यक्दृष्टि से भेद भासता है, सम्यक्दृष्टि से कोई भेद नहीं। हे राम ! आत्मसत्ता में प्रथम जो आभास फुरा है वह ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है। वह चिदाकाशरूप ब्रह्मा है और वही ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। उसी ब्रह्मसत्ता ने अपने भाव को नहीं त्यागा और ब्रह्मारूप होकर स्थित हुई है। फिर उसने जगत् रचा। इसलिए वह जगत् भी आकाशरूप है। पर वास्तव में न जगत् उपजा है, न ब्रह्मा उपजा है और न स्वप्न हुआ है। परमार्थसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है। वह शुद्ध, अनन्त, अविनाशी, अचेत चिन्मात्र है। जगत् भी वही स्वरूप है।

हे राम ! मैं चिदाकाशरूप हूँ। न मेरे साथ कोई आकार है, न मैं कभी उपजता हूँ और न मैं कभी मृतक होता हूँ। मैं नित्य, शुद्ध, अजर, अमर सदा अपने स्वभाव में स्थित हूँ। मैं अनेक विकारों में भी एकरस हूँ। जैसे स्वप्न में बड़े क्षोभ होते हैं, तो भी जाग्रत् शरीर को स्पर्श नहीं करते, क्योंकि उनमें कुछ हुआ नहीं, आभासमात्र हैं, वैसे ही जगत् की उत्पत्ति-प्रलयादिक क्षोभ में आत्मसत्ता को स्पर्श नहीं होता, अर्थात् वह क्षोभ से रहित सदा अनुभवरूप है। जिस पुरुष ने ऐसे अनुभव को नहीं पहिचाना, जिससे सब कुछ सिद्ध होता है, और उसे छिपाया है, वह महामूर्ख और आत्महंता है—वह महाआपदा के समुद्र में डूबेगा। जिसको अपने स्वरूप में अहं-प्रत्यय हुआ है, उसको मानसी दुःख कभी नहीं स्पर्श करता। जैसे पर्वत को चूहा नहीं चूर्ण कर सकता, वैसे ही इसको दुःख नहीं स्पर्श करता। जिसको आत्मा में अहं-प्रत्यय नहीं, उसको शान्ति नहीं प्राप्त होती। जैसे बवंडर में उड़ा हुआ तृण स्थिर नहीं होता, वैसे ही देह-अभिमानी को कभी शान्ति नहीं प्राप्त