योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२० ☀️ योगवाशिष्ठ ☀️
दुःख देनेवाले परमरोग हैं, और जिनको यह सत्य जानता है, वे सब मिथ्या हैं। जिनको यह स्थिर जानता है, वे स्थिर नहीं चलरूप हैं, जिनको यह सम जानता है, वे सब विषम हैं। जिनको बान्धव जानता है, वे सब अबान्धव और दृढ़ बन्धनरूप हैं। जिसको यह सुख देनेवाली स्त्री जानता है, वह सर्पिणी परम विष उगलनेवाली है। उसका काटा मर जाता है, फिर नहीं जीता, अर्थात् आत्मपद में स्थित नहीं होता। हे मुनीश्वर ! मैं देह को परम आपदा का कारण जानता हूँ। इससे निवृत्त होने पर जीव परमपद को प्राप्त होता है। जिन पुत्र, धन आदि को यह जीव संपदा जानता है, वे परम दुःखरूप आपदा है; इनमें सुख कदापि नहीं। यह बात मैं सुनकर नहीं कहता; मैंने देखकर विचार किया है; विचार करके अनुभव किया है और अनुभव करके कहा है कि यह संसार मायामात्र है। बड़े-बड़े स्थानों में भी मैं गया हूँ, परन्तु सार पदार्थ मुझको कोई नहीं देख पड़ा। स्वर्ग में नन्दनवन आदि काष्ठरूप ही दीखे। मृत्युलोक में आकर देखा तो पञ्चभूत ही देखे; शरीर में रक्त, मांस, हाड़, मूत्र आदि देखे। ऐसे शरीर में जो अहंप्रत्यय करते हैं, उनको मैं धिक्कार देता हूँ। शरीर की आयुष्य ऐसी है, जैसे दोनों हाथों में जल लीजिए तो बह जाता है अथवा जैसे जल में तरङ्ग बुलबुले उपजकर नष्ट होते हैं या बिजली की चमक होकर नष्ट हो जाती है। जो ऐसे शरीर को पाकर सुख की तृष्णा करते हैं वे महामूर्ख हैं। बाल अवस्था तरङ्ग की नाईं नष्ट हो जाती है। यौवन अवस्था बिजली की चमक सी छिप जाती है। वृद्ध अवस्था में केश श्वेत हो जाते हैं और दाँत घिसकर गिर पड़ते हैं। जैसे नीचे स्थान में जल स्थिर हो जाता है, वैसे ही सब रोग वृद्धावस्था में घेर लेते हैं और तृष्णा दिन-दिन बढ़ती जाती है।
हे मुनीश्वर ! उस समय सब पदार्थ जर्जर हो जाते हैं और तृष्णा जवान होती है—जैसे वसन्तऋतु की मञ्जरी बढ़ती जाती है—और जो सुखभोग प्राप्त होकर बिछुड़ जाते हैं, उनका दुःख होता है। हे मुनीश्वर ! इस प्रकार इनको असत्य जानकर मैं स्वरूप में स्थित हुआ हूँ।