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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1436, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1436

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ६३१

होती। जो अपने शुद्ध स्वरूप को त्यागकर अपने को देह में मिला हुआ जानता है, वह क्या करता है? चिन्तामणि को त्यागकर काँच को अङ्गीकार करना और शुद्ध चिन्मात्र अपने स्वरूप को त्यागकर देह में आत्म-अभिमान करना समान है।

हे राम! जब जीव अनात्म में आत्मअभिमान करता है, तब अपने को विकारवान् और जन्मता-मरता मानता है। और जब देह अभिमान को त्यागकर आत्मा को आत्मा मानता है, तब न जन्मता है, न मरता है, न शस्त्र से कटता है, न अग्नि से जलता है, न जल में डूबता है और न पवन से सूखता है—क्योंकि वह निराकार, अविनाशी और चिदाकाशरूप है। हे राम! यदि चेतन की मृत्यु होती हो तो पिता के मरने से पुत्र भी मर जाता और एक के मरने से सभी मर जाते, क्योंकि आत्मसत्ता चेतन एक और सबमें अनुस्यूत है। पर एक के मरने से सब नहीं मरते, इससे चैतन्य आत्मा की मृत्यु कभी नहीं होती। शरीर को काटने से आत्मा नहीं कटता, शरीर के जलने पर आत्मा नहीं जलता। सम्पूर्ण विश्व भस्म हो जाय तो भी आत्मा भस्म नहीं होता। आत्मा नित्य, शुद्ध, अनन्त, अच्युतरूप है—कभी स्वरूप से अन्यथा भाव को नहीं प्राप्त हुआ। हे राम! मैं ब्रह्मरूप हूँ, अर्थात् सबमें अहँरूप निराकार अखण्ड मैं हूँ। न मुझको जन्म है और न मृत्यु है। सुख की इच्छा नहीं। न कुछ हर्ष है, न शोक है। न जीने की इच्छा है न मरने की। जैसे रम्मी में सर्प और सुवर्ण में भूषण कल्पित हैं, वैसे ही आत्मा में वशिष्ठ नाम-रूप है। मैं देश, काल, वस्तु के परिच्छेद से रहित अनन्त आत्मा, नित्य, शुद्ध और बोधरूप हूँ। सबका स्वरूप आत्मतत्त्व है। परन्तु वास्तवस्वरूप के प्रमाद से अवस्तु को प्राप्त हुए की नाईं भासित होता है। जो पुरुष स्वरूप में स्थित नहीं हुए, वे संसार-मार्ग की ओर दृढ़ हुए हैं। उनका जीना वृथा है। वे कहने भर को चैतन्य हैं। अमल में पाषाण की शिला-सदृश हैं। जैसे लुहार की धौंकनी से पवन निकलता है, वैसे ही उनका माँस लेना वृथा है। वे घड़ीयन्त्र की नाईं वासना में भटकते हैं, आत्मानन्द को नहीं प्राप्त होते